मैं गोवा में हूँ। जब पूर्णिया से गोवा के लिए फ्लाइट उड़ान भरी, तो मन में तरह-तरह के विचार आ-जा रहे थे। थोड़ी देर में फ्लाइट धरती से बहुत ऊपर बादलों के ऊपर चली गई। बादलों की सफेद चादर बिछी हुई थी। मैं फ्लाइट की खिड़की से बादलों को देख रहा था और मेरे अंदर तरह-तरह के इमेज बन बिगड़ रहे थे। वह कभी बादलों की बस्ती- सा दिखता, कभी बादलों के जंगल। वे कास के फूल लगते, कभी भेड़ों के झुंड तो कभी भेड़ों की देह की रूई। बादल अजीब अजीब से रूप ग्रहण कर रहे थे। यों कभी वे काले नहीं हुए। फ्लाइट की रफ्तार के अनुसार मैं उसे देख पा रहा था। मुझे लगता कि बादलों की खेती हो रही है तो कभी बादलों छोटे-बड़े घर दिखाई पड़ते। मटमैले धुएँ के बीच सफेद बादलों का घर अजीब-सा दृश्य उत्पन्न करता। यों मैंनै कई बार फ्लाइट से सफर किया है। हर बार उसके अनुभव अलग-अलग हैं। फ्लाइट पर पूर्णिया में सवार होने के लिए यात्री आगे बढ़े तो आपाधापी यहाँ भी मौजूद थी और हैदराबाद से गोवा के लिए फ्लाइट ली, तो वहाँ भी। जबकि सीट निर्धारित है। मन में असुरक्षा नहीं होनी चाहिए, लेकिन कुछ है, जो आदमी को संयत रहने नहीं देता।
हैदराबाद में फ्लाइट लगभग एक घंटे लेट हो गई। गोवा उतरा तो साढ़े ग्यारह बज रहे थे। वहाँ गोवा के मित्र टैक्सी लेकर आ गये थे और जब निवास स्थान पर पहुँचा तो एक बज रहा था। थकान तो हो ही गई थी। यात्रा पर जब निकलने का समय होता है तो यात्रा पर जाने की अनिच्छा बलवती हो जाती है। पहले ऐसा होता नहीं था, लेकिन आज यह अनिच्छा कुछ ज्यादा चेतना पर सवार है। गोवा में तीन दिन रूक कर मालवण में तीन दिनों की राष्ट्रीय चिंतन शिविर है। शिविर में शामिल होने की इच्छा इसलिए भी थी कि मैं जान सकूँ कि साथी क्या चिंतन कर रहे हैं। वे देश और दुनिया पर छाये संकट का सामना कैसे करना चाहते हैं? साथियों ने आपातकाल को देखा, महसूसा और लड़ा है। जयप्रकाश नारायण और डॉ लोहिया से जिनकी मुलाकातें हुईं हैं। मालवण के समुद्र किनारे पर विचारों के मंथन से अमृत निकलेगा या विष – कहा नहीं जा सकता। देश में सागर, नदी और जंगलों में वैचारिक मंथन हुए हैं और उनसे दुनिया को देखने की नयी दृष्टि मिली है।
मौजूदा दुनिया वैसी ही नहीं है, जैसी गांधी, जयप्रकाश और डॉ लोहिया के समय थी। उनके बाद दुनिया बहुत बदली है और उसके नये नये रूप हमारे सामने हैं। यह दुनिया आज नदी, सागर और जंगल के खिलाफ खड़ी है। जिन कारकों से दुनिया का सृजन हुआ है, आज नयी दुनिया को उत्पादित करने के लिए उनके खिलाफ ही खड़ी है। गोवा लोग मौज-मस्ती के लिए आते हैं। मेरे साथी हैं। कभी इतनी देर साथ साथ रहने और बात करने का अवसर नहीं मिला था। आज उनकी बेमिसाल सामाजिक और क्रांतिकारी यात्रा के बारे में सुना। उनकी यात्रा सार्वजनिक होना जरूरी लगता है। सामाजिक रुढ़ियों के खिलाफ जीवन जीने में कितनी कठिनाई होती है, इससे रूबरू हुआ। आज जिस तरह से उपभोक्ता बन कर जीवन जी रहे हैं, उसमें क्रमशः मानव छीजता जा रहा है। मनुष्य एक नंबर नहीं है, न वह महज खरीदार है। मानवीय गरिमा के बिना हम जो दुनिया बनायेंगे, वह लूट और आपाधापी की होगी।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







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