
"दरअसल सरकार समझने में असमर्थ है कि राज्य के विकास में काम चाहिए। भ्रष्टाचार मुक्त सरकारी दफ्तर चाहिए। सम्मान से जीने के संसाधन चाहिए। पेट को अन्न चाहिए।" - इसी आलेख से

चिकित्सा और वकालत - दोनों ऐसे पेशे हैं, जहाँ पीड़ित और परेशान लोग ही पहुँचते हैं। परंतु दोनों ही जगहों पर उनकी पीड़ा और परेशानी का लाभ उठाया जाता है। इन पेशों में किसी के दुख का इस्तेमाल लाभ पाने के साधन के रूप में किया जाता है।

"ज्ञान के विस्फोट हो जाने के बाद भी हमने सम्मान के साथ जीना नहीं सीखा है और न दूसरे को सम्मान के साथ जीने देना चाहते हैं। नफ़रत और हिंसा मूलमंत्र बन गई है।" - इसी आलेख से

"जिसे कोई काम न मिला, वह देश चला रहा है। घर भर रहा है। जिसे काम मिला, वह मजे कर रहा है। शहर-दर-शहर में अपार्टमेंट पीट रहा है।" - इसी आलेख से

"संसद में भी काँव-काँव हो रहा है। मैं अपने गाँव में देखता था कि दो औरतों ने लड़ाई की शुरूआत की, फिर उनके साथ अन्य औरतें झींका देने आ गई। खूब लड़ाई हुई। गर्जन भी और गालियाँ भी। सभी को मालूम है कि नतीजा कुछ नहीं आयेगा। संसद की हालत गाँव की गली से बदतर है।" - इसी आलेख से

बात केवल शिक्षा के लिए समर्पित स्वतंत्रता सेनानी दीप नारायण सिंह के मकान में जिला जज का आवास बनाने और लाजपत पार्क में लाला लाजपत राय की कोई निशानी नहीं होने भर की नहीं है। बात है एक मुकम्मल इतिहास को दफ़न किए जाने की।

"बहुत से लोग इन पर हंसते हैं। जो हंस नहीं पाते, वे विश्वास करते हैं। जो विश्वास नहीं करते, उन्हें भी लगता है कि क्या ठिकाना, जो कह रहे हैं, वही सच हो।" - इसी आलेख से

संसद अब सवाल और जवाब नहीं, आरोप और प्रत्यारोप की जगह हो गयी है। राष्ट्र के अस्तित्व और लोकतंत्र की बुनियाद के जरूरी प्रश्न भी भद्दी बहसों में खो जाती है।

"मान लिया कि उन्हें महात्मा गांधी और नेहरू पसंद नहीं है। उनकी तस्वीरें हिन्दू महासभा और आरएसएस के दफ्तरों में नहीं लगाती जा सकतीं। कम-से कम-सरदार पटेल, रवीन्द्रनाथ टैगोर, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और सुभाष चन्द्र बोस की तस्वीरें तो लगाते। मगर किसी आर एस एस के दफ्तर में इनकी तस्वीरें नहीं हैं।" - इसी आलेख से

यह देश आज भी अस्त-व्यस्त, शंकालु और अरक्षित है। अनेक प्रयासों के बावजूद पुनर्जागरण के बदले प्रतिपुनर्जागरण हो रहा है। पढ़िए इस लेख में।