Category जन पत्रकारिता

महिलाओं के विरुद्ध हिंसा से निपटने के लिए अपनी राजनीतिक चेतना में परिवर्तन लायें

जाति, वर्ग, जातीयता और लिंग की जटिलताओं पर विचार करने की आवश्यकता है। यह न्याय का प्रश्न है और साथ ही असमानता का भी, जो अन्याय को जन्म देती है।

लोकतंत्र और अभिव्यक्ति का अधिकार : प्रसारण सेवा (विनियमन) विधेयक 2024 का संदर्भ

प्रसारण सेवा (विनियमन) विधेयक 2024 के द्वारा अभिव्यक्ति के अधिकार पर शिकंजा

कहीं लोकतंत्र हाईजैक तो नहीं हो गया?

चुनावी प्रक्रिया लोकतंत्र में नागरिक भागीदारी को सुनिश्चित करती है। परंतु चुनावी प्रक्रिया में यदि अपारदर्शिता हो, संदेह की उँगलियाँ उठ रही हों तो यह लोकतंत्र के लिए ख़तरा है।

सामाजिक न्याय के अस्पताल में शिक्षा की शव-परीक्षा

‘सामाजिक न्याय’, ‘सबका साथ, सबका विकास’ आदि आजकल बास्केट बॉल खेल की गेंद की तरह हर राजनीतिज्ञ के हाथ में उछलता हुआ जुमला है और हर दल इस गेंद को अपने पाले में करने की कोशिश में लगातार लगा हुआ है. यह जुमला/नारा/वादा इतना लोक-लुभावन और प्रभावी है कि जो कोई भी इस नारे का अपने पक्ष में जितना ज्यादा उपयोग कर लेता है, वह सत्ता पर उतनी मजबूती के साथ कायम हो जाता है. अर्थात अवाम को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए राजनीतिक दलों के पास यह परीक्षित और कामयाब हथियार है.

संसद भवन में टपकता पानी: एक गंभीर समस्या

भारत का नया संसद भवन नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के सर्वाधिक प्रचारित ही नहीं, बल्कि सर्वाधिक महत्वाकांक्षी निर्माण के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसके निर्माण के प्रारंभिक काल से ही इसकी आवश्यकता, वास्तु, व्यय, सेंगोल की स्थापना, भवन के शीर्ष पर आक्रामक व्याघ्र की स्थापना आदि पर अनेक प्रश्न खड़े होते रहे हैं। लगातार प्रश्नों की जद में खड़े इस भवन के बनकर खड़े हुए एक साल बीतते-बीतते इसकी छत ही चूने लगी। देश के सर्वाधिक महत्वाकांक्षी और महत्वपूर्ण भवन का यह परिणाम अनेक प्रश्न खड़े करता है। लेखक ने इस आलेख में इन कई सारे प्रश्नों को छूने की कोशिश की है।

आपातकाल का पुनरावलोकन -1 : क्या संविधान की हत्या हुई थी?

12 जून, 2024 को केंद्र सरकार ने घोषणा की कि 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाया जायेगा। ज्ञात हो कि 25 जून, 1975 को ही आपातकाल की घोषणा की गई थी। 25 जून, 1975 से 21 मार्च, 1977 तक अर्थात् 21 महीने की इस कालावधि को ‘लोकतंत्र की हत्या’, भारतीय इतिहास का काला अध्याय’ आदि विशेषणों से अभिहित किया जाता रहा है। इस घटना के व्यतीत हुए 49 वर्ष बीत चुके हैं। उस आंदोलन में भाग लेने वाली पीढ़ी के अनेक लोग अब नहीं हैं और जो बचे हैं, वे जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं। आम जीवन की स्मृतियों में वह प्रसंग धुँधला हो गया है। फिर आज वह कौन-सी विशेष बात हो गई, जिसके कारण आधी शताब्दी पूर्व के प्रसंग को पुनर्जीवित करने की ज़रूरत आ पड़ी?