स्त्री विमर्श एक वैश्विक विचारधारा है। स्त्री अस्मिता को केंद्र में रखकर स्त्री साहित्य की रचना ही स्त्री विमर्श है। यह वस्तुतः एक साहित्यिक आंदोलन है। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि हिन्दी साहित्य में अन्य अस्मिता मूलक विमर्शों की भाँति स्त्री विमर्श मुख्य विमर्श है, जो निःसंदेह लिंग विमर्श पर आधारित है।
इतिहास
18 वीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति के दौरान कई किस्म के संघर्षों में स्त्री पक्षीय भी एक था। धर्मशास्त्र और कानून के द्वारा खुद को पुरुषों के मुकाबले शारीरिक और बौद्धिक धरातल पर कमजोर मानने से इंकार करना इसका केंद्रीय स्वरूप था।
पश्चिम में नारीवादी आंदोलनों व स्त्री विमर्श की एक लम्बी परम्परा रही है। उन्नीसवीं सदी से शुरू मताधिकार आंदोलन आदि के सिलसिलेवार संघर्षों से स्त्री अधिकार की चेतना निचले स्तर तक गई। 1792 के फ्रांसीसी क्रांति के महिला मुक्ति आंदोलनों से प्रभावित होकर अमेरिका में महिलाओं ने 1857 में पुरुषों के समान वेतन को लेकर हड़तालें की थीं। इसी को कालांतर अंर्तराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया गया। इसे नारी मुक्ति आंदोलन की शुरुआत और पृष्ठभूमि कहा जा सकता है। एकिन इसके भी पहले 1848 में एलिजाबेथ कैंडी, स्टैण्टन, लुक्रसिया काफिनमोर आदि प्रमुख महिलाओं ने एक सम्मेलन आयोजित करके प्रस्ताव लिया कि स्त्री को सम्पूर्ण तौर पर बराबरी का हक दिया जाय, जिसमें पढ़ने का अवसर, बराबर मजदूरी और वोट देने का अधिकार दिया जाए। बाद में इस आंदोलन का विस्तार पूरे यूरोप में हो गया और लंबे समय से लगातार चल रहे इन आंदोलनो और माँगों के परिणामस्वरूप 1920 में अमेरिका में स्त्रियों को वोट डालने का अधिकार प्राप्त हुआ। इसी बीच 1859 में पीटर्सबर्ग आंदोलित हुआ, 1908 में ब्रिटेन में “वीमेंस फ्रीडम लीग” की स्थापना की गई, 1911में जापान में इस आंदोलन ने जोर पकड़ा और इस प्रकार विश्व के अनेक देशों में इस आंदोलन ने तीव्र गति प्राप्त कर ली।
1936 में विश्व पटल पर एक अद्भुत वक्त का आगाज हुआ, जब नोबेल पुरस्कार से सम्मानित मैडम क्यूरी सहित तीन महिलाएँ फ्रांस में पहली बार मंत्री बनीं। इसके बाद 1951 में संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने भारी बहुमत से महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों का नियम पारित किया। यह अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर स्त्री-अस्मिता की स्वीकृति का आरंभ बिन्दु था। इस आधार भूमि से 1975 में, अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर महिला वर्ष मनाया गया। फलतः 1985 में दूसरा और 1995 में तीसरा अंर्तराष्ट्रीय सम्मेलन क्रमशः नैरोबी और संघाई में सम्पन्न हुआ।
भारत में स्त्री विमर्श
भारत में 1818 में राजा राममोहन राय द्वारा सती प्रथा के विरोध के फलस्वरूप 1829 में इसे गैरकानूनी घोषित किया जा सका। इसके साथ ही बाल विवाह, बहुपत्नी प्रथा के खिलाफ और विधवा विवाह के समर्थन में भी पक्षधरता को स्वर मिला। स्वामी विवेकानंद और स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी स्त्री शिक्षा पर जोर दिया। हम कह सकते हैं कि अमेरिकी स्त्री- संघर्ष का विस्फोट भारत में भी स्त्री चेतना के रूप में स्वर पा रहा था।
स्त्री-आंदोलन की यात्रा में ज्योतिराव फुले एवं उनकी पत्नी सावित्री बाई फुले का नाम बड़े आदर के साथ इया जाता है। उन्होंने स्त्रियों के लिए सुधारात्मक कदम उठाए। सावित्री बाई फुले ने इसके लिए महिला सेवा मंडल की स्थापना की। 1848 से 1952 तक इन लोगों के लिए 18 पाठशालाएँ खोलीं और उसके पाठ्यक्रम बनाए। मजदूर, किसान और गृहणियों के लिए 1855 में इन्होंनें प्रथम रात्रि पाठशाला का शुभारंभ किया। इनकी मान्यता थी कि स्त्री-पुरुष जन्म से ही स्वतंत्र हैं, इसलिए दोनों को समान अधिकार समान रूप से भोगने का अवसर मिलना चाहिए। इन लोगों ने तत्कालीन समाज में विधवाओं के सिर मुंडन का विरोध एवं उनके पुर्नविवाह का समर्थन किया। स्वावलंबन और स्वतंत्रता के साथ स्त्री शिक्षा एवं समान अवसर व समान वेतन आदि मुद्दों पर पं.रमाबाई संघर्षरत रहीं। उन्होंने 1882 में स्त्री धर्म नीति नामक आलेख स्त्री जागृति के लिए लिखा। 1883 में उन्होंने पितृसत्ता के खिलाफ द हाई कास्ट हिन्दू वोमेन पुस्तक लिखी। विधवाओं और परित्यक्ताओं के लिए शारदा सदन की स्थापना की। 1882 में तारा बाई सिंदे ने स्त्री-पुरुष तुलना की रचना द्वारा तत्कालीन समाज में स्त्री की वास्तविक स्थिति का चित्रण किया। इन्होंनें लिंग के आधार पर स्त्री-पुरुष के अधिकारों में असमानता का कड़ा प्रतिवाद किया और विशेष रूप से विधवा प्रताड़ना की खिलाफत एवं उसके पुर्नविवाह को मजबूती से स्वर दिया।
इन सुधारात्मक प्रयासों के प्रतिफलस्वरूप स्त्री-संघर्ष का दायरा केवल अपनी मुक्ति तक ही सीमित न रहा, बल्कि उसने पुरुष वर्चस्व की लक्ष्मण रेखा को लाँघते हुये काफी तादाद में स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सेदारी भी निभाई। हिन्दुस्तान में स्त्री-मताधिकार के लिए 1918 में काँग्रेस ने एक बैठक बुलाकर प्रस्ताव पारित कर लिया, जिसे मदनमोहन मालवीय के अतिरिक्त सब ने समर्थन किया।
भारत के संदर्भ में एक बात ध्यातव्य है कि यहाँ इसके लिए कोई आंदोलन नहीं हुआ और 20वीं सदी में प्रतिनिधि के रूप में राजनीति तथा सत्ता में दखल भी दी। इस तरह कहा जा सकता है कि – न रावण मरा**, न लंका जली, खुद घर लौट आई जनकनंदनी। जबकि समाज आंदोलनों से बदलता है, संघर्ष से बदलता है, न कि कानून से। इसका कारण यह था वैश्विक स्तर पर जिस समय स्त्री-अधिकार के लिए संघर्ष हो रहे थे, उस समय भारत स्वतन्त्रता के लिए आंदोलनरत था। वैश्विक वातावरण का प्रभाव तो भारत पर पड़ ही रहा था, स्वातंत्र्य संघर्ष में स्त्री की सहभागिता भी समय की जरूरत थी। इसलिए भारत में अलग से कोई संघर्ष दिखायी न देते हुए भी स्त्री-संघर्ष स्वतन्त्रता के संघर्ष में ही समाहित था।
साहित्य में स्त्री विमर्श
1970 के दशक में सेक्सुअल पालिटिक्स नामक एक अद्भुत किताब लिखी गई थी। इस पुस्तक का केंद्रीय विषय वस्तु था- सेक्सुअल विहैभियर में पावर डिसकोर्स। इसमें स्त्री-पुरुष के सेक्स संबध को उनके बीच एक पावर डिसकोर्स कहा गया है। इसमें पुरुष द्वारा इंटरकोर्स के तरीके, उसके नजरिये, उसकी हरकतें, उस वक्त के उसके व्यवहृत शब्द, भाषा आदि सबको पावर डिसकोर्स की संज्ञा दी गई है। इसके अनुसार सेक्स सिर्फ आनंद नहीं, बल्कि उसके अहं की तुष्टि का, उसके पुरुषार्थ की तुष्टि का भी आनंद है। वह स्त्री को एक पैसिव चीज समझता है। इससे पूर्व ही सिमोन द बोउवा ने अपनी पुस्तक सेकेन्ड सेक्स द्वारा इसका खंडन करती हुई लिखती हैं कि “स्त्री पैसिव नहीं होती हैं“। लेकिन पुरुष उसी को मानना चाहता है कि स्त्री पैसिव ही है और वो एक पावर डिसकोर्स करता है। लेकिन सेक्सुअल विहैवियर में पावर डिसकोर्स विमर्श की वस्तु कदापि नहीं है। इस संदर्भ में सराहनीय कथ्य निरुपण द्वारा प्रभा खेतान अपनी आत्मकथा अन्या से अनन्या में स्त्री जीवन के संघर्ष, उसकी इच्छा-आकांक्षा, पीड़ा एवं स्त्री मानसिकता के संवेदित स्वर में सामाजिक-आर्थिक व राजनीतिक स्तर पर समानाधिकार की मांग करती दिखती हैं। इन्होंने अनुपस्थित प्रतिबिम्ब कहकर “रखैल” का श्लाघनीय चित्रण किया है। इस तरह इसमें नारी मुक्ति और देह मुक्ति का अद्भुत सामंजन दिखाई देता है। 1980 के दशक में शेथिला रो बोथम की एक महत्वपूर्ण पुस्तक बिओन्ड द फ्रैगमेन्टस आई। इस पुस्तक में स्त्री-पुरुष के संबध बनाने में प्रारूप आंदोलन (**Prefigurative movement) की अवधारणा प्रस्तुत की गई है।
लेकिन हिन्दी के नारीवाद में, नारी विमर्श में कहीं भी इस तरह की अवधारणा का जिक्र तक नहीं है। हिन्दी में स्त्री विमर्श मात्र साहित्यिक दायरे तक सिमटा हुआ है और बिना किसी आंदोलन के है। सामाजिक आंदोलनों से इस नारी विमर्श का कोई संबंध नहीं है। हमारे देश में संस्कृति बदलने की लड़ाई 16 दिसम्बर (निर्भया कांड) के आंदोलन के बाद से शुरू हुई है। इस बदलाव में बहुत गहरी बुनियादी तब्दीलियों की जरूरत है, जिसमें स्त्रियों के बारे में नजरिये का प्रश्न प्रमुख है। इस नजरिये के बारे में स्त्री विमर्श हेतु चेतना का सर्वथा अभाव दिखता है। हिन्दी का स्त्री विमर्श मुख्यतः अपने पूर्वाग्रहों, विश्वासों और इनकी माँगों का विस्फोट होकर रह गया है। हिन्दी के चलन्त स्त्री विमर्श में मैत्रेयी पुष्पा, लता शर्मा, मनीषा और रोहिणी अग्रवाल आदि सदृश सम्मानित नक्षत्रा मुखर हैं – लेकिन इनमें दयनीयता (ससम्मान) की झलक ही मिलती है। इसमें स्त्री विमर्श के वैश्विक विचारधारा के विकास और उसकी सैद्धांतिकी से कोई जुड़ाव नहीं दिखता है। प्रतिष्ठित नारी लेखिका एवं आलोचिका, जो बहुचर्चित भी हैं (अपनी मेधा और सृजन से), उनकी संस्कृति को हम स्त्री विमर्श के दायरे में लेने की हिमाकत करते हैं। उदाहरण स्वरूप मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी आलोचनात्मक कृति में सर्वख्यात् काव्य कामायनी को हिन्दी की सबसे प्रगतिशील कृति बताया है। यह सर्वजनीन है कि कामायनी बहुत सारे स्तरों पर सामंती संस्कारों से ग्रस्त स्त्री विमर्श के विरोध की संस्कृति को आधार देता है। स्त्री विमर्श के ये तर्क विमर्श तक में भी नहीं आ पाते हैं।
दरअसल स्त्री की स्थिति को हमारे समाज में नियंत्रित और निर्धारित करने के बुनियादी सवालों को अनदेखा किया जाता है। परिवार, शिक्षा प्रणाली, राज्य-कानून, धर्म, कलाएँ, मिडिया आदि ये सारी सामाजिक संस्थाएँ हमारे समाज में औरत बनाने का काम करती हैं- मादा को स्त्री बनाती हैं। सर्वजनीन है कि स्त्री पैदा नहीं होती, बनायी जाती है, मार-मार के बनाया जाता है उसको स्त्री। यही स्त्री की स्थिति तय करती है और नारी विमर्श में इसे अनदेखा कर दिया जाता है।
मर्दवाद! स्त्री प्रश्न की सबसे बड़ी और बुनियादी विरोध की अवधारणा है। स्त्री विमर्श में यह महत्वपूर्ण सवाल अनुत्तरित है। सच्चाई तो यह है कि अच्छे-अच्छे नारीवादियों ने मर्दवाद को आत्मसात कर रखा है। स्त्री विमर्श की बड़ी आलोचिका रोहिणी अग्रवाल ने कई पुस्तकें लिखीं हैं। अपनी कृति में तस्लीमा नसरीन की एक कविता को उद्धृत किया है- *“ये पुरुष जो है न, स्त्रियों को खरीद कर लाते हैं, घर में उसका मनमाना इस्तेमाल करते हैं और उसके बाद लात मारकर भगा देते हैं उसको!”* उन्होंने कहा, मेरी भी इच्छा होती है कि किसी लड़के को ऐसे ही लाऊँ और ऐसे ही उसका उपयोग करूँ, मेरी बड़ी इच्छा होती है, लड़के खरीदने की, जवान लड़के, छाती पर उगे घने बाल, उन्हें खरीद कर, पूरी तरह रौंदकर, उनके सिकुड़े हुए अंडकोष पर जोर से लात मार के कहूँ- भाग साले। यह कविता स्त्री विमर्श की महामना नारीवादी **तस्लीमा नसरीन ने लिखी है। दूसरी नारीवादी ने आलोचना लिखी- कैसी आग उगलती कविता है, फायर गर्ल है तस्लीमा। अब तो उल्टा खेल खेलने की जरूरत है। पुरुषों को समझ में नहीं आता कि स्त्रियों को ऐसे रौंदकर जब हम लात मारकर भगाते हैं, तो कैसा महसूस होता है। हम उनको महसूस करायेंगे। ऐसे उनकी दुनिया में हाहाकार मचेगा।
स्त्री शोषण पर तात्कालिक आवेगपूर्ण प्रतिक्रिया, एक उग्र प्रतिक्रिया के अलावा इसमें क्या दिखता है? तस्लीमा नसरीन एक वंचित, कमजोर, गरीब और “मूक” लड़कियों की खरीदारी के एवज में इसी तरह के पुरुष की खरीदारी कर सकती हैं- सबल पुरुष की नहीं। यह एक घटना की प्रतिक्रिया हो सकती है, कोई नारीवाद अथवा स्त्री विमर्श का विषय वस्तु नहीं। लेकिन इसी मर्दवादी अवधारणा के निरोध के बदले आत्मसात करती दिखती हैं – मर्दवादी धारणा के अनुरूप शरीर का इस प्रकार उपभोग कर, लात मारकर उसे भगा देती है।
मर्दवाद
अतएव मर्दवाद जैसे घृणित विषय का विमर्श क्या होना चाहिए?
सामाजिक प्रचलन में हम सबों ने सुना और जाना है- लड़के रोते नहीं हैं, ऐ लड़का होकर रोता है! इस तरह बचपन से मर्द बनना सिखाया जाता है। यह मर्दवादी अवधारणा, जो नर को मर्द और मादा को स्त्री बनाता है- एक खतरनाक अवधारणा है। यह समाज की संस्कृति और स्त्री विमर्श की बुनियादी समस्या है। न लड़के रोते हैं और ना लड़कियाँ रोती हैं- मनुष्य रोता है। यह विभाजन और अवधारणा मिथ्या है। दोनों की जरूरतें और भावना एक ही होती हैं, शारीरिक बनावट से इसमें कोई फर्क नहीं पड़ता है। इसी प्रकार स्त्रीत्व की अवधारणा भी गलत और बेबुनियाद है, जो स्त्री को घुटनाटेकु व समझौतापरस्त बनाती है। दरअसल यह विभाजन कर हम उनकी मनुष्यता का अपहरण कर लेते हैं।
दूसरी बात बलात्कार वगैरह स्त्री प्रताड़नाओं को मर्दानगी का काम समझा जाता है। इसे हम यों समझ सकते हैं- भारतीय इतिहास के छः स्वर्णिम अध्याय नामक पुस्तक में सावरकर लिखते हैं कि शिवाजी जैसे महान प्रतापी राजा ने भी कैसी गलतियाँ कीं, जब उन्होंनें मुगलों को हरा दिया और मुगल सेना भाग गई थी, और उन सबों की स्त्रियाँ हमारे चंगुल में आ गई थीं, तब शिवाजी ने उनको हरम में लाने और सब के साथ आनंद लेने के बजाय उनको मुक्त कर दिया, ये पुरुषार्थ की कमी शिवाजी ने क्यों दिखाई?
विचारणीय है कि शिवाजी ने स्त्रियों का आदर किया, मुस्लिम स्त्रियों को मुक्त ही नहीं कर दिया, बल्कि अपने सैनिकों को कहा कि इज्जत के साथ इनको घर छोड़ आयें – तो शिवाजी ने पुरुषार्थ का काम नहीं किया! अर्थात बलात्कारी संस्कृति पुरुषार्थ का काम है। इतना ही नहीं, इससे कम गंभीर विचारणीय वे नहीं हैं जो बलात्कार अथवा यौन हिंसा की बात नहीं कर के मर्दवादी अवधारणा के पोषक बने हुए हैं। ऐसी अनेक सामाजिक संस्थाएँ, तथाकथित भद्र लोग, परिवार के लोग बलात्कार अथवा यौन हिंसा के आदेश निर्गत न कर स्त्रियों के साथ अच्छे बर्ताव और मर्यादा पालन के उपदेशक नीति के साथ स्त्रियों को मर्यादा में रहने की आदेशात्मक नसीहत देकर मर्दवादी अवधारणा को क्रियान्वित करते हैं। तरीका मात्र इनका भिन्न है. *तुम घर में रहो, काम करो, बाहर जाओ लेकिन निर्धारित किये गए समय पर लौट आओ,अंधेरे में अकेली बाहर न रहो, पुरुषों से मित्रता अथवा मिलना-जुलना, बात करना गलत है।* इस मर्यादा की कसौटी पर ही उसके साथ बलात्कार, यौन हिंसा और सामाजिक हिंसा को वैध ठहराया जाता है और स्त्री को चरित्रहीन। यह कहीं से भी **सावरकर की अवधारणा से भिन्न नहीं है।
दूसरी तरफ स्त्रीत्व की अवधारणा भी इतनी ही बेबुनियाद है, जिसमें बहुत सारी स्त्रियाँ स्वभाविक रूप से विश्वास करती हैं। स्त्रियों के अंदर करुणा होती है, वह ममतामयी होती है, उनके अंदर बलिदान की भावना भरी होती है – यह सब मनुष्यता से इतर स्त्रियों का निर्माण करती है और एक मनुष्य को स्त्री के रूप में ढाली जाती है। इस तरह उनकी मनुष्यता, स्वभाविक आकांक्षाओं एवं प्रकृति को छीन लिया जाता है।
1970 के दशक में महाराष्ट्र में मथुरा रेप केस जनता के समक्ष आया। यह देश का एक मशहूर रेप केस है। इसमें पुलिस कान्सटेबल ने मथुरा नामक एक दलित स्त्री के साथ रेप किया था और उसे सुप्रीम कोर्ट तक ने बरी कर दिया – यह कहकर कि लड़की चरित्रहीन है। इस केस के खिलाफ स्त्री संगठनों ने फोरम बनाकर बड़े आन्दोलन का रूप दिया। उसी के बाद कानून में बदलाव संभव हुआ कि लड़की के चरित्र का सवाल नहीं उठाया जायेगा। लेकिन 16 दिसम्बर के रेप-हत्या के खिलाफ इससे भी बड़ा आंदोलन बिना स्त्री संगठन के हुआ, कारण था राजनीतिक समर्थन। लेकिन ‘मर्दवाद’ अभी भी अपने विराट रूप में जिंदा है। तभी तो इससे भी जघन्य और क्रूर हादसे का शिकार स्त्रियाँ हो रही हैं- नारी संगठन और आंदोलन इस लिहाज से भटकाव में एवं निष्क्रिय है।
जेंडर इक्विलिटी के सवाल पर अम्बेदकर की बनाई गई एजुकेशन सोसायटी के एक कालेज – कालेज ऐंड कामर्स एन्ड इकोनोमिक्स ने एक नारा दिया था- वीमेंस राइट इज ह्यूमन राइट। ज्योतिबा फुले की पत्नी सावित्रीबाई के द्वारा स्त्री चेतना जागृति हेतु सृजित कई कविताएँ हैं- इस पर झेलम परांजपे ने एक नृत्य नाटिका भी बनाई है। लेकिन ये सब दफन हैं।
सेक्स और स्त्री विमर्श
सेक्स और स्त्री विमर्श – स्त्री और पुरुष के बीच अनन्यतम संबध सेक्स है। बाकी सभी संबंध फलन मात्र हैं। लेकिन जेंडर संबंधी विमर्श में इसे विमर्श से अलहदा रखा गया है। इतना ही नहीं, रहस्यमय चुप्पी के साथ इसके प्रति एक निंदात्मक रवैया ही अपनाया जाता है। जीवन की अनिवार्यता, प्रकृति का अवलम्ब व विस्तार इस सृजन यज्ञ को धिक्कार और इस क्रिया को निषेधात्मक स्वरुप दे दिया है। सृजन की मौलिक क्रिया को वर्जना की हद तक छिपाने की कोशिश की गई है। सेक्स निःसंदेह मुख्यतः एक “स्त्री- विषय” है, जिसमें वास्तविक आनंद स्त्री के हिस्से और पुरुष की अहमियता एक समान तुल्य होती है। लेकिन पुरुष-अहंकार इस बात से इंकार कर अन्य विषयों की तरह सेक्स सिद्धांत पर भी प्रारंभ से पितृसत्तात्मक सोच स्थापित किये हुए है।
सेक्स को हम प्रेम का एक “उपकरण” कह सकते हैं- एक साधन। इसे लेकर हम स्त्री-पुरुष के नजरिये में स्पष्टतः एक बुनियादी विभेद पाते हैं। स्त्री की नजर में सेक्स प्रेम का एक अविभाज्य अंग है। स्त्री इसमें भेद नहीं करती है। वह सेक्स उसी से कर सकती है, जिससे प्रेम करती है। दूसरी ओर पुरुष के लिए प्रेम और सेक्स दोनों अलहदा हैं। उसके लिए प्रेम होना सेक्स के लिए अनिवार्य शर्त नहीं है। अस्तु पुरुष उद्देश्य और उपकरण में फर्क करता है। वह किसी से भी सहज सेक्स क्रिया में शामिल हो सकता है, जिससे प्रेम नहीं भी करता है। इस तरह उपकरण को उद्देश्य से विलग करने की पुरुष दृष्टि एवं प्रवृत्ति उसे यौनिक रूप से उच्छृंखल बनाती है। इस “उद्देश्य रहित उपकरण” की अपूर्णता का ही कपट रूप है- वेश्यालय का सृजन। इतना ही नहीं, स्त्री के भोग-बाजार को जीवन-यापन में बदलने की कपटता सृजित की जाती है। वस्तुतः यहीं से सेक्स के साथ “अपराध बोध” की शुरूआत होती है। चूँकि सेक्स-सिद्धांत का निर्माण और संचालन पुंसवादी सामाजिक सोच का ही प्रतिफल है, परिणाम स्वरूप ग्लानियुक्त पुरुष के अहम् ने इस क्रिया को अनैतिक घोषित कर एक टैबू बना दिया। फलतः यह निंदात्मक भाव स्त्री और पुरुष में अपने को समान रूप से स्थापित कर दिया।
सेक्स वैश्विक स्तर पर एक सहज और मासूम क्रिया है। मातृसत्तात्मक समाजों में स्त्री मानसिकता से संचालित सेक्स सिद्धांत में किसी भी प्रकार का अपराध बोध न था और ना है। वहाँ यौन अपराध भी न के बराबर है। पुंसवादी समाज में सेक्स-सिद्धांत पर पुरुष वर्चस्व आज अपनी कामुकता के लिए दुनिया भर में अदालतों के कटघरे में बतौर अपराधी इस धृष्टता की कीमत अदा कर रहा है। यह पितृसत्तात्मक सोच के रूप में स्त्री-पुरुष संबधों के इभोल्युशन की त्रासदी बन संबंधों को जटिल बना दिया है। एक-दूसरे के पूरक के रूप में सृजित दो अस्मिता, आज एक दूसरे को क्रूरता की हद तक कम्पीट करने की होड़ में संलग्न हैं।
नारीवादी हाहाकारी शोर और पुरुष वर्चस्व के पाशविक अट्टहास के मध्य यह दुनिया ऐतिहासिक दुर्घटना की अंतहीन शिकार है।








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