कभी कांग्रेस कहती है, वोट चोरी हो रहा है। कभी बंगाल से दीदी गृह मंत्री को — “The most naughty and naughty home minister” — बताती है। तमिलनाडु में डर है कि उन पर हिंदी थोपी जा रही है। यूपी में आए दिन दंगे हो रहे हैं। आम आदमी पार्टी भी दिल्ली में परेशान है। अब तो वहाँ भी बुलडोजर न्याय हो रहा है। जबकि देश की सबसे उच्च अदालत ने इस पर प्रतिबंध लगाया है। ईडी बदनाम है, २ प्रतिशत भी मुकदमे बेचारी जीत नहीं पाती। सीबीआई ख़ुद संदेह के घेरे में है। पुलिस की बर्बरता से कभी-ना-कभी, आपका भी सामना तो हुआ ही होगा। आए दिन विपक्ष हंगामा करता रहता है कि संविधान खतरे में है।
चलिए! आज मैं आपको आजादी के बाद के भारत में चल रहे लोकतंत्र को समझाने की कोशिश करता हूँ। प्रयास करता हूँ इतिहास के पन्नों से चुराकर एक छोटी सी कहानी आपको सुना पाऊँ। तो शुरू करते हैं — क़िस्सा संविधान का। ध्यान रहे! हर कहानी की तरह यह किस्सा भी काल्पनिक है। पर, यह सच्ची घटनाओं पर आधारित है।
साल था 1942, तब भारत छोड़ो आंदोलन चालू था। गांधीजी जी की अगुवाई में हम सभी करो या मरो वाली हालत में थे। इंग्लैंड चाहता था कि भारतीय दूसरे विश्व युद्ध में उनका साथ दे, संसाधन दे, सिपाही दे, उसने हमें लुभाने को क्रिप्स मिशन भी भेजा था। पानी देकर वे ख़ून माँग रहे थे। दूसरा विश्व युद्ध चरम पर था। इंग्लैंड की हालत ख़राब थी। किसी तरह अमेरिका की मदद से जंग तो वह जीत गया, पर युद्ध हार गया। 1945 आते-आते विश्व भी लड़-मरकर थक चुका था।
युद्ध भी जरूरी होते हैं। अच्छाई और बुराई दोनों बराबर रूप से जरूरी हैं। सुख ना होता, तो दुख अकेला बेचारा क्या कर रहा होता? ठंड अपने आप में गर्मी की कमी ही तो है। दूसरे विश्व युद्ध ने दुनिया को वैश्विक बना दिया। अगर युद्ध ना भी होता तब भी होता वही, जो होना था। तो आगे बढ़ते हैं। युद्ध की थकान थी, और अर्थ का अभाव। जो बना था, बनाया था युद्ध लील गया। ब्रिटिश क्राउन और गोरे साहब इतनी लंबी-लंबी यात्रा कर थक चुके थे। वैसे भी भारत के पास अब देने को कुछ बच भी नहीं गया था। तो उन्होंने हमें आजादी दे दी। दी तो दी, पर साथ में विभाजन भी उधार दे गए। पाकिस्तान ने धर्म ना नहीं, पंथ का रास्ता चुना। भारत ने साथ मिलकर धर्म की लड़ाई लड़ी थी। इसलिए, हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने एक धर्म-निरपेक्ष राजनीति का चुनाव किया और भारत को एक — प्रभुत्व-संपन्न, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य घोषित किया।
उन्होंने कहा यहाँ न्याय का राज होगा। अब समस्या थी कैसे? तो उन्होंने लोकतंत्र की तीन बुनियाद स्थापित की — न्यायपालिका, विधायिका, और कार्यपालिका। देखते हैं, ये आपस में संवाद कैसे करते हैं? यह तंत्र आदर्श रूप में कैसे चलता है।
ठीक उसी तरह जैसे किसी राजा का दरबार चलता था। बस संविधान ने हम, भारत के लोगों को प्रभुत्व-संपन्न घोषित कर दिया। इसकी नींव हमारे ही दर्शन में मिलती है। अहम ब्रह्मास्मि, हमें बृहदारण्यक उपनिषद में मिलता है। जब ब्रह्म ही हम हैं, तो हमारे ऊपर राज किसका? अब सवाल था यह तंत्र लोक की सेवा कैसे करगे? विधायिका न्याय-संगत नियम बनाएगी, कार्यपालिका जनहित में उसका पालन करेगी, और अगर हम, भारत के लोगों को कोई समस्या आयेगी तो हम न्यायपालिका का दरवाजा खटखटायेंगे, और हमें न्याय मिल जाएगा। तभी तो जज साहब को माय लार्ड कहा जाता है।
हमारे चुने प्रतिनिधि अनपढ़ हो सकते हैं। वकालत को भी किसी डिग्री की जरूरत नहीं। कोई भी अपना मुकदमा लड़ सकता है। पर दलीलें तर्क-संगत देनी होंगी, और प्रमाणों को संवाद संगत। ऐसा तो हो नहीं सकता कि केस हो चोरी का, और दलील पेट दर्द की दी जा रही हो। सोचिए अगर आपके पेट में दर्द हो और डॉक्टर सिर दर्द की दवाई दे दे तो?
पर हो तो कुछ ऐसा ही रहा है। दवा खाकर लोग मर रहे हैं। पंथ देखकर हिंसा हो रही है। न्याय तो ऐसा की छात्रों पर ही डंडे बरसाए जा रहे हैं। अब आप ही सोचिए पढ़ना-लिखना क्यों जरूरी है? डिग्री के लिए? नौकरी के लिए? नौकरी तो मिल नहीं रही। एक अरसे से 1000-1200 लोगों को ही यूपीएससी नौकरी दे पा रहा है। क्या कार्यपालिका अपनी जिम्मेदारी निभा पा रहा है?
आस-पड़ोस में झाँककर तो ऐसा नहीं लगता है कि आज हम दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था बन चुके हैं। समस्या प्रणाली में नहीं, प्रबंधन में है। अर्थ में नहीं, मुद्रा में है। अर्थ कमाना पड़ता है, मुद्रा तो राह चलते गिरा-पड़ा भी मिल सकता है। पैसे से कोई देश-समाज नहीं चलता। पैसा तो बस व्यापार का माध्यम है। वाणिज्य शास्त्र और अर्थशास्त्र दो अलग-अलग विद्याएँ हैं। संविधान निर्माताओं को लगा जिन्हें जनता ने बहुमत में चुना है, मुद्रण उनके हाथ में ही सुरक्षित होगा। इसलिए न्यायपालिका और विधायिका के आर्थिक संचालन की जिम्मेदारी उन्होंने कार्यपालिका को दी। कार्यपालिका ही तो सरकार है।
आज की विडंबना ही यही है कि वैश्विक फलक पर सरकारों के अंदर राजशाही छायी है। अनपढ़ होना अभिशाप नहीं है, अज्ञानता से अहंकार, और अहंकार ही तो वह फल है, जिसे आदम और ईव को खाने से मना किया गया था।
हमें तो बस ज्ञान पर भक्ति रखते हुए अपना कर्म करना है। यही तो राजयोग है। लोकतंत्र तो बस एक पर्दा है। हमें तो स्वराज चाहिए। इहलोकतंत्र तो बस इसी स्वराज का पर्यायवाची और इस लोकतंत्र का विस्तार मात्र है। जिस तरह से कार्यपालिका अर्थ का बंटाधार कर रही है, मुझे लगता है इस लोकतंत्र को एक चौथे और मजबूत खंभे की जरूरत है, जो अर्थ का संचार न्याय-संगत कर सके। मैं पब्लिक पालिका की प्रस्तावना आपके सामने रखता हूँ।
पब्लिक पालिका मुद्रण के संचालन का एक मॉडल है। एक अरसे से मैं इस पर शोध कर रहा हूँ। स्वागत है आपका आप इसे मेरे ब्लॉग और पब्लिक पालिका की वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं। आप ज्ञानार्थ शास्त्री से भी पूछकर इसे समझने की कोशिश कर सकते हैं। इहलोकतंत्र का यह छठा भाग है। पहले पाँच को भी आप पढ़ सकते हैं। आप चाहें तो खरीदकर अमेजन से पढ़ लें, या इसकी पीडीएफ कॉपी मेरे ब्लॉग पर भी उपलब्ध है। छठे भाग के आने वाले अध्यायों में हम पब्लिक पालिका पर और भी विस्तार से चर्चा करते जाएँगे, और समझने की कोशिश करेंगे की आज के देश काल में इसकी क्या जरूरत है?

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)








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