पॉलो फ्रेरे : 45 दिनों का वयस्क साक्षरता मॉडल (भाग 4)

ब्राज़ील में अनपढ़ों को वोट देने का अधिकार नहीं था। इस तरह आधी से अधिक आबादी राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर थी। उन अनपढ़ मजदूरों को पढ़ाने के लिए पॉलो फ्रेरे ने शिक्षा प्रदान करने का जो ऐतिहासिक प्रयोग किया, उसने न केवल उन मज़दूरों के जीवन को बदला, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था का भी संतुलन बदल दिया।

पौलो फ्रेरे का ‘चिंतन और कर्म के संतुलन का सिद्धांत’ उनके दार्शनिक विश्लेषण का व्यावहारिक पक्ष है। यह सिद्धांत और इसके आधार पर उनका ’45 दिनों का वयस्क साक्षरता मॉडल’ यह दिखाता है कि कैसे उनके दार्शनिक विचारों को जमीन पर उतारा गया। यह शिक्षा के इतिहास का एक क्रांतिकारी प्रयोग था, जिसने ब्राजील के हजारों अनपढ़ गन्ना मजदूरों को केवल डेढ़ महीने में न सिर्फ पढ़ना-लिखना सिखाया, बल्कि उन्हें राजनैतिक रूप से जागरूक नागरिक बना दिया।

1960 के दशक की शुरुआत में, ब्राजील में कानून था कि जो लोग अनपढ़ हैं, वे चुनाव में वोट नहीं दे सकते थे। इसका मतलब था कि देश की आधी से ज्यादा गरीब आबादी राजनैतिक व्यवस्था से बाहर थी। पौलो फ्रेरे ने इस चुनौती को स्वीकार किया और उत्तरी-पूर्वी ब्राजील के अंगिको (Angicos) क्षेत्र में गन्ना मजदूरों के साथ एक ऐतिहासिक प्रयोग किया। पारंपरिक रूप से अक्षरों को रटने में महीनों या सालों लग जाते थे, लेकिन फ्रेरे ने ‘सांस्कृतिक केंद्रों’ (Cultural Circles) के माध्यम से केवल 45 दिनों में 300 मजदूरों को साक्षर कर दिया। यह मॉडल इस प्रकार था –

फ्रेरे और उनकी टीम सीधे क्लासरूम में ब्लैकबोर्ड लेकर नहीं गए। वे पहले कई हफ्तों तक उन मजदूरों के गाँवों में रहे। वे उनके साथ बैठे, उनकी भाषा सुनी, उनके सुख-दुख को समझा। ऐसा करने का उद्देश्य था कि वे उन शब्दों को खोजना चाहते थे जो उन मजदूरों के जीवन में सबसे ज्यादा भावनाएँ और अर्थ रखते थे। फ्रेरे ने इन्हें ‘उत्पादक शब्द’ (Generative Words) कहा है। इस क्रम में उन्होंने मजदूरों के जीवन के इर्द-गिर्द घूमने वाले कुछ ऐसे शब्दों को पहचाना, जो उन्हें सबसे अधिक प्रभावित करते थे और उनकी चेतना पर हावी थे। इस पूरे प्रयोग के लिए उन्होंने केवल 15 से 17 शब्दों की एक सूची तैयार की। ये शब्द केवल व्याकरण सिखाने के लिए नहीं थे, बल्कि सामाजिक वास्तविकता को उजागर करने वाले थे। उदाहरण के लिए शब्द थे: Tijolo (ईंट), Favela (झुग्गी), Trabalho (काम/मजदूरी), Enxada (कुदाल), Salário (वेतन) आदि। ये ऐसे शब्द थे, जिन्हें बोलते हुए मजदूरों के भीतर एक भावनात्मक और राजनैतिक संवेदना जगती थी।

मजदूरों को सिखाने के लिए उन्होंने कोडिंग और डीकोडिंग (The Codification) की प्रणाली अपनायी। अपनी कक्षा में, जिसे वे क्लास नहीं, बल्कि ‘सांस्कृतिक केंद्र’ कहते थे, पारंपरिक रूप से क-से-कबूतर सिखाने के बजाय, वे प्रोजेक्टर या चित्र के माध्यम से एक दृश्य दिखाते थे। उदाहरण के लिए उन्होंने ‘ईंट’ (Tijolo) शब्द सिखाने के लिए एक चित्र दिखाया, जिसमें मजदूर ईंटें बना रहे थे और पृष्ठभूमि में एक आलीशान इमारत बन रही थी। इसके बाद इसी शब्द पर वे संवाद को आगे बढ़ाते थे। उदाहरण के लिए शिक्षक (जो यहाँ केवल एक को-ऑर्डिनेटर था) पूछता था, “यह ईंट कौन बना रहा है?” मजदूरों का जवाब होता था, “हम।” शिक्षक फिर पूछते थे, “यह इमारत किसकी है?” मजदूर कहते थे, “साहूकार की।” शिक्षक संवाद को आगे बढ़ाते थे, “तो आप ईंट बनाते हैं, पर झुग्गी में क्यों रहते हैं?” इसका परिणाम यह होता था कि इस प्रक्रिया में मजदूर केवल ‘ईंट’ शब्द लिखना नहीं सीख रहे थे, बल्कि इससे उनकी ‘समीक्षात्मक चेतना’ (Conscientization) भी जग रही थी। वे समझ रहे थे कि उनके श्रम का फल उन्हें नहीं मिल रहा है।

शब्दों को सिखाने के बाद अगले चरण में वे ध्वनियों का निर्माण सिखाते थे। एक बार जब मजदूर शब्द के राजनैतिक अर्थ को समझ जाते और वे उन्हें बोलना-पहचानना सीख लेते, तब फ्रेरे उस शब्द को अक्षरों और ध्वनियों में तोड़ देते थे। जैसे – ‘Tijolo’ (ती-जो-लो) को अलग किया गया। इसके बाद मजदूरों को सिखाया गया कि इन ध्वनियों को मिलाकर वे नए शब्द कैसे बना सकते हैं, जैसे- ता, ती, तू / जा, जी, जू आदि। चूँकि मजदूर अपनी जिंदगी की कहानी पढ़ रहे थे, इसलिए वे सीखने की इस प्रक्रिया से अत्यधिक प्रेरित होते थे। इसलिए वे बहुत तेजी से अक्षरों को आपस में जोड़कर नए शब्द खुद बनाने लगते थे, जैसे- ‘मेरा काम’, ‘कम वेतन’ आदि।

  1. अभूतपूर्व सफलता: केवल 45 दिनों के भीतर, उन 300 गन्ना मजदूरों ने न सिर्फ अखबार पढ़ना सीख लिया, बल्कि वे स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दों पर अपने विचार लिखकर व्यक्त करने लगे।
  2. राजनैतिक शक्ति: इस साक्षरता अभियान ने रातों-रात ब्राजील के गरीबों को वोटिंग का अधिकार दिला दिया, जिससे देश का राजनैतिक संतुलन बदलने लगा।
  3. सरकार को डर: शासक वर्ग और तत्कालीन सैन्य सरकार इस ‘जागरूक साक्षरता’ से इतनी डर गई कि 1964 में जब ब्राजील में सैन्य तख्तापलट (Military Coup) हुआ, तो पौलो फ्रेरे को तुरंत जेल में डाल दिया गया और बाद में उन्हें देश से निर्वासित (Exile) कर दिया गया। क्योंकि सरकार जानती थी कि अक्षर से लैस शोषित व्यक्ति खतरनाक होता है, लेकिन समीक्षात्मक चेतना से लैस शोषित व्यक्ति पूरी व्यवस्था को बदल सकता है।

पौलो फ्रेरे का प्रैक्सिस और उनका 45 दिनों का मॉडल यह साबित करता है कि शिक्षा कभी भी तटस्थ नहीं होती।यदि आप किसी को केवल क, ख, ग रटा रहे हैं बिना उसे यह समझाए कि उसकी गरीबी का कारण क्या है, तो आप उसे एक ‘आज्ञाकारी गुलाम’ बना रहे हैं। लेकिन यदि आप उसे अक्षरों के साथ उसकी दुनिया को बदलने का ‘प्रैक्सिस’ सिखा रहे हैं, तो आप उसे वास्तविक रूप से ‘मुक्त’ कर रहे हैं।

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कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

Dr. Anil Kumar Roy
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कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

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One comment

  1. स्पष्टता के साथ आपकी प्रस्तुति शानदार है।

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