Category राजनीति

इतिहास के फैसले: मंदिर, मस्जिद और न्यायालय

पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की यह दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणी कि 1991 का कानून 1947 से पहले के स्थानों के धार्मिक चरित्र की जाँच करने से नहीं रोकता है, ने ऐतिहासिक मस्जिदों का सर्वेक्षण करने के लिए अदालती आदेशों की बाढ़ ला दी है ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या उन्हें मंदिरों को नष्ट करने के बाद सदियों पहले बनाया गया था। इसने सत्तारूढ़ पार्टी और निर्वाचित सरकारों द्वारा समर्थित हिंदुत्व संगठनों को खतरनाक तरीके से, यहाँ तक कि लापरवाही से अतीत को उजागर करने में सक्षम बनाया है। इसने पुरानी लड़ाइयों को पुनर्जीवित करने और नई लड़ाइयों को बनाने में मदद की है, और इसके माध्यम से खतरनाक रूप से सांप्रदायिक दरार को बढ़ाया है, जिससे धार्मिक लड़ाइयों को बढ़ावा मिला है, जो पीढ़ियों तक चल सकती हैं।

बुझता हुआ चिराग़ है संविधान की प्रस्तावना

जिस उदात्त सोच के साथ इस देश की संवैधानिक बुनियाद रखी गई थी, समय बीतने के साथ ही लगातार वह जर्जर होती गई। और, अब तो यकीन करना भी मुश्किल है कि यह वही देश है, स्वतन्त्रता के संघर्ष से निकले हुए तप:पूतों ने जिसका प्रस्ताव पास किया था।

महिलाओं के विरुद्ध हिंसा से निपटने के लिए अपनी राजनीतिक चेतना में परिवर्तन लायें

जाति, वर्ग, जातीयता और लिंग की जटिलताओं पर विचार करने की आवश्यकता है। यह न्याय का प्रश्न है और साथ ही असमानता का भी, जो अन्याय को जन्म देती है।

लोकतंत्र और अभिव्यक्ति का अधिकार : प्रसारण सेवा (विनियमन) विधेयक 2024 का संदर्भ

प्रसारण सेवा (विनियमन) विधेयक 2024 के द्वारा अभिव्यक्ति के अधिकार पर शिकंजा

जनपक्षीय राजनीति के लिए लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों का महत्व

लोकसभा चुनाव में अपने बूते 240 सीट प्राप्त कर भाजपा अल्पमत में है। अब उसे सरकार बनाने के लिए जदयू और टीडीपी के समर्थन की अत्यधिक जरूरत है। उक्त दोनों दलों ने समर्थन देकर सरकार बनाने का रास्ता साफ कर दिया है। शुरुआत में एनडीए गठबंधन की सरकार की बात करने वाले नरेन्द्र मोदी ने पुनः अपने पुराने स्वेच्छाचारी रवैए का परिचय देना शुरू कर दिया है। इस बात की पुष्टि मंत्रीमंडल के गठन से स्पष्ट हो जाती है। लगभग सभी महत्वपूर्ण विभाग भाजपा के नेताओं को सुपुर्द कर दिया गया है और एनडीए के घटक दलों खासकर जदयू एवं टीडीपी को झुनझुना थमा दिया गया है।

18वें लोकसभा चुनाव का विश्लेषण : सत्य बनाम प्रचार

लोकसभा चुनाव, 2024 के अधिकांश चुनावी विश्लेषण विषयनिष्ठ हो रहे हैं। इन विश्लेषणों में विश्लेषक एक कहानी गढ़कर निष्कर्ष तक पहुँचने की कोशिश कर रहा है। प्रस्तुत आलेख में लेखक ने चार वेरिएबल को आधार बनाते हुए चुनाव के छह चरणों का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण किया है। यह विश्लेषण न केवल इस चुनाव को समझने में मदद करता है, बल्कि राजनीति और सामाजिक मनोविज्ञान को समझने में भी मददगार साबित होता है।