भाषा का वर्ग-विभाजन और द्वंद्वात्मकता 

शासन की व्यवस्था के भीतर पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में अक्सर भाषा को अभिव्यक्ति का साधन बताया जाता है। लेकिन भाषा केवल साधन नहीं है, स्वभाव भी है - वर्गीय स्वभाव। प्रस्तुत लेख में भाषा के इसी वर्गीय चरित्र का विश्लेषण किया गया है।
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कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

Dr. Anil Kumar Roy
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डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

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10 Comments

  1. भाषा के वर्गीय स्वभाव पर एक सारगर्भित लेख है. तर्कसम्मत विवेचना और तथ्यपरक अभिव्यंजना. सुदूर अतीत से लेकर वर्तमान तक सत्ता की भाषा और प्रतिरोध की भाषा का सोदाहरण बढ़िया वर्गीकरण आपने किया है. यथातथ्य रखा है . बधाई व सलाम आपको

  2. आपका लेख सही तथ्यों को प्रस्तुत किया है। कालिदास की रचना में तो कुलीन-वर्ग संस्कृत में बोलते हैं तो आमजन प्राकृत में। लेकिन जन- संघर्ष ही जन-भाषा का निर्माण करता है। आलेख के लिए बधाई।

    • सही कहा है कि कालिदास के ग्रंथों में भी भाषा का वर्ग-विभाजन मिलता है। भाषाविज्ञान की दृष्टि से यह भी सही है कि आमजनों के द्वारा ही भाषा विकसित भी होती है। महत्वपूर्ण टिप्पणी के द्वारा बहस को आगे बढ़ाने के लिए धन्यवाद!

  3. यह एक सामयिक आलेख है जो यह बतलाती है कि भाषा भी समाजिक विभेद को कायम रखती है। इसी प्रयास में नये नये अंग्रेजीदां भाषाई बलात्कार का अच्छा उदाहरण दे जाते हैं।

  4. समय के साथ सब बदल जाता है, संस्कृत भाषा किसी समय कुलीनों की भाषा थी और उनका एकाधिकार था और अभी के समय में कोई रोने बाला भी नहीं है.
    कोई भी सरकार नहीं चाहती है कि आम जान पढ़े लिखें और आगे बढ़े, हाँ मजबूरी बस दिखाने हेतु कुछ करना पड़ता है.

    • जी, एकदम सही। संस्कृत तो प्रचलन से बाहर हो ही गई है, सरकार भी पढ़ाने से अपने हाथ खींचती जा रही है।

  5. यह एक बेहतरीन लेख है जो “भाषा की राजनीतिक –आर्थिकी” को बताती है।

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