देश के समुद्री पश्चिमी तटों पर मौसम सुहाना था। पेड़ों पर वसंत उतर आया था। मंजरियों से लदे आम के पेड़ और वासंती हवा। नारियल के लहराते पेड़। समुद्र की गर्जन-तर्जन। समुद्र की लहरों से अठखेलियाँ करते बच्चे और बड़े। सचमुच लगता था कि धरा और गगन पुकार रहे हों । वे कह रहे हों – ‘रुको और महसूसो। क्या भागदौड़ कर रहे हो? हाय हाय करने में जीवन का क्या मजा है?’ कवि रामदयाल पांडेय का लगा कि संसार में कोई रुकता नहीं तो वसंत भी क्यों रुके? उन्होंने लिखा –
पिकी पुकारती रही, पुकारते धरा गगन,
मगर कहीं रुके नहीं वसंत के चपल चरण।
वसंत के चपल चरण भागते रहे, जबकि
असंख्य काँपते नयन लिये विपिन हुआ विकल; असंख्य बाहु हैं विकल, कि प्राण हैं रहे मचल; असंख्य कंठ खोलकर 'कुहू कुहू' पुकारती; वियोगिनी वसन्त की दिगन्त को निहारती।
इस नश्वर संसार में सौंदर्य अनश्वर लगता है। खैर। मुझे तो वापस आना था, आ गया। जब आया तो एक शंकराचार्य अपने अपमान के खिलाफ धरने पर बैठे थे। सोशल मीडिया पर यूजीसी निर्देशों का जम कर विरोध हो रहा था। हिन्दू समाज का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि उसके पास मान-अपमान के अलग-अलग तराजू हैं।
देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी को दिल्ली के जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश करने से रोका गया और पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद जी को पुष्कर के ब्रह्मा मंदिर में जाने नहीं दिया गया। शंकराचार्य तब चुप क्यों थे? क्या यह देश की सर्वोच्च संस्था का अपमान नहीं था? वैसे तो मेरा मानना है कि किसी भी धार्मिक स्थल में किसी पर भी प्रतिबंध लगाना सर्वथा ग़लत ही नहीं, दंडनीय है। जो रोकता है, उसे तत्काल जेलों में डाल देना चाहिए। ऐसे लोग पाखंडी, धूर्त और ठग हैं। द्रौपदी मुर्मू आदिवासी हैं और रामनाथ कोविंद अनुसूचित जाति, इसलिए उन्हें रोका गया। हिन्दू धर्म का कौन सा ग्रंथ ऐसे अनैतिक और अमर्यादित कार्यों की इजाजत देता है? पाखंडी मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री-आवास को गंगाजल और गोमूत्र से इसलिए पवित्र किया, क्योंकि उसमें एक पिछड़े मुख्यमंत्री अखिलेश यादव रहते थे। ऐसे वक्त शंकराचार्य कहां थे? उत्तरप्रदेश के इटावा में दो-दो भागवताचार्यों का सिर मुड़वाया जाना, चोटी उखाड़ लेना और महिला-मूत्र से पवित्र किया जाना—क्या यह किसी का अपमान नहीं है? मध्य प्रदेश में एक महिला कथावाचक के साथ अभद्र व्यवहार, चोटीधारी एक धर्मनिष्ठ यादव की चोटियाँ उखाड़ लेना, एक आदिवासी के सिर पर पेशाब करना, या किसी दलित को मूत्र पिलाने के लिए मजबूर करना—यह अपमान है या सम्मान?
दूसरी तरफ एक और संघर्ष चल रहा है। यह संघर्ष भी बहुत पुराना है- जाति सर्वोच्चता का संघर्ष। केंद्र सरकार द्वारा संसद में दी गई कि पिछले पाँच वर्षों में आईआईटी, आईआईएम तथा अन्य राष्ट्रीय महत्व के उच्च शिक्षण संस्थानों में लगभग 100 छात्रों ने आत्महत्या की है। चिंताजनक तथ्य यह है कि इनमें से प्रायः सभी छात्र अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदायों से थे। ऐसी आत्महत्याओं या हत्याओं पर वे लोग चुप रहे, जो आज सोशल मीडिया पर उछल रहे हैं। हैदराबाद के रोहित वेमुला और मुंबई की आदिवासी डॉक्टर पायल तड़वी की आत्महत्या की घटनाओं को कैसे भूलाया जा सकता है? पीड़ित परिवारों की गुहार पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सख़्त निर्देश दिया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए प्रभावी नियम बनाए जाएँ। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में संसद की समिति गठित की गई, जिसके अध्यक्ष वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह जी थे। समिति की अनुशंसाओं के आधार पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने समता (इक्विटी) समिति का गठन किया, ताकि दलित, आदिवासी, ओबीसी, अल्पसंख्यक, महिलाएँ और दिव्यांग छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव की तत्काल सुनवाई हो और दोषियों पर कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके। जाति की कट्टरता को मानने और जीने वाले को यह भी पसंद नहीं है। उन्हें लगता है कि जाति आधारित गैर बराबरी कायम रहनी चाहिए।
जो भी हो, वसंत के चपल चरण नहीं रुकते तो अन्याय के चरण भी नहीं रुक सकते। आज न कल, यह खत्म होकर रहेगा।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर








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