Category जन पत्रकारिता

ग्लोबल पीस इंडेक्स रिपोर्ट 2024: अशांति की ओर अग्रसर होती हुई दुनिया

ग्लोबल पीस इंडेक्स (GPI) 2024 की रिपोर्ट में वैश्विक शांति की स्थिति में 0.56% की गिरावट दर्ज की गई है, और दूसरे विश्व युद्ध के बाद पहली बार संघर्षों की संख्या 56 तक पहुँच गई है। 97 देशों में शांति की स्थिति खराब हुई है, जबकि 92 देश सीमाओं के बाहर संघर्षों में संलिप्त हैं। गाजा और यूक्रेन में संघर्षों के कारण 2023 में 162,000 लोगों की मौत हुई, और हिंसा का वैश्विक आर्थिक प्रभाव 19.1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गया है, जो वैश्विक जीडीपी का 13.5% है। भारत समेत कई देशों ने शांति में सुधार किया है, लेकिन उत्तरी अमेरिका में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई है। रिपोर्ट यह संकेत देती है कि वैश्विक शांति की दिशा में सामूहिक और सतत प्रयासों की आवश्यकता है, क्योंकि बिना शांति के मानवता के विकास और उसकी गरिमा की कल्पना नहीं की जा सकती।

जनपक्षीय राजनीति के लिए लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों का महत्व

लोकसभा चुनाव में अपने बूते 240 सीट प्राप्त कर भाजपा अल्पमत में है। अब उसे सरकार बनाने के लिए जदयू और टीडीपी के समर्थन की अत्यधिक जरूरत है। उक्त दोनों दलों ने समर्थन देकर सरकार बनाने का रास्ता साफ कर दिया है। शुरुआत में एनडीए गठबंधन की सरकार की बात करने वाले नरेन्द्र मोदी ने पुनः अपने पुराने स्वेच्छाचारी रवैए का परिचय देना शुरू कर दिया है। इस बात की पुष्टि मंत्रीमंडल के गठन से स्पष्ट हो जाती है। लगभग सभी महत्वपूर्ण विभाग भाजपा के नेताओं को सुपुर्द कर दिया गया है और एनडीए के घटक दलों खासकर जदयू एवं टीडीपी को झुनझुना थमा दिया गया है।

18वें लोकसभा चुनाव का विश्लेषण : सत्य बनाम प्रचार

लोकसभा चुनाव, 2024 के अधिकांश चुनावी विश्लेषण विषयनिष्ठ हो रहे हैं। इन विश्लेषणों में विश्लेषक एक कहानी गढ़कर निष्कर्ष तक पहुँचने की कोशिश कर रहा है। प्रस्तुत आलेख में लेखक ने चार वेरिएबल को आधार बनाते हुए चुनाव के छह चरणों का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण किया है। यह विश्लेषण न केवल इस चुनाव को समझने में मदद करता है, बल्कि राजनीति और सामाजिक मनोविज्ञान को समझने में भी मददगार साबित होता है।

जारी है स्त्री विमर्श की यात्रा

परिवार, शिक्षा प्रणाली, राज्य-कानून, धर्म, कलाएँ, मिडिया आदि ये सारी सामाजिक संस्थाएँ हमारे समाज में औरत बनाने का काम करती हैं- मादा को स्त्री बनाती हैं। सर्वजनीन है कि स्त्री पैदा नहीं होती, बनायी जाती है, मार-मार के बनाया जाता है उसको स्त्री। यही स्त्री की स्थिति तय करती है और नारी विमर्श में इसे अनदेखा कर दिया जाता है।

बालश्रम की राजनीतिक आर्थिकी और बिहार

African Boy Working on Desert
निजी मुनाफे पर आधारित पूँजीवाद और राजनीतिक सत्ता का अपवित्र गठबंधन बाल श्रम को कायम रखता है। जब तक पूँजीवादी शक्तियों के मुक़ाबले सामाजिक शक्तियाँ अपनी अधिक मजबूती नहीं दिखाती है, तब तक तमाम क़ानूनों के बावजूद बालश्रम का धब्बा कायम रहेगा।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 : परिचय एवं समीक्षा (स्कूल शिक्षा)

यह कैबिनेट द्वारा स्वीकृत है, संसद द्वारा नहीं। अर्थात एक पार्टी की शिक्षा नीति है।…यह शिक्षा नीति अनौपचारिकता, सांप्रदायिकता, केन्द्रीयता और निजीकरण की बढ़ोत्तरी के चार पायों पर खड़ी है। इन पायों को ही मजबूत करने का निहितार्थ इस शिक्षा नीति में छिपा हुआ है।

भारतीय किसान विद्रोह और ग्वाटेमाला की भूख

People with Flags at City Demonstration
दिल्ली के सिंघू बॉर्डर पर किसान केवल इसलिए नहीं आंदोलनरत हैं कि उनकी अस्मिता ख़तरे में है। अस्मिता तो ख़तरे में है ही। बल्कि वे इसलिए भी लड़ रहे हैं ताकि इस देश को भूख और तबाही से बचाया जा सके। इस तरह यह लड़ाई पूरे देश के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाई है।

कोरोना 1 : जनता केवल एक वोटर है

कोरोना आज विश्व की एकमात्र और सबसे बड़ी समस्या है। दुनिया में आज न तो सेंसेक्स का उतार-चढ़ाव सनसनी पैदा करता है, न जीडीपी बढ़ाने की होड़ है, न घटते जलस्तर की चिंता है और न ही स्कूल बंद बच्चों की बदहाली की फ़िक्र है। मानव-सभ्यता के इतिहास में शायद यह पहली बार हुआ है कि एक बीमारी की चपेट में एक ही साथ पूरी दुनिया आ गई हो। इसलिए दुनिया के तमाम देशों में जिस एक बात के भूत, वर्तमान और भविष्य की सर्वाधिक चर्चा और चिंता की जा रही है, वह कोरोना है।

चेतना-निर्माण की राजनीतिक आर्थिकी

मानव-सभ्यता का यह स्वभाव रहा है कि वह आगे की ओर गति करती रही है। लाखों वर्षों के जद्दोजहद के बाद लगभग 500 साल पहले मानव-जाति जब वैज्ञानिक क्रांति के नए युग में प्रविष्ट हुई तो चेतना के स्तर पर उसके अंधविश्वास, जड़ मान्यताएँ और बद्ध धारणाएँ धीरे-धीरे तिरोहित होती गईं। ऐसा लगने लगा कि मानव-चेतना की बंद पलकें धीरे-धीरे खुल रही हैं और दैवी, रहस्यमयी और अबूझ परतें उघररही हैं।अब देहात के मिडिल स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा भी, खेतों में काम करने वाला अनपढ़ किसान भी जान गया कि वर्षा इंद्र की कृपा से नहीं, बल्कि वाष्पीकरण और वायु-दबाव की प्राकृतिक प्रक्रियाओं से होती है; वह जान गया कि चंद्रमा कोई देवता नहीं है, बल्कि सौरमंडल का एक उपग्रह है। वह यह भी जान गया कि चेचक शीतला देवी के प्रकोप का परिणाम नहीं है, बल्कि एक वायरल इंफ़ेक्शन है। अब वह प्राकृतिक क्रियाओं और वस्तुओं को अंधविश्वास और आस्था की दृष्टि से नहीं, बल्कि वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टि से देखने लगा।

आतंकवाद की जंग हम हार रहे हैं

Woman in Black Dress Standing on Grass Field
अभी हाल ही में 14 फरवरी, 2019 को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में CRPF के जवानों पर विस्फोटक हमले में 40 से अधिक जवानों के मारे जाने के बाद एक बार फिर आतंकवाद के विरुद्ध हमारी जंग सवालों के घेरे में आ गई है. यह सवाल इसलिए भी ज्यादा गहरा हो गया है, क्योंकि वर्तमान सरकार पिछली सरकार की क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाकर लोगों का यह विशवास जीतने में सफल हुई थी कि आतंकवाद के खिलाफ और देश की सुरक्षा के लिए वह चाक-चौबंद व्यवस्था करेगी.