भारतीय राजनीति के संकट और अमेरिका की नयी राजनीति के सबक 

आलेख में अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के मेयर के रूप में चुने जाने वाले ममदानी और काउंसलर के रूप में निर्वाचित होने वाले कम्युनिस्ट नेताओं की राजनीतिक रणनीति की विवेचना है और इसके साथ ही जन-जुड़ाव के चुनावी अभियान की संभावना की भारतीय राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में पड़ताल है।

अमेरिका के स्थानीय चुनावों में राजनीतिक परिवर्तन की नयी आहट सुनाई पड़ती है। यह पूँजीवादी परेशानियों के विरुद्ध उत्पीड़ित बहुसंख्यकों, कम वेतन भोगियों, छात्रों और परेशान नागरिकों की अकुलाहट है। दूसरी बार सत्ता सँभालते ही ट्रम्प ने वह सब कुछ किया, जो कोई बेलगाम पूँजीवादी शासक कर सकता था। उसने कल्याणकारी योजनाओं, शिक्षा, पर्यावरण आदि अनेक मदों के फंड में कटौती की, अनेक देशों पर बेतुका टैरिफ़ लादकर बेतरतीब महँगाई पैदा की और इजरायल के पक्ष में खड़े होकर गाजा के घृणित नरसंहार को हवा दी। मार्क्स ने न भी कहा होता कि पूँजीवाद की चरम अवस्था के बाद समाजवाद आता है तो भी यह प्राकृतिक सिद्धान्त है कि जब अति हो जाती है तो बदलाव होता है। अमेरिका की नयी राजनीतिक आहट को मार्क्सीय परिप्रेक्ष्य में देखना तो अभी जल्दबाजी होगी, परंतु उसे सामाजिक प्रकृति के परिप्रेक्ष्य में तो देखा ही जा सकता है।

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कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

Dr. Anil Kumar Roy
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कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

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