आरजी कर मेडिकल कॉलेज में जो हुआ, उसने एक बार फिर महिलाओं के खिलाफ हिंसा को सुर्खियों में ला दिया है, जो हमारे अस्तित्व की रोजमर्रा की जिंदगी में अंतर्निहित है – घरों के अंदर, सामाजिक संरचनाओं में और यहाँ तक कि राज्य के उपकरणों में भी।
पूरे भारत में इस घटना को लेकर हंगामा मचा हुआ है। लेकिन क्या यह एक जनआंदोलन में तब्दील होगा, यह एक अलग चर्चा का विषय है। यह हिंसा, चाहे कितनी भी वीभत्स क्यों न हो, भारत में घटित होने वाली पहली घटना नहीं थी (न ही आख़िरी)।
2012 की दिल्ली की घटना, हाथरस में दलित लड़की पर क्रूर हमला, और क़ानूनी और सरकारी तंत्र के माध्यम से न्याय के लिए अंतहीन प्रतीक्षा जारी है। बिहार में ज़मींदारों की निजी सेनाओं के द्वारा दलित महिलाओं पर किए गए क्रूर हमलों में से अधिकांश को दंडित नहीं किया गया है।
कोलकाता की घटना को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, वहीं महाराष्ट्र भी महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के लिए चर्चा में है। उत्तर प्रदेश में एक नर्स के साथ मारपीट की गई, जबकि उत्तराखंड में एक नाबालिग के साथ बस में सामूहिक बलात्कार किया गया और बिहार में एक दलित लड़की के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी गई।
कर्नाटक में एक राजनेता का मामला और उत्तराखंड के एक मामले में राजनेताओं की संलिप्तता यह दर्शाती है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा राजनीतिक व्यवस्था में भी कितनी गहराई तक घुस गई है। महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध हमेशा खबरों में नहीं आते। उनमें से कुछ ही समाचार पत्रों और ऑनलाइन आउटलेट तक पहुँच पाते हैं।
समाजीकरण की प्रक्रिया हिंसा को जन्म देती है। यह समाजीकरण बचपन से ही व्यक्ति के जीवन के हर पहलू को शामिल करता है। यह हिंसा के आख्यानों के बीच विचारों की लड़ाई भी बन जाती है, जो विभिन्न प्रकार के अन्याय को बढ़ावा देते हैं, और इसके प्रति आख्यान भी।
समाज में विभिन्न सामाजिक संबंधों में अंतर्निहित हिंसा के रूप में जो घटित होता है, वह शैक्षणिक रूप से हिंसा को ही पुनरुत्पादित करता है, क्योंकि वर्चस्ववादी विमर्श हिंसा के बारे में है।
यहीं पर असमान समाज में समाजीकरण, उसकी भाषा, शरीर की भाषा और व्यवहार के पैटर्न को आत्मसात् करना महत्वपूर्ण हो जाता है। अपने फ़ील्डवर्क के दौरान निजी मिलिशिया के बंदूक़धारी सदस्यों को देखने के बाद यह स्पष्ट हो गया कि समाजीकरण और अन्य सांस्कृतिक-राजनीतिक प्रक्रियाओं की लंबी प्रक्रिया के माध्यम से हिंसा को कैसे आंतरिक रूप दिया जाता है।
महिलाओं पर नियंत्रण रखने, पितृसत्तात्मक मानदंडों से मुक्त होने के उनके प्रयासों में बाधा डालने तथा नियंत्रण लागू करने के लिए शारीरिक, मानसिक और मौखिक हिंसा का सहारा लेने की रोज़मर्रा की भाषा, यही वह चीज है, जिसके साथ भारत में बच्चे बड़े होते हैं।
स्वतंत्रता ख़तरनाक है, क्योंकि यह शोषणकारी व्यवस्था को दुबारा नहीं बना सकती और अगर यह दुबारा नहीं बनी तो आर्थिक और सामाजिक व्यवस्थाएँ ध्वस्त हो जायेंगी। इसी नियंत्रण के साधन, जिनमें से हिंसा केवल एक है, का आविष्कार किया जाता है।
यह मनोरंजन उद्योग, राजनीतिक व्यवस्था और आर्थिक व्यवस्था के माध्यम से प्रकट होता है। आभासी दुनिया वास्तविकता के साथ विलीन हो जाती है और एक-दूसरे को प्रतिबिंबित करने लगती है। समाज में हिंसा के विभिन्न रूपों को अंजाम देने वाले पत्र इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से बाहर निकल गये हैं और इसके विपरीत भी। हिंसा वस्तु बन जाती है और यह संचयी प्रथाओं में भी सहायता करती है। यह केवल नैतिक मुद्दा या क़ानून और व्यवस्था की समस्या नहीं रह जाती।
समाज और राजनीति में जो कुछ घटित होता है, उससे बच्चे जो सबक़ सीखते हैं, वह उनके लिए शैक्षणिक स्रोत का काम भी करता है। वे जो कुछ भी देखते हैं, उसे बिना किसी फ़िल्टर या प्रति-कथा के आत्मसात् कर लेते हैं।
प्रौद्योगिकी के उपयोग से आम सहमति बनती है।
मार्क्स कहते हैं, “समकालीन समाज की क्षमताएँ (बौद्धिक और भौतिक) पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गई हैं – जिसका मतलब है कि व्यक्ति पर समाज के वर्चस्व का दायरा पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गया है। हमारा समाज आतंक के बजाय तकनीक के ज़रिए केंद्रापसारक सामाजिक ताक़तों पर विजय प्राप्त करके ख़ुद को अलग पहचान देता है।”
हालाँकि, हमने देखा है कि समकालीन समय में व्यक्तियों पर प्रभुत्व सुनिश्चित करने के लिए दोनों साधनों – प्रौद्योगिकी के साथ-साथ आतंक – का भी इस्तेमाल किया जाता है।
एक व्यक्ति जिस चीज का सामना करता है, वह एक साथ उन विमर्शों से घिर जाती है, जो किसी भी वैकल्पिक आख्यान को नकार देते हैं। उदाहरण के लिए, जिसने भी महिला पहलवानों के विरोध प्रदर्शन और उनके इर्द-गिर्द विमर्श और फिर उसके समापन को देखा है, वह इस कठोर वास्तविकता के साथ बड़ा होगा कि महिलाओं के साथ ऐसा व्यवहार ज़रूरी नहीं कि घृणित हो।
कोई भी व्यक्ति, सब कुछ होने के बावजूद, एक राजनीतिक नेता बना रह सकता है। एक तरफ़ यह स्पष्ट घोषणा है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा ठीक है और दूसरी तरफ़ एक विचार-प्रक्रिया है, जो इस विचार को पुरुषों के संरक्षण और महिलाओं से अधीनस्थ व्यवहार करने की अपेक्षा वाले एक पदानुक्रमित समाज के निर्माण में सहायता करती है।
यह विचार फटी हुई जींस के माध्यम से घुटने दिखाने वाली महिलाओं को ‘असंस्कृत’ और ‘मूल्यहीन’ कहने वाली टिप्पणियों में ख़ुद को अभिव्यक्त करता है। या महिलाओं को घर के कामों तक सीमित रहने के लिए उपयुक्त माना जाता है, जबकि पुरुष घर के कमाने वाले होते हैं।
फिर, ऐसे राजनेता भी रहे हैं जो लिपिस्टिक लगाने या बॉब-कट बाल रखने पर महिलाओं के प्रति नाराज़गी रखते हैं।
एक मुख्यमंत्री के कथित टेप से पता चलता है कि किस तरह समुदायों और उनकी महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा प्रायोजित है। इन विचारों को देखने का एक तरीक़ा क़ानून-व्यवस्था के दृष्टिकोण से देखना है, लेकिन यह महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को संबोधित नहीं करता है, क्योंकि यह हमारी समाज और व्यक्तियों के दिमाग़ के सबसे गहरे कोनों में प्रवेश कर चुका है। यह सामूहिक चेतना का हिस्सा है।
परिणामस्वरूप, अपराध के लिए गिरफ़्तार किए गए लोगों के समर्थन में रैलियों आयोजित की जाती हैं, जैसा कि कठुआ मामले में हुआ, या बिल्किस बानो मामले में आरोपियों के वापस आने का स्वागत करने के लिए।
मर्दानगी के प्रतीक, जो मनोरंजन परिदृश्य, राजनीतिक व्यवस्थाओं और शासन मॉडल पर हावी हैं और जो सभी स्तरों पर संस्थाओं को नियंत्रित करते हैं, वे समाजीकरण के अंतर्निहित अंग हैं। वे लड़कों और पुरुषों को शक्ति की ऐसी भावना के साथ बड़ा करते हैं, जो बेलगाम होती है।
जाति, वर्ग, जातीयता और लिंग की जटिलताओं पर चिंतन की आवश्यकता है। यह न्याय का प्रश्न है, जितना कि असमानता का, जो अन्याय को जन्म देती है। मुंबई में हुई घटनायें, जिसमें कुलीन इलाक़ों के लोगों ने बहुजन महिलाओं को भगा दिया, लिंग आधारित संबंधों की व्यापक अस्वस्थता और जटिलताओं का संकेत हैं। व्यवस्था में, विचार प्रक्रियाओं में व्याप्त हिंसा के अपने पूर्वाग्रह हैं, जिनमें वर्गीय पूर्वाग्रह भी शामिल हैं।
राजनीतिक व्यवस्था को ख़ुद में आमूलचूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है और यह कोई अमूर्त श्रेणी नहीं है – नीतियाँ बनाने वाले लोगों और मामलों का प्रबंधन करने वाले लोगों को लैंगिक संबंधों को देखने के मामले में ख़ुद को बदलने की आवश्यकता है। कुश्ती लड़ने वालों के मामले में इस तरह के मामलों के निर्णय में देरी से यह स्थापित होता है कि शक्तिशाली लोगों के मामले में व्यवस्था धीमी गति से काम करेगी। कुछ मामलों का मनमाना स्वप्रेरणा से संज्ञान लेना और अन्य का नहीं लेना उन लोगों के लिए शैक्षणिक बन जाता है जो महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के तरीक़े को ध्यान से देखते हैं और इसे दुहराना सीखते हैं। राजनीतिक व्यवस्था को यह समझना चाहिये कि यह चेतना के बहुत गहरे परिवर्तन का सवाल है; लेकिन यह राजनीतिक परियोजना कहीं नज़र नहीं आती।
यह पोस्ट मूल रूप से अंग्रेज़ी में यहाँ प्रकाशित हुई थी: https://www.deccanherald.com/opinion
रवि कुमार साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र पढ़ाते हैं।
डेक्कन हेराल्ड पर रवि कुमार के लेख - यहाँ पढ़ें






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