पौलो फ्रेरे का बैंकिंग मॉडल और संवादात्मक शिक्षा (भाग 2)

प्रस्तुत आलेख पौलो फ्रेरे के 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र (Pedagogy of the Oppressed) की समीक्षा-शृंखला का दूसरा भाग है। इस अंक में शिक्षा के बैंकिंग मॉडल और उसके तोड़ के रूप में प्रस्तुत संवादात्मक शिक्षा प्रणाली की विवेचना की गयी है।

बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब पूरी दुनिया औद्योगिक प्रगति की आँधी में अंधी दौड़ लगा रही थी, तब लैटिन अमेरिका (ब्राजील) की धरती से एक ऐसी आवाज़ उठी, जिसने शिक्षा की पारंपरिक औपनिवेशिक बुनियाद को हिलाकर रख दिया। वह आवाज़ थी दार्शनिक और शिक्षाशास्त्री पॉलो फ्रेरे की। अपनी कालजयी कृति ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ (Pedagogy of the Oppressed) में फ्रेरे ने एक अत्यंत बुनियादी लेकिन क्रांतिकारी सवाल उठाया: “क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था मनुष्य को स्वतंत्र कर रही है, या उसे एक ख़ास साँचे में ढालकर व्यवस्था का गुलाम बना रही है?”

फ्रेरे का मानना था कि शिक्षा कभी भी तटस्थ नहीं हो सकती। यह या तो मौजूदा दमनकारी व्यवस्था के अनुरूप नागरिकों को ढालने का यांत्रिक माध्यम बनती है, या फिर इंसान को अपनी नियति बदलने के लिए ‘आलोचनात्मक चेतना’ (Critical Consciousness) प्रदान करती है। इसी वैचारिक धरातल पर उन्होंने शिक्षा के दो सर्वथा विपरीत मॉडलों की व्याख्या की—‘बैंकिंग शिक्षा प्रणाली’ और ‘संवादात्मक (समस्या-प्रस्तुतीकरण) शिक्षा प्रणाली’। 

पॉलो फ्रेरे ने पारंपरिक और समकालीन औपचारिक शिक्षा व्यवस्था के लिए ‘बैंकिंग’ शब्द का प्रयोग एक रूपक के तौर पर किया। जिस तरह किसी बैंक में खाताधारक जाता है और अपने खाते या लॉकर में पैसा या गहना जमा कर आता है, ठीक उसी तरह पारंपरिक स्कूलों में विद्यार्थियों के दिमाग को ‘खाली खाता’ या ‘पिग्गी बैंक’ समझा जाता है। शिक्षक का एकमात्र दायित्व उस खाली बर्तन में ज्ञान, सूचनाओं और तथ्यों की ‘धन'(!) को भर देना होता है।

बैंकिंग शिक्षा प्रणाली की संरचना पूरी तरह से सत्तावादी और एकतरफा होती है। फ्रेरे ने इसकी प्रमुख आंतरिक विशेषताओं को रेखांकित किया है, जो इस प्रकार हैं :

  • ज्ञान का एकतरफा प्रवाह : इसमें शिक्षक स्वयं को ‘सर्वज्ञानी’ और शिक्षार्थी को ‘पूर्णतः अज्ञानी’ मानता है। ज्ञान की गंगा सिर्फ एक दिशा में बहती है।
  • परम निष्क्रियता : छात्र कक्षा में केवल मूक श्रोता होते हैं। उनका कार्य शिक्षक द्वारा उनके ऊपर फेंकी गई सूचनाओं को बिना किसी प्रतिवाद के लपकना और संभालकर रखना है।
  • रटने और यांत्रिकता पर बल : इस प्रणाली में समझने, विश्लेषण करने या सवाल उठाने की कोई जगह नहीं होती। यहाँ ‘स्मरण शक्ति’ को ही ‘बुद्धिमत्ता’ का पैमाना मान लिया जाता है। जो जितना बेहतर रटकर परीक्षा की कॉपी में उड़ेल सकता है, वह उतना ही श्रेष्ठ छात्र है।
  • अलगाव और अमूर्तता : जो ज्ञान दिया जाता है, उसका छात्र के वास्तविक जीवन, उसकी गरीबी,उसके संघर्षों या सामाजिक परिवेश से कोई सीधा संबंध नहीं होता। ज्ञान को जीवन से काटकर अलगाव में पढ़ाया जाता है।
  • कक्षा में पूर्ण तानाशाही : शिक्षक सोचने का काम करता है, छात्र उसके सोचने के तरीके का अनुसरण करते हैं। शिक्षक नियम तय करता है, छात्र उन नियमों का पालन करते हैं। शिक्षक बोलता है, छात्र केवल सुनते हैं।

बैंकिंग शिक्षा के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परिणाम

फ्रेरे चेतावनी देते हैं कि बैंकिंग शिक्षा कोई मासूम या केवल एक कमजोर शिक्षण पद्धति नहीं है, बल्कि यह शासक वर्ग द्वारा जानबूझकर पोषित एक राजनीतिक औजार है। उनके अनुसार समाज के लिए इसके निम्नलिखित विनाशकारी परिणाम होते हैं –

  • आलोचनात्मक चेतना का दमन : यह व्यवस्था बच्चों में ‘क्यों’, ‘कैसे’ और ‘किसके लिए’ जैसे बुनियादी सवाल पूछने की क्षमता को बचपन में ही कुचल देती है। परिणामतः, समाज में ऐसे वयस्क तैयार होते हैं जो कभी स्थापित सत्ता, सामाजिक असमानता या शोषण पर सवाल नहीं उठाते।
  • ‘अकर्मण्यता की संस्कृति’ का निर्माण : बैंकिंग शिक्षा का सबसे भयानक मनोवैज्ञानिक परिणाम यह होता है कि शोषित वर्ग अपनी स्थिति को ही अपनी नियति मान लेता है। वे यह मान बैठते हैं कि वे अज्ञानी हैं और शासक वर्ग ही श्रेष्ठ है। इस हीनता-बोध के कारण समाज में एक व्यापक चुप्पी छा जाती है।
  • अनुकूलन, न कि परिवर्तन : यह शिक्षा छात्रों को दुनिया को बदलने के लिए प्रेरित नहीं करती, बल्कि उन्हें इस दमनकारी दुनिया के साथ ‘एडजस्ट’ या अनुकूलित होना सिखाती है। यह यथास्थितिवाद को बनाए रखने का सबसे बड़ा साधन है।
  • मनुष्यता का ह्रास : जब विद्यार्थियों को केवल ‘चीजें’ या ‘वस्तु’ मान लिया जाता है, जिनमें सूचनाएँ भरी जानी हैं, तो उनकी मानवीय गरिमा, उनकी रचनात्मकता और उनकी स्वतंत्र सोच समाप्त हो जाती है। वे इंसान से रोबोट में तब्दील होने लगते हैं।

बैंकिंग मॉडल के इस अमानवीय और दमनकारी चक्र को तोड़ने के लिए फ्रेरे ने ‘संवादात्मक’ या ‘समस्या-प्रस्तुतीकरण’ (Problem-Posing) शिक्षा का विकल्प पेश किया। यह प्रणाली मानती है कि ज्ञान कोई रेडीमेड वस्तु नहीं है, जिसे एक दिमाग से दूसरे दिमाग में ट्रांसफर किया जा सके। ज्ञान एक जीवंत प्रक्रिया है, जो दुनिया के साथ इंसानी जुड़ाव और आपसी विमर्श से लगातार निर्मित और पुनर्निरमित होती है। इस मॉडल की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

संवादात्मक मॉडल की मुख्य विशेषताएँ

  • संवाद ही प्राणतत्व है : यहाँ शिक्षा का आधार व्याख्यान नहीं, बल्कि संवाद है। संवाद का अर्थ केवल ‘बातचीत’ नहीं है, बल्कि इसका अर्थ है—समान धरातल पर बैठकर, आपसी सम्मान के साथ सत्य की खोज करना।
  • शिक्षक-छात्र संबंधों का लोकतांत्रीकरण : इस मॉडल में शिक्षक और छात्र का पारंपरिक विभाजन समाप्त हो जाता है। फ्रेरे के शब्दों में, यहाँ एक नया संबंध जन्म लेता है: “Teacher-student” और “Students-teachers”। यानी शिक्षक पढ़ाते हुए खुद सीखता है और छात्र सीखते हुए शिक्षक की भूमिका निभाता है। दोनों ‘सह-शिक्षार्थी’ (Co-learners) बन जाते हैं।
  • समस्या-प्रस्तुतीकरण : शिक्षक छात्रों को ज्ञान के बने-बनाए उत्तर नहीं देता, बल्कि उनके सामने उनके ही जीवन से जुड़ी ‘समस्याएँ’ और ‘द्वंद्व’ प्रस्तुत करता है। छात्र उन समस्याओं के समाधान के लिए खुद दिमाग दौड़ाते हैं।
  • आलोचनात्मक जागृति : यह प्रणाली छात्रों के भीतर ‘क्रिटिकल थिंकिंग’ को जगाती है। वे अपने आसपास की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक वास्तविकताओं के पीछे छिपे हुए शक्ति-संबंधों (Power Dynamics) को पहचानना शुरू करते हैं।
  • प्राक्सिस (Praxis – कर्म और चिंतन): फ्रेरे के अनुसार, सच्ची शिक्षा केवल किताबी ज्ञान या केवल खोखली क्रांति की बातों में नहीं है। शिक्षा का अर्थ है ‘प्राक्सिस’—यानी पहले परिस्थितियों पर गहराई से ‘चिन्तन’ करना और फिर उस चिन्तन के आधार पर दुनिया को बदलने के लिए ‘कर्म’ करना।

इस संवादात्मक मॉडल को समझने के लिए हमें 1960 के दशक में ब्राजील के उत्तर-पूर्वी हिस्से में पॉलो फ्रेरे द्वारा वयस्कों और निरक्षर गरीब खेतिहर मजदूरों के लिए चलाए गए ऐतिहासिक साक्षरता अभियान को देखना होगा। फ्रेरे ने केवल 45 दिनों में 300 गन्ना काटने वाले मजदूरों को पढ़ना-लिखना सिखा दिया था। वे यह कैसे करते थे? उनके तरीके के मुख्य चरण निम्नलिखित थे –

  • चरण 1: सांस्कृतिक अन्वेषण (Cultural Mapping) : फ्रेरे और उनकी टीम सीधे ब्लैकबोर्ड लेकर गाँवों में नहीं जाते थे। वे पहले कई दिनों तक मजदूरों के बीच रहते थे, उनकी भाषा सुनते थे, उनके दुख-दर्द और उनके जीवन के मुख्य शब्दों को नोट करते थे। वे ऐसे शब्दों को चुनते थे जो मजदूरों के जीवन में भारी भावनात्मक और सामाजिक महत्व रखते थे, जैसे—Favela (झुग्गी), Trabalho (काम/मशक्कत), Enxada (कुदाल/फावड़ा), Salário (मजदूरी) आदि।
  • चरण 2: कोडिंग या दृश्य प्रस्तुतीकरण (Codification) : कक्षा में फ्रेरे सीधे क, ख, ग नहीं पढ़ाते थे। वे दीवार पर एक चित्र (प्रोजेक्टर या स्केच के माध्यम से) दिखाते थे। मान लीजिए, चित्र में एक थके-हारे मजदूर को हाथ में ‘कुदाल’ (Enxada) थामे और पृष्ठभूमि में जमींदार के आलीशान घर को दिखाया गया है।
  • चरण 3: डिकोडिंग और संवाद (Decoding through Dialogue) : अब शिक्षक मंच पर खड़े होकर भाषण देने के बजाय छात्रों (मजदूरों) के बीच बैठ जाता था और उस चित्र को दिखाकर सवाल पूछता था:
    • “इस चित्र में आदमी के हाथ में क्या है?” मजदूर कहते – “कुदाल।”
    • “यह कुदाल कौन चलाता है?” मजदूर – “हम चलाते हैं, दिन-रात चलाते हैं।”
    • “इस कुदाल से जो फसल कटती है, उसका मालिक कौन बनता है?” यहाँ मजदूर ठहरते, सोचते और कहते – “जमींदार।”
    • “तो फिर तुम दिन-रात मेहनत करने के बाद भी भूखे और गरीब क्यों हो, जबकि जमींदार बिना कुदाल छुए भी अमीर है? क्या यह भगवान की मर्जी है या इंसानों द्वारा बनाई गई व्यवस्था?”
  • चरण 4: अक्षर ज्ञान और चेतना का विलय: इस गहन विमर्श के दौरान जब मजदूर के भीतर अपनी स्थिति को लेकर एक गुस्सा और छटपटाहट (आलोचनात्मक चेतना) पैदा होती थी, तब फ्रेरे ब्लैकबोर्ड पर बड़े अक्षरों में लिखते थे – T-R-A-B-A-L-H-O (काम) या S-A-L-A-R-I-O (मजदूरी)। मजदूर उस शब्द को केवल एक अक्षर के रूप में नहीं देखते थे, बल्कि वे अपनी पूरी ज़िंदगी को उस शब्द में लिखा हुआ पाते थे। वे अक्षरों को जोड़ना-तोड़ना खेल-खेल में सीख जाते थे, क्योंकि वे शब्द उनकी आत्मा से जुड़े थे।

फ्रेरे की कक्षा का एक वास्तविक संस्मरण है: एक बार एक निरक्षर मजदूर ने इस प्रक्रिया के दौरान उठकर बड़े गर्व से कहा था—“अब मैं समझ गया हूँ कि मैं भी एक संस्कृति का निर्माता हूँ। मैं केवल कुदाल नहीं चलाता, मैं अपनी मेहनत से इस दुनिया को बदलता हूँ।” यह साक्षरता केवल अक्षरों की नहीं थी, यह मनुष्यता और चेतना की साक्षरता थी।

आज जब हम 21वीं सदी के तीसरे दशक में जी रहे हैं, जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डिजिटल क्रांतियों ने सूचनाओं को उंगलियों पर ला दिया है, तब पॉलो फ्रेरे का दर्शन और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। आज की तथाकथित आधुनिक और कॉर्पोरेट शिक्षा व्यवस्था भी काफी हद तक एक ‘उन्नत बैंकिंग मॉडल’ ही है, जहाँ छात्रों को केवल पैकेज पाने, परीक्षाओं के कट-ऑफ पार करने और बाजार के लिए कुशल ‘मानव संसाधन’ बनने के लिए तैयार किया जा रहा है। कोचिंग संस्थानों की बाढ़ और चौबीसों घंटे रटने का दबाव इसी बैंकिंग मॉडल का वीभत्स रूप है।

यदि हमें वास्तव में एक समतामूलक, जागरूक और जीवंत लोकतांत्रिक समाज का निर्माण करना है, तो हमें अपनी कक्षाओं को ‘बैंक के लॉकर’ से मुक्त कराकर उन्हें ‘संवाद की चौपाल’ बनाना होगा। शिक्षकों को अपनी तानाशाही छोड़कर बच्चों का साथी बनना होगा, और बच्चों को अपनी चुप्पी तोड़कर सवाल पूछने की हिम्मत जुटानी होगी। फ्रेरे का दर्शन सदियों तक दुनिया के हर उस क्लासरूम का मार्गदर्शन करता रहेगा, जो इंसान को सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र और संवेदनशील मस्तिष्क बनाना चाहता है।

(यह आलेख विभिन्न स्रोतों का आधार लेकर लिखा गया है। लेखक उन सबके प्रति आभार व्यक्त करता है।)

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कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

Dr. Anil Kumar Roy
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कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

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13 Comments

    • अनिल सर बहुत अच्छा विश्लेषण करते हैं मैं उनको बहुत दिनों से सुन रहा हूं बहुत अच्छा रहता है आपका विश्लेषण बहुत-बहुत धन्यवाद ऐसे विश्लेषण हम लोग के समक्ष रखने के लिए

      मैं अनिल सर को बहुत पहले से सुन रहा हूं बहुत अच्छा इनका रहता है छू जाने वाला लाइन सब बोलते हैं मैं सोचता हूं कभी यह हकीकत में बदलेगा मुझे सलाम है सर आपको आपने बहुत अच्छा कदम उठाया धन्यवाद

  1. The work reflects the author’s deep analytical insight and practical understanding of the issues discussed.

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