दो गुंडों में जो जीता, वह हीरो कहलायेगा कि नहीं? हीरो कौन होता है? सीधी भाषा में समझें तो जो जीवन के पक्ष में होता है, हीरो है। आपने कभी खूनी, लुटेरों, बलात्कारियों को अपना हीरो माना है। वैसे देश-काल की दशा-दिशा देखकर लगता तो नहीं है कि यह परिभाषा वर्तमान मनमानस पर लागू है। अब तो गुरु और बाबा जी भी जीवन के पक्ष में नजर आते नहीं दिखते। गुरु द्रोण भी कहाँ पाण्डवों का साथ निभा पाए थे? आज के बाबा रामदेव को ही देख लीजिए, सुना है लोगों ने अब उन्हें “लाला” की उपाधि दे डाली है। आए थे योग सिखाने, धंधा खोलकर बैठ गए। सुना है हरिद्वार में जमीनें तक हड़प ली हैं, लालाजी ने। आधे से ज़्यादा तथाकथित बाबा जेल में हैं, बाक़ी जो बेल पर हैं, वे भी देश में क्लेश फैला रहे हैं। ठीक वैसे ही, जैसे सरकार धर्म के नाम पर अपना उल्लू-सीधा कर रही है। उनकी गद्दी की भूख में हम, भारत के लोग, भूखे झाल बजाकर सो रहे हैं। हम कब तक सोने वाले हैं? कब तक हम झाल बजायेंगे?
चलिए! मैं आज आपको एक सपना दिखता हूँ। हर सपना एक कहानी नहीं तो और क्या है? क्या हमारा जीवन एक कहानी ही नहीं? जीवन के साथ भी एक कहानी चल रही है, और जीवन के बाद जो बच जाता है, वह भी तो कहानी ही है। क्या होती है कहानी?
आइए! एक नजर डालते हैं कहानियों पर, क्योंकि दर्शन का वाहक होती है कहानियाँ। तभी तो दर्शन गौण हो गया, क्योंकि दार्शनिकों ने अपना काम साहित्यकारों पर छोड़ दिया। और धीरे-धीरे सारे साहित्यकार पत्रकार बन गए। अब कोई कल्पना नहीं करता। कोई कहानी ऐसी नहीं लिखता जहाँ एक नया फ़लक हो, एक नया जीवन, एक नई उम्मीद दिखे। हॉलीवुड में कुछ ऐसी कहानियाँ दिखती हैं। पर, वहाँ भी जीवन संकट में ही नजर आता है। बड़ी मुश्किल से अंत में थोड़ी राहत मिलती है। हमारे देश का सिनेमा तो लगता है पत्रकारिता कर रहा हो। जो सच हमें समाचार में देखना था, चलचित्र में देखना पड़ रहा है। साहित्य हॉस्पिटल में अपनी अंतिम साँसें गिन रहा है। बचा लो कहानियों को! तभी तोअपने बच्चों को कोई अच्छी कहानी हम सुना पायेंगे।
किसी भी अच्छी कहानी के सात घटक होते हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण घटक होता है — एक कमजोरी, एक अभाव, एक जरूरत। अगर किसी को कुछ चाहिए ही नहीं तो कहानी कैसी? किसकी? अब जिसकी जरूरत होगी, उसे ही इच्छा होगी।
इच्छा हुई कहानी की दूसरा कारक, जो इस दुनिया में हमारे अस्तित्व को अर्थ तक देता है। होगा अगर कोई ईश्वर कहीं, और हम और हमारी यह दुनिया उसकी इच्छा होगी, तब भी वह परमात्मा तो नहीं तो सकता। क्योंकि जैसे ही इच्छा आएगी, और उसके पूरे होने में कोई अवरोध होगा। तो विरोध पैदा हो जाएगा, क्यों वह इच्छा पूरी नहीं हो रही है?
कहानियों का तीसरा अंग ही “विरोध” है। विरोध होगा तभी तो कहानी बनेगी। वरना मुझे साँस चाहिए, और मैं ले पा रहा हूँ, तो यह कहानी क्या निरर्थक नहीं हो जाएगी। कौन सुनाएगा? कौन सुनेगा? पर दिल्ली की कहानी कुछ और है? वहाँ साँस लेना मुश्किल होता जा रहा है। इसलिए कहानियाँ भी बन रही हैं। देखिए ना! पत्रकार तो पत्रकार, अब तो साहित्यकार भी साँस की समस्या लिए हस्पताल जा रहे हैं। और हालात ऐसे हैं कि हस्पताल और पाताल में ज़्यादा का अंतर पता ही नहीं चलता। अगर नरक भी होता तो ऐसा ना होता। लगता है यहाँ पातालोकतंत्र चालू है।
खैर, जरूरी यह नहीं कि अवरोध है। जरूरी तो वह प्लान है — कहानी का चौथा अवयव — वह अनुमान है, वह रास्ता है, जिस पर चल कर हीरो अपनी इच्छा को पूरी कर पाए। हम, भारत के हर लोग प्रदूषण से परेशान हैं, और निदान चाहते हैं, तो हमारे पास कोई तो प्लान होना चाहिए। यही जिम्मेदारी हमने सरकार को उधार दी थी। अब तो लगता है हमारे सवाल भी घंटा बन गए हैं। खैर, समस्या सरकार नहीं — प्रदूषण है, अशिक्षा है, स्वास्थ्य है, अर्थ का आवंटन है। कहानी के पाँचवें घटक तक पहुँचने से पहले मैं आपको वह सपना दिखता हूँ। विस्तार से यह परिकल्पना मेरे ब्लॉग और पब्लिक पालिका के वेबसाइट पर मिल जाएगी। एक-दो दशक से मैं यह सपना बुन रहा हूँ।
जितना पैसा हम सरकार को दे रहे हैं, वह प्रचार-प्रसार में ही खर्च कर देती है। जब देश वैश्विक स्तर पर आर्थिक संकट से गुजर रहा है, तब कल प्रधानमंत्री सोमनाथ में पतंग उड़ाते दिखे। इधर देश-प्रदेश की मूर्ख मंडली क्रिसमस पर हनुमान चालीसा का पाठ कर रही है। कितने द्वन्द्व में हम सभी जी रहे हैं। करें तो करें क्या? नौकरी मिल नहीं रही, धंधा भी मंदा है। हिंसा कभी समाधान नहीं हो सकती, क्योंकि मृत्यु मुक्ति नहीं है। हिटलर मुक्त नहीं हो पाये, या हो गए? मुक्ति का तो पता नहीं, अपने कर्मों से वे अमर तो ज़रूर रहेंगे। अमर सिर्फ़ सुर ही नहीं, असुर भी तो होते हैं। पर, जब हम कृष्ण, बुद्ध, यह गांधी की कहानी सुनते हैं, तो मुक्ति का बोध होता है। गांधी जी को तो गोली मार दी गई थी। पर, उनकी ज़रूरत देश को आज भी महसूस होती है।
मेरा सपना सरल है, सीधा है। सपना वही है, जो बापू ने दिखाया था। ग्राम स्वराज का सपना। उनकी सिर्फ़ इच्छा ही नहीं थी, उनके पास प्लान भी था। ट्रस्टीशिप या सरपरस्ती से इस मुकाम को हासिल किया जा सकता है। उन्होंने विस्तार से अपना दर्शन समझाया भी है। आज भी स्कूल, कॉलेजों में पढ़ाया जाता है। पर, जैसा कि हर कहानी में हर हीरो के साथ होता है, उनके सामने भी अवरोध थे। उन्होंने तब असहयोग आंदोलन की लड़ाई लड़ी। “युद्ध” ही कहानी का पाँचवाँ घटक भी है। क्या आज भी हम असहयोग आंदोलन करने में अपना सहयोग नहीं दे सकते? हम केंद्र सरकार को कम और अपनी आय से ज़्यादा कर स्थानीय राजनैतिक और प्रशासनिक इकाई को दें। और बदले में अच्छे स्कूलऔर हॉस्पिटल माँगें। क्या आप किसी शिक्षित दीक्षित प्राणी से अभद्रता की अपेक्षा पाल सकते हैं?
कहानी जब अपने छठे पायदान पर पहुँच जाती है, तब आत्म-ज्ञान मिलता है। सारे रहस्यों से पर्दा उठता है। इच्छा पूरी होने में किए हर प्रयोग से सीख मिलती है। योजनानुसार क्या हुआ, क्या नहीं, इसका पता चलता है। उन कमज़ोरियों का भी रहस्योद्घाटन होता है, जो हीरो को कहानी की शुरुआत में पता नहीं होता।
और अंत में जब कहानी अपना सातवाँ फेरा लेती है, तब हमारे पास एक नई दुनिया होती है। होती तो वही है, बस वक्त बदल जाता है, जज़्बात बदल जाते हैं, हालात बदल जाते हैं।
क़िस्से बदल जाते हैं,
कहानियाँ नहीं बदलती।
किरदार बदल जाते हैं,
उनकी फ़ितरत नहीं बदलती।
हालात बदल जाते हैं,
परिस्थितियाँ नहीं बदलती।
हर साल मंजर बदल जाते हैं,
उनकी ख़ुशबू नहीं बदलती।
जीवन की जंग बदल जाती है,
उस पर जीत के फ़साने नहीं बदलते।
और जो बदल नहीं पाते हैं,
उन पर कहानियाँ नहीं बनती।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)








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