यह तो होना ही था। बिहार इतिहास बनाता है। अपने बने इतिहास को खुद ही बिगाड़ता है। गंदगी गींजने में इसका कोई जवाब नहीं है। एक मंत्री हैं अशोक चौधरी। बहुरंगे हैं। पहले कांग्रेस में थे, अब जदयू में हैं। माननीय किशोर कुणाल के समधी हैं। वे जदयू की अखंड सेवा कर रहे हैं तो उनकी बेटी शांभवी चौधरी लोक जनशक्ति पार्टी की सेवा कर रही है। बिहार की यह भी फितरत है कि बाप अगर कांग्रेसी है तो बेटा बीजेपी और पत्नी जनसुराज में निवास कर सकती है। जनसुराज के प्रशांत किशोर ने अशोक चौधरी पर मेवा खाने का आरोप लगाया था। अगर राजनीति में बहुत दिनों से मंत्री की कुर्सी पर जमे हों तो बोली बिगड़ ही जाती है। उसमें भी वे ऐसे मुख्यमंत्री के मंत्री हैं, जो पूर्व मुख्यमंत्री को ‘ई लड़की’ कह कर पुकारते हैं। मुख्यमंत्री ही बेपटरी हैं तो मंत्री पटरी पर क्यों चले? उसमें भी वह जो 58 साल में सहायक प्रोफेसर हुआ है। मजाक है। इतने गुणी राजनेता जब सदन में एक एम एल सी को ‘चोट्टा’ कहता है तो क्या बुरा करता है? वह मंत्री है, मुख्यमंत्री का दुलरूवा है। वह चाहे तो एम एल सी को पीट सकता है। आखिर वह बरबीघा का रहने वाला है। कोई मामूली बात है। जब मंत्री के बोल बिगड़े तो एम एल सी क्यों चुप रहे? उसने भी सदन में अपने जानते भारी भरकम अपशब्द कहा- चोर। रे, बे, तुम-ताम तो खूब हुआ। किसी ने लोफर कहा, किसी ने टपोरी। मुख्यमंत्री को भी ‘बुड्ढा लड़का’ लोफर है, कहा गया।
वाह रे बिहार और बिहार के राजनेता! देश की आजादी के लिए पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने के क्रम में चौदह-पंद्रह वर्ष के स्कूली बच्चों ने सीने पर गोली खायी थी, इन लोगों ने उन बच्चों की शहादत को शर्मसार किया है। आज जिस सदन में बैठ कर गालियाँ बक रहे हैं, उस सदन से अंग्रेजों को बेदखल करने में कितनी माँओं की कोख सूनी हुई होगी! राजनेताओं की यह बिरादरी खाये, पीये और अघाये लोग हैं। इन्हें लफंगों से कोई परहेज़ नहीं है। किसी के पास अनंत सिंह है तो किसी के पास अशोक महतो।
संसदीय राजनीति वह अखाड़ा है, जहाँ नीति नहीं पलती, अनीति निवास करती है। मुख्यमंत्री पद पर कैसे-कैसे लोग बैठ गए हैं। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा की बोली सुनिए। खुलेआम कह रहा है कि मियां के चार से पाँच लाख मतदाता हटेंगे। कौन होता है मुख्यमंत्री, जो मतदाता को शामिल करने के बजाय हटाने की बात करे। वह बात करता है, क्योंकि उसके माथे पर जिसका हाथ है, वह भी उसी राह का राही है। अगर राही नहीं रहता तो हिमंता को बर्खास्त कर दिया गया होता। संविधान की बोटी बनाकर ये लोग चबा रहे हैं।
महाभारत कथा में लिखा हुआ है कि जब द्रौपदी का चीरहरण होने लगा तो कर्ण ने द्रौपदी को वेश्या कहा, भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य आदि चुप रहे। दु:शासन ने जंघा पर द्रौपदी को बैठने के लिए कहा। माननीयों का यह कुकर्म ख़ून की नदियों में तब्दील हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, हिमंता बिस्वा, आदित्यनाथ सिंह आदि समझ लें कि वे महाभारत का आह्वान कर रहे हैं। समय रहते नहीं चेते तो महाभारत-कथा से भी बुरा हश्र होगा। जो लोग आज खामोश हैं या समर्थन में तालियाँ पीट रहे हैं, वे सिर्फ अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अन्याय का समर्थन कभी फलदायी नहीं होता। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने कभी लिखा था-
“समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।"

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







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