इन दिनों : ज़िंदगी ज़िंदादिली का नाम है 

"इस बार मैंने बगीचे को क़रीब से देखा- मंजर लगने से फल टूटने तक। बीच में आँधी आयी। लाखों अमौरियॉं झडीं। बहुत कुछ हुआ।" - इसी आलेख से

टहलने निकला तो हर रोज़ की तरह बगीचे से होकर निकला। बग़ीचा श्रीहीन हो चुका है। इस बार मैंने बगीचे को क़रीब से देखा- मंजर लगने से फल टूटने तक। बीच में आँधी आयी। लाखों अमौरियॉं झडीं। बहुत कुछ हुआ। मंजरियों से जब वृक्ष लद गये थे तो उसकी सुगंध मदमस्त करती ही थीं। साथ ही भौरों का मँडराना, कोयल का चहकना और डालों पर पक्षियों का चहकना मन में उत्साह और उमंग भरता था।

मंजरियों में अमौरियाँ लगीं। अमौरियॉं गिरतीं और हर रोज़ हम दोनों – मैं और अलका चुनते। उम्र तो ढलान पर है, लेकिन आदमी का बचपना कहाँ जाए! जेब में अमौरियॉं भरी रहतीं। अमौरियॉं वयस्क आम हो गए। आम के मालिकों ने घेरे डालने शुरू किए। एक दिन भद्दे स्वर में टोका भी। तब हम दोनों ने रास्ते बदल लिए। आम बड़े होते गए। एक रात खूब ज़ोरों की आँधी बही। सुबह जब हम लोग पहुँचे तो आम लेने वाला कोई न था। खूब सारे आम लेकर लौटे। जो आम बचे, समय के साथ पकने लगे।

धीरे-धीरे आम तोड़े जाने लगे। अब आम का बग़ीचा ख़ाली है। चार-पाँच महीने में मैंने यह मंज़र देखा, अनुभव किया और जीवन से तुलना की।  आरसी प्रसाद सिंह की कविता बचपन में पढ़ी थी- ‘जीवन का झरना’। उसकी प्रारंभिक पंक्तियाँ हैं-

“यह जीवन क्या है? निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है। 
सुख-दुख के दोनों तीरों से चल रहा राह मनमानी है। 
कब फूटा गिरि के अंतर से? किस अंचल से उतरा नीचे? 
किस घाटी से बह कर आया समतल में अपने को खींचे? “ 

जीवन क्या है? उत्तर है- मस्ती है। यह मस्ती किस राह चलेगी? सुख और दुख दो किनारे होंगे। ज़िंदगी अविरल बहेगी। मेरे सिर के बाल भरे हुए थे, काले थे। अब हालत यह है कि ज़्यादातर काल-कवलित हुए। जो बचे, सफेद हैं। देह भी बदलती रही, चेतना भी। मगर मूल नहीं बदला – भावनाओं की दुनिया। समय देह पर बहुत असर करता है, पर मन की अविरलता क़ायम रहती है। आरसी प्रसाद सिंह ने एक तरह से कालजयी कविता लिखी। जिस बगीचे से गुज़रता हूँ, वह एक सीख देता है। वह कहता है कि हर वर्ष मैं मंजरों से भरता हूँ, हर वर्ष ख़ाली होता हूँ। जीवन यही तो है। आख़िर बग़ीचे के वृक्ष अपने फल के टूटने पर कितना शोक मनाएँ?  हरिवंश राय बच्चन ने लिखा न- जो बीत गई, वह बात गई। उसकी कुछ पंक्तियाँ हैं-

“जीवन में वह था एक कुसुम
थे उस पर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुवन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुरझाई कितनी वल्लरियाँ
जो मुरझाई फिर कहाँ खिलीं
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुवन शोर मचाता है!“ 

दुनिया में निस्सार कथा भी बहुत हैं और सार्थक कथा भी। देश के लिए जो शहीद हो गए, वे अब नहीं हैं, लेकिन उनकी कथाएँ भरोसा दिलाती हैं। जगदंबा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी‘ की अमर पंक्तियां हैं- “शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।”

आहार, निद्रा और मिथुन- हर जीवों की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। इसमें नया कुछ नहीं है। नयापन है – जीवन की समझ। संवेदनाओं का पूरा संसार। ख़्वाहिशें ऐसीं, जो संसार को सजाये। यों नाश और निर्माण संसार का वसूल है, लेकिन मनुष्य होने का बोध तो निर्माण में ही है। मशहूर शायर इमाम बख़्श नासिख़ का एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक शेर है- 

ज़िंदगी ज़िंदा-दिली का है नाम,
मुर्दा-दिल ख़ाक जिया करते हैं।
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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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