भाषा केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं है, जैसा कि अक्सर व्याकरण की किताबों में पढ़ाया जाता है। पाठ्यपुस्तकों में भाषा को अभिव्यक्ति के साधन-भर के रूप में सीमित करके पढ़ाये जाने का भी वर्गीय कारण है – उसके असली चरित्र और वाहक-गुण को जाहिर न होने देना। एक बार अस्तित्व में आकर वह हमेशा वर्गीय चरित्र ग्रहण कर लेती है और वर्गीय पाले में खड़ी नजर आती है। कुछ भाषाएँ शासकीय व्यवहार, आर्थिक गतिविधि या कुलीनता की भाषा बन जाती हैं, जिसके द्वारा व्यवस्था का नियंत्रण किया जाता है और कुछ भाषाएँ दीनता, अधीनस्थता या पिछड़ेपन को द्योतित करने वाली तिरस्कृत और उपेक्षित भाषा बनकर रह जाती है, जिसके दायरे में रहने वालों को व्यवस्थित किया जाता है। स्थानीय और आदिवासियों की बोलियों के साथ ज्यादातर ऐसा ही हुआ है। पियरे बरडीयू इसे ‘cultural capital’ (सांस्कृतिक पूँजी) कहते हैं। जिसके पास यह पूँजी उच्च स्तर की है, वह व्यवस्था में उच्च स्तर का होता है। और, जिसके पास यह ‘पूँजी’ नहीं है, वह हेय और उपेक्षित है, निम्न और सर्वहारा वर्ग का होता है।
अपभ्रंश के उदाहरण से इसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। संस्कृत सदा से ही कुलीनों की भाषा रही है – राजकीय, शास्त्रीय और धार्मिक व्यवहारों में प्रयुक्त होने वाली। अर्थात् शासक वर्ग की। लेकिन उतनी ही जटिल, उच्चारण-कठिन और व्याकरण-बद्ध भी। संस्कृत का अर्थ ही है – संस्कारित, जिसका संस्कार हो चुका हो। इस संस्कारित भाषा को सत्ता (पॉवर) ने अपने इस्तेमाल के लिए आरक्षित कर लिया। इसी में आमजन को शासित करने वाले शास्त्रों और धर्मशास्त्रों का निर्माण हुआ। दूसरे तमाम लोगों को इस घेरा से बाहर रखा गया, यहाँ तक कि इसे सुनने वालों तक के कान में पिघला शीशा डालने का प्रावधान रचा गया। यह वर्गीय असमानता को क़ायम रखने के लिए भाषा की असमानता को औजार की तरह इस्तेमाल करना था।
भाषाविज्ञान का यह स्थापित सिद्धांत है कि सरलीकरण की ओर भाषा का सहज बहाव होता है। तो संस्कृत के कठिन उच्चारण में असमर्थ लोगों ने, जो श्रमिक, किसान और शिल्पकार थे, जो अनपढ़ और पिछड़े हुए वर्गों के थे, जब संस्कृत के शब्दों का विद्रूप उच्चारण आरंभ किया और वह उच्चारण, धीरे-धीरे, बोलचाल में स्थापित होता चला गया तो कुलीन पंडितों ने उस अशासकीय और ‘अकुलीन’ भाषा को तिरस्कार और क्षोभ से ‘अपभ्रंश’ कहकर पुकारना शुरू किया। ‘अपभ्रंश’, अर्थात् बिगड़ा हुआ, भ्रष्ट, अग्राह्य। संस्कृत के द्वारा कुलीनों ने अपनी कुलीनता क़ायम रखी और अपभ्रंश-भाषियों को हेय और तिरस्कृत बना दिया, जबकि वह आमजन की भाषा थी, बहुसंख्यक की। संस्कृत गिने-चुने लोग बोल या लिख सकते थे। इस तरह यह भाषा का सामाजिक वर्ग-विभाजन था – कुलीनों और श्रमजीवियों के बीच।
वर्ग-विभाजन सामाजिक ही नहीं होता है, बल्कि व्यवस्था के सभी रूपों में व्यक्त होता है। सामाजिक के समान ही रोजगार के क्षेत्र में भी भाषा के द्वारा वर्ग-विभाजन होता है। नौकरी, सरकारी हो या कॉर्पोरेट की, शीर्ष पर बैठा हुआ, प्रबंधक की हैसियत रखने वाला हरेक आदमी अंग्रेजीदां होता है। ऐसा नहीं है कि अंग्रेजी में ही अच्छा सोचा या किया जा सकता है। बल्कि इसलिए है कि उच्च पदस्थ की विशिष्टता कायम रह सके और साथ ही अ-अंग्रेजी भाषियों का हीनता-बोध भी। प्रशासनिक संरचना में विशिष्टता-बोध एक आवश्यक पहलू है शासन कायम रख सकने के लिए। इस विशिष्टता-बोध के लिए अंग्रेजी को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है बेहथियार लोगों को शासित रखने के लिए। यही अकादमिक क्षेत्र (जिसे प्राचीन शब्दावल में शास्त्रीय क्षेत्र कह सकते हैं) में भी होता है अंग्रेजी के अन्तर्राष्ट्रीय भाषा होने का तर्क गढ़कर। ‘गीतांजलि’ अंग्रेजी में नहीं लिखी गई थी।
हिंदी (खड़ी बोली) का दूसरा स्थान है, जो मध्यम श्रेणी के रोजगार उपलब्ध करा सकती है और मीडिया और सरकारी विद्यालयों में चलती है। मीडिया में हिंदी के प्रयोग का अर्थशास्त्रीय कारण है और विद्यालयों में राजनीतिक। वृहत्तर अर्थों में सरकारी विद्यालयों-महाविद्यालयों का उद्देश्य समर्थ नागरिक का निर्माण नहीं, बल्कि संवैधानिक दबाव की पूर्ति की विवशता अधिक है। और, तीसरे स्थान पर मजदूर, किसान, आदिवासियों आदि की भाषा है, जो व्यवस्था में एक ‘गैरजरूरी’ उपस्थिति-मात्र है। इस तरह रोजगार के अवसरों में भाषा की भूमिका वर्गीय चरित्र को दर्शाती है।
शासक वर्ग अपनी भाषा का वर्चस्व क़ायम कैसे करता है? अपने नियंत्रण की सारी संस्थाओं और व्यवस्थाओं में इसे लागू करके। विद्यालय-महाविद्यालय उसके नियंत्रण की संस्थाएँ हैं। उसकी पाठ्यपुस्तकें शासक वर्ग की भाषा में होती हैं और वही तय करता है कि पाठ्यसामग्री क्या होगी। न्यायालय उसके अधीन होते हैं। उनमें शासक वर्ग की भाषा चलती है। कार्यालय उसके ही होते हैं। वहाँ अपनी भाषा को मान्यता देकर। ऐसे स्थानों पर आदिवासियों-दलितों की स्थानीय/क्षेत्रीय भाषा अमान्य करार दी जाती है। इस तरह भाषायी अनुशासन की अनुल्लंघनीय रेखा खींच दी जाती है। ऐसे में भाषा वर्गीय अस्तित्व की पहचान बन जाती है।
लेकिन द्वंद्व सदैव चलता रहता है। शासन की शक्तियाँ जहाँ भाषा को अपने अस्तित्व के औजार की तरह इस्तेमाल करती हैं, वहीं दलित, आदिवासी, किसान, श्रमजीवी और दबे-कुचले लोग इसे प्रतिरोध के हथियार की तरह भी प्रयोग करते हैं। जहाँ कहीं भी जंगलों में चले जायें, वहाँ के आदिवासी विकास की भाषा के विरुद्ध अपने गीत गाते मिलेंगे। स्थानीय लोकगीतों की स्वर-लहरियों में वहाँ के जीवन का उल्लास, व्यथा, उत्पीड़न, घुटन गूँजता हुआ मिलता है। काम करते हुए गाये जाने वाले गीत श्रमजीवियों के पसीने से भींगे हुए मिलेंगे। लोककथाएँ लोकव्यथाओं का व्यापक संग्रह हैं। प्रतिरोध की ये आत्माभिव्यक्तियाँ भाषा-युद्ध का मैदान सृजित करती हैं। यह वर्गीय विशेषता केवल भाषा के स्तर पर ही व्यक्त नहीं होती है, बल्कि उस भाषा में व्यक्त सामग्री (content) के मामले में भी प्रकट होती है। लोक साहित्य की सामग्री शास्त्रीय साहित्य की चयन-सूची में शामिल नहीं की जाती। आत्मपीड़ाओं की अभिव्यक्ति के इस वृहत्तर संसार को सत्ता की ‘सुसंस्कृत’ व्यवस्था ‘भदेस’ मानकर उपेक्षित रखती है। यह उपेक्षा भाषा की वर्गीय चेतना के कारण होता है। फिर भी प्रतिरोधात्मक स्वर के लोक साहित्य की सदानीरा बहती रहती है, अविरल।
डिजिटल युग का ऐल्गोरिद्म भी भाषाई असमानता उत्पन्न कर रहा है। किस भाषा में ज़्यादा कंटेंट हैं, कौन भाषा मोनेटाइज़ हो रही है और किस भाषा में ट्रेंड बनता है। इन सारी बातों के द्वारा ‘डिजिटल पूँजी’ कुछ भाषाओं को आगे कर रही है तो कुछ को पीछे ढकेल रही है। भाषायी वर्ग-विभाजन का यह नया आयाम सामने आ रहा है।
लेकिन इसके साथ ही भाषा का एक दूसरा वर्गीय चरित्र भी है, जो वर्गीय व्यवहार का अनुसरण करता है। किसी कारणवश वर्गीय अवस्था बदल जाने से जिस प्रकार उसी वर्ग का चरित्र अपना लिया जाता है, उसी प्रकार उस वर्ग की भाषा भी अपना ली जाती है। आदिवासी या श्रमिक समूह का कोई व्यक्ति शासक वर्ग में स्थान पाकर अपने पिछले वर्ग, जिससे वह आया होता है, की भाषा या साहित्य को प्रोत्साहित नहीं करता है, बल्कि शासक वर्ग की भाषा को ही अपना लेता है। इस तरह व्यक्ति के वर्ग-परिवर्तन से भाषा का वर्ग-परिवर्तन नहीं होता है।
निष्कर्षतः भाषा वर्गीय होती है और वर्गीय व्यवहार का प्रतिनिधित्व करती है। वह तय करती है कि कौन शासक की श्रेणी में होगा, किसकी सुनी जाएगी और कौन चुप कराया जाएगा।

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।







भाषा के वर्गीय स्वभाव पर एक सारगर्भित लेख है. तर्कसम्मत विवेचना और तथ्यपरक अभिव्यंजना. सुदूर अतीत से लेकर वर्तमान तक सत्ता की भाषा और प्रतिरोध की भाषा का सोदाहरण बढ़िया वर्गीकरण आपने किया है. यथातथ्य रखा है . बधाई व सलाम आपको
प्रेरणात्मक शब्दों के लिए आभार 🙏
आपका लेख सही तथ्यों को प्रस्तुत किया है। कालिदास की रचना में तो कुलीन-वर्ग संस्कृत में बोलते हैं तो आमजन प्राकृत में। लेकिन जन- संघर्ष ही जन-भाषा का निर्माण करता है। आलेख के लिए बधाई।
सही कहा है कि कालिदास के ग्रंथों में भी भाषा का वर्ग-विभाजन मिलता है। भाषाविज्ञान की दृष्टि से यह भी सही है कि आमजनों के द्वारा ही भाषा विकसित भी होती है। महत्वपूर्ण टिप्पणी के द्वारा बहस को आगे बढ़ाने के लिए धन्यवाद!
यह एक सामयिक आलेख है जो यह बतलाती है कि भाषा भी समाजिक विभेद को कायम रखती है। इसी प्रयास में नये नये अंग्रेजीदां भाषाई बलात्कार का अच्छा उदाहरण दे जाते हैं।
इस महत्वपूर्ण टिप्पणी के लिए धन्यवाद!
समय के साथ सब बदल जाता है, संस्कृत भाषा किसी समय कुलीनों की भाषा थी और उनका एकाधिकार था और अभी के समय में कोई रोने बाला भी नहीं है.
कोई भी सरकार नहीं चाहती है कि आम जान पढ़े लिखें और आगे बढ़े, हाँ मजबूरी बस दिखाने हेतु कुछ करना पड़ता है.
जी, एकदम सही। संस्कृत तो प्रचलन से बाहर हो ही गई है, सरकार भी पढ़ाने से अपने हाथ खींचती जा रही है।
यह एक बेहतरीन लेख है जो “भाषा की राजनीतिक –आर्थिकी” को बताती है।
प्रोत्साहन के इन शब्दों के लिए धन्यवाद!