शिशिर और वसंत में धींगामुश्ती हो रही है। प्रकृति भी अद्भुत है। कुछ पेड़ों के पत्ते पीले हैं तो कुछेक के नवजात। कुछ पत्ते झड़ रहे हैं तो कुछ जन्म ले रहे हैं। सृजन और संहार। प्रकृति स्वाभाविक रूप से यह क्रिया दुहराती है। शिशिर में भी सौंदर्य की कमी नहीं होती। बाँस के लाखों पत्ते पीले हैं। बगल में सखुआ के चौड़े पत्ते पड़े हैं। घास ने भी अपना रंग बदल दिया है। आम अंखुआया हुआ है। किसी में मंजरियाँ आ गयी हैं। कोई मंजरियों को लाने की तैयारी कर रहा है।
पेड़ जातिवाचक संज्ञा है, मनुष्य भी। पेड़ आपस में टकराते नहीं, न स्पर्द्धा, न प्रतियोगिता। मनुष्य में ये दोनों भाव तो हैं ही, इसके अलावे अन्य भाव भी हैं। वह इतना ताकतवर है कि प्रकृति के अनेक पेड़ों के स्वभाव बदल रहा है। वह उसके जीन को ही इधर-से-उधर कर रहा है। मनुष्य लोभी तो होता ही है, सृजनशील भी होता है। उसके लोभ पर नियंत्रण न हो तो वह विद्रूप भी हो सकता है। सृजनात्मकता को भी रास्ता चाहिए। मनुष्य में प्रकृति के दोनों गुण मौजूद हैं – सृजन भी और संहार भी। प्रकृति का अपना स्वभाव है। वह किसी से ट्रेनिंग नहीं लेती। मनुष्य के साथ ऐसा नहीं है। वह जन्म लेता है और माँ-पिता, सगे-संबंधी, समाज और परिस्थितियाँ उसे ट्रेन करने लगते हैं।
योगी आदित्यनाथ को ट्रेनिंग समाज से ही मिली है कि योगी का बाना धारण करो, कहलाना पसंद करो योगी, लेकिन योग को परित्याग करो। योगी अगर भगवा पहनने मात्र से होता तो हर गली में दो-चार योगी मौजूद रहते। योगी में होता है – संयम, धैर्य, मनुष्य के प्रति अगाध संवेदना। योगी आदित्यनाथ में ये गुण विस्थापित होकर दूसरे गुण आ गये हैं। घृणा, असम्मान, अहंकार, असभ्यता, मिथ्या भाषण। शासन में विवेक न रहे तो वह अराजक और मनुष्य विरोधी हो जाता है। अहंकार का अतिरेक विवेकहीनता को जन्म देता है। तात्कालिक रूप से अहंकार संभव है कि अतिरिक्त गौरव प्रदान करे, लेकिन इतिहास इसके प्रति निर्मम होता है।
सुप्रीम कोर्ट को देखिए। उसके फैसले कितने विवेकहीन और निर्मम हैं। उसने फैसला दिया है कि घरेलू और अन्य सेवाओं में लगे महिलाओं / पुरुषों की न्यूनतम मजदूरी तय नहीं की जा सकती और अगर तय की जायेगी तो उसे अमीर लोग काम नहीं देंगे और नतीजा होगा कि लोग बेरोजगार हो जायेंगे। यानी एक वर्ग को सुप्रीम कोर्ट छूट दे रहा है कि आप जो चाहे, करें। सेवा करने वाले लोगों की सेवा की कीमत मालिक तय करेगा। सेवा निर्धनों की और मनमानेपन अमीरों के। यह देश किसका है भाई! किसके बूते कोर्ट और संसद है? इतना बहकना भी ठीक नहीं। आप जज हैं, अमीरों के दलाल नहीं हैं। आप कुतर्क नहीं कर सकते। आपकी कुर्सी और शानो-शौकत के पीछे मजलूमों के ही हाथ हैं।
चुनाव आयुक्त का कितना बड़ा पद है? इंडियन सिविल सर्विस से आये हैं। उनसे सीसीटीवी फुटेज की माँग की गई तो उनका कुतर्क था कि सीसीटीवी फुटेज देने से महिलाओं की इज्जत चली जायेगी। हम कैसे अविवेकी और तर्कहीन युग में रह रहे हैं! तथाकथित सभ्य लोग इतने असभ्य हो गये हैं! ज्ञान और बुद्धि इस राह चल पड़े तो उस देश के लोगों को पुनर्विचार करना चाहिए कि कहाँ आ गये हम। सत्ता अगर पाखंडी और अधर्मी हो जाय तो उसे पाठ जरूर पढ़ाना चाहिए। वरना, इतिहास में यह भी लिखा जायेगा कि विवेकहीनता सत्ता में ही नहीं थी। लोग भी उसके शिकार थे, खासकर वे जिन्हें आप सचेत और समझदार वर्ग कहते हैं।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






