इन दिनों : लोकतंत्र, नागरिक-बोध और हत्यारे

"सच बहुत कड़ुआ होता है, मगर एक समय ऐसा आता है कि बोलना पड़ता है। न चाहते हुए भी, लबों पर सच फूटने लगता है। क्योंकि सच बोलना समाज के जिंदा रहने का प्रतीक है।" - इसी आलेख से
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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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