सड़कों पर गड्ढे हैं, या गड्ढों में सड़क। हिचकोले खाती गाड़ी अपनी मंजिल तक पहुँच तो जाती है, पर कमर टूट जाती है। काश हमें पता होता कि कौन है इसका जिम्मेदार? कल कोई नाले बनाने वाले बड़े-बड़े पाइप सड़क किनारे बेतरतीब छोड़कर बेपरवाह चला गया। मैं देखता रह गया, उन पाइपों को। सोचा कोई ब्लिंकिट वाले भैया इससे टकरा गए, तो उनकी इंजीनियरिंग वाली डिग्री का क्या होगा?
मैंने सोचा इस ज्ञान युग में एक ऐसा माध्यम बनता हूँ, जहाँ जनता सवाल सीधा सरकार से, अधिकारी से पूछ सके। अपनी छोटी से बड़ी समस्या की जिम्मेदारी का हिसाब ले सके। माने कोशिश शुरू की। कुछ लोगों को मनाया, अपनी योजना बतायी। सब बड़े प्रभावित दिखे। पहले सबने हाँ-में-हाँ मिलाया। दूसरे दिन एक ने मुझसे सवाल पूछा — यह सब तो ठीक है, पर पैसा कैसे आयेगा? हर काम पैसे के लिए होता है, इस दुनिया में। अर्थ के बिना मुद्रण बटोरते जाना ही तो भ्रष्टाचार है।
कभी सोचा है, कागज के टुकड़े, जिसकी क़ीमत उतनी भी नहीं होगी, जितनी उस पर छपी है, नहीं बचा तो क्या होगा? चलिए एक वैचारिक प्रयोग करते हैं। मुश्किल नहीं है। आप बस मेरे साथ चलिए।
कुछ साल पहले की बात है — नोटबंदी हो गई। सरकार ने कहा ५०० और १००० के नोटों की अब कोई औक़ात नहीं बची। अब, अब क्या? लोग लगे नोट जलाकर अपनी औक़ात दिखाने। खैर! छोड़िये अभी ईरान में क्या हो रहा है। लाखों की एक रोटी मिल रही है। ऐसा ही कुछ दुनिया के कई हिस्सों में हो रहा था, जब दूसरा विश्व-युद्ध हुआ था। प्रलय और सृजन में कोई अंतर नहीं है। और समय का पहिया घूमता ही रहता है। देखिए! आज ही खबर मिली है कि अमेरिका को ग्रीनलैंड चाहिए। जो है, जितना है वह सम्भाल रहा नहीं, और चाहिए। सरकारों ने जिस दिन चाहा, उस दिन पैसा बस एक दिलजले आशिक़ का प्रेम पत्र बनकर रह जाएगा।
बिना उत्पादन, बिना अर्थ के सृजन पैसा कमाने की कला को ही दलाली का नाम दिया गया है। आज देश काल की सबसे बड़ी विडंबना ही यही है कि दलालों की जनसंख्या भारी मात्रा में बढ़ गई है। जयचन्दों की फौज खड़ी है। और एक बच्चे को इस फौज से लड़कर पढ़ना भी है, फिर किसी तरह एक नौकरी करनी है, फिर शादी, और बच्चे पालकर अपना पितृ ऋण भी उतारना है। इतना काम! बच्चे की जान लोगे क्या?
जी! जान ली तो जा रही है। पानी से लेकर कफ सिरफ पीकर ही नहीं, हॉस्पिटल के वार्ड में आग लग जाने से नवजात शहीद हो गए, स्कूल से लेकर यूपीएससी के विद्यार्थी अपनी ही अर्थी अपने ही कंधों पर उठा रहे हैं। बच्चे तो बच्चे उनके बाप भी कहाँ सुरक्षित हैं? किसान हो, मजदूर, रिपोर्टर हो, या बीएलओ सब जनाजे में चले जा रहे हैं। पता भी नहीं आज मरा कौन? बस जाना है, चले जा रहे हैं। बस निर्देश मिल रहे हैं, दिशा गायब है। ऐसी दशा में हर बाप अपने बच्चे की शिक्षा पर लाखों खर्च कर रहा है। अब खर्चा होगा तो कहीं से तो वसूलना होगा। बच्चा तो बच्चा, बाप भी परेशान, किया क्या जाए? इधर माँ बीमार पड़ गई, तो बहन को अपनी डिग्री से तौबा करना पड़ा। कंगाली में आटा गीला, रातों-रात नोटबंदी हो गई। कल बहन की शादी है, और दहेज वाले नगद माँगकर अब लेने से मना कर रहे हैं। अजीब लोक है, और इसका तंत्र।
बात पैसे की थी। और मेरे पास एक सपना था, जहाँ हम लोक को तंत्र से मिलवा पायेंगे। इसलिए मैंने सोचा कुछ मार्केट से काम उठाकर पहले कुछ पूँजी इकट्ठा कर लूँ। बहुत मेहनत की, कई वेबसाइट बनाए, एक नामी स्कूल के लिए स्कूल मैनेजमेंट सिस्टम बनाया। काम देखकर ऑस्ट्रेलिया से भी एक क्लाइंट का ऑर्डर मिला, होटल मैनेजमेंट सिस्टम का। हमारी ख़ुशी की सीमा नहीं थी। पर मैं अंदर से उदास होने लगा था। मुझे जो करना था, वह मैं नहीं कर पा रहा था। फिर भी मैंने उनका काम पूरा किया, जिस दिन उनके सर्वर पर मैंने अपना सिस्टम डाला, उस दिन के बाद से उनका फ़ोन नहीं लगा। पैसा भी नहीं मिला। दोस्त यार जिन्होंने भी साथ दो पल सपने देखे थे, वे भी गायब हो गए।
एक अरसा हुआ किसी दोस्त से बात किए। मैंने सोचा इस तंत्र में पैसा कमाकर भी घंटा उखाड़ लूँगा। इसलिए मैंने कमाने का सपना देखना ही छोड़ दिया। घर से निकलना भी, मैंने सोचा अगर मुझे अपना सपना साकार करना है, तो पहले मुझे तो पता होना चाहिए मुझे क्या चाहिए। इसलिए पहले मैंने दर्शन पढ़ा, बाक़ी सामाजिक विज्ञान का अध्ययन का मौक़ा मुझे यूपीएससी की तैयारी के दौरान मिला था। फिर मैं लिखने बैठ गया। शब्दों के आईने में मुझे आनंद मिला। आप भी आनंद लीजिए :
एक घड़ी ही है,
जो अनवरत चलती जाती है,
जब तक बैटरी निपट ना जाये!
समय फिर भी नहीं रुकता!
वह दूसरी घड़ी में चलने लगता है,
जब घड़ी दस बजकर दस मिनट,
बजते ही खिलखिलाती है,
मैं भी उसे देखकर हँस पड़ता हूँ!
जीवन बीतता हुआ यह समय ही तो है,
जहाँ मुस्कुराने के मौक़े कम ही मिल पाते हैं,
कारण की अनुपलब्धि कम,
और अभावों का बोझ ही बड़ा भारी है!
जानता हूँ कि मर जाना है,
एक दिन, शरीर से परे चले जाना है, फिर?
फिर, क्यों इस नश्वर शरीर की इतनी चिंता करता हूँ?
जब मेरा मन जानता है कि मैं अमर हूँ!
ब्रह्म हूँ मैं,
पर मैं अकेला ब्रह्म तो नहीं,
तत् त्वम् असि,
मैं भी आप जैसा ही तो हूँ!
फिर क्यों मुस्कुराने की ज़रूरत नहीं जान पड़ती?
हर दिन घड़ी भी दो बार इज्जत से हँसती है,
विज्ञापनों और तस्वीरों में हर घड़ी,
हर घड़ी विहंसती है!
क्यों विज्ञापनों वाली शक्ल बनाने के चक्कर में…?
क्यों हम अपनी अभिव्यक्ति का शृंगार करते हैं?
क्यों खुलकर हम रो नहीं सकते?
क्यों हँसने से पहले हम दो बार सोचते हैं?
क्यों हम गालियाँ नहीं दे सकते?
क्यों अभिव्यक्ति के शृंगार को संस्कार से तौलते हैं?
क्यों अपने सौंदर्य को छिपाकर हम अपना मेकअप दिखाते हैं?
क्यों धर्म के ड्रामा को सभ्यता की पहचान समझते हैं?
क्यों भगवान को हम कहीं और तलाशते हैं?
क्यों हर समय, हर स्थान पर हम ख़ुद का मंदिर नहीं बनाते?
क्यों धारण करने की जगह धर्म की राजनीति का नाजायज़ मज़ा मार रहे हैं?
क्यों घड़ी से बेफिक्र समय की तरह हम ख़ुद के लिए, ख़ुद की ख़ातिर, ख़ुद से ईमानदार नहीं हो सकते?
चुनाव हमारा है – घड़ी चाहिए या समय?
मेरा सपना आज भी ज़िंदा है। मुझे तो बस समय चाहिए। आपने कभी सोचा है, इस दुनिया में अनंत क्या है? सही समझा — समय। आप ख़ुद सोचिए! आप कितनी जगह अभी हो सकते थे? आप अगर वहाँ हैं, तो इसलिए क्यूंकि वहाँ आपका होना जरूरी है। अपनी जरूरत समझिये। कितना मुश्किल है?

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)








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