डॉ योगेन्द्र

डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग


पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

इन दिनों : अतिरिक्त बुद्धि का कृष्ण पक्ष

a close up of a lion on a field
"जहाँ सोचना बंद या अवरुद्ध हो जाय, वहाँ जंगलराज शुरू होता है। सत्ता को सोचने वालों से बहुत डर लगता है। जंगल का राजा सिंह होता है। वह भी सोचता कम है और अन्य जानवरों को भी सोचने नहीं देता और भयभीत रखता है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : असंतुष्टों की जंग के शिकार

a couple of black birds sitting on top of a tree
"अमानवीयता में कुरूपता है और संवेदना में सौंदर्य है। मनुष्य प्रकृति को खदेड़ता जा रहा है। वह जिसके कारण जीवित है, उसके खिलाफ ही युद्ध ठान रखा है।" इसी आलेख से

इन दिनों : ईरान एक सीख भी है और सबक भी

"धर्म मनुष्य की एक कमजोर नस है, जिसे सहला कर सत्ता तो प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन बुनियादी समस्याओं को सुलझा नहीं सकते। जो देश धार्मिक बन गये हैं, उस देश की जनता लोकतांत्रिक शासन चाहती है। और, जो देश धार्मिक बन नहीं पाया, उस देश में धार्मिक कट्टरता सत्ता दिला रही है।" इसी आलेख से

इन दिनों : मैं, आप और मिराबेला माडल

"अमेरिका और जापान जैसे देशों में एक प्रयोग हो रहा है, जिसमें युवा और बुजुर्ग दोनों साथ-साथ रहते हैं और दोनों एक दूसरे से सीखते हैं, जिसे ‘मिराबेला माडल' के नाम से पुकारा जा रहा है।‌ न्यूयॉर्क की एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी ने यह प्रयोग किया है।" - कैसे? पढ़िए इस आलेख में।

इन दिनों : चंचल बुद्धि के युग और हवा में पतंग बने हनुमान

"ज्ञानियों की एक जमात की हालत साँप-छुंछदर वाली है। जीना है तो सत्ता के चरण पखारने हैं। नतीजा है कि वे अपनी चंचल बुद्धि के बदौलत जैसे-जैसे सत्ता बदलती है, वे भी बदल जाते हैं। दल बदलू नेताओं की कोई कमी इस भारतभूमि पर पहले भी नहीं थी, अब विचार - बदलू नेताओं की कोई कमी नहीं है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : डमरूवाद का घनचक्कर

"आर एस एस या बीजेपी के कार्यकताओं को हिन्दू एकता इसलिए चाहिए कि उनकी सत्ता कायम रहे। राम कथा वाचक भी जाति गिनते नजर आते हैं। उन्हें अपने ब्राह्मण होने पर बहुत गर्व है। इन लोगों को हिन्दू राष्ट्र चाहिए। इनके स्वभाव और विचार से ऐसा लगता है कि उन्हें ऐसा हिन्दू राष्ट्र चाहिए जिसमें जाति का वर्चस्व कायम रहे।" इसी आलेख से

इन दिनों : बर्बर पशुता और खंडित मर्यादाओं के युग में

"क्या ईडी के ऐसे अफसरों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, जो रेड डालते हैं और कोर्ट में दोष सिद्ध नहीं कर पाते? क्या उनकी अफलातूनी कार्रवाई से सामान्य लोग परेशान नहीं होते और उनके मौलिक अधिकारों में क्या यह हस्तक्षेप नहीं है? ईडी की नासमझ कार्रवाई से ईडी पर गहरे सवाल हैं।" - सवाल, जो इस आलेख से निकलते हैं।

इन दिनों : सौंदर्य और स्वाभिमान

"जंगल और वनों को हमने नहीं बनाये। कुदरत ने करोड़ों पेड़ों का संवर्धन किया। जीव जंतु, झरने, नदियाँ। खूबसूरती। मगर दो टके के राजनेता और पूँजीपतियों ने इस खूबसूरती को उजाड़ा।" - इसी आलेख से

इन दिनों : अथ श्री महाभारत कथा

महाभारत एक मुकम्मल कथा है। रिश्ते ऐसे-ऐसे कि सहज विश्वास नहीं होता। यहाँ मनुष्य का सरलीकरण नहीं है कि ईमानदार है तो हर समय ईमानदार ही रहेगा।

इन दिनों : आजाद नस्लों पर मंडराते खतरे

"विदेशी कुत्ते विद्रोही नहीं होते। देशी कुत्ते झाँव-झाँव कर लेते हैं। विदेशी कुत्ते जितने मालिक के गुलाम होंगे, वे उतने ही सफल होंगे। उनकी सफलता गुलामी में है। बिना मेहनत के जो आदमी सफल होना चाहता है, उसमें विदेशी कुत्ते का गुण चाहिए।" - इसी आलेख से