इस साल का बजट आने वाला है। जनता में उत्साह है। शायद इस बार उन्हें कुछ राहत मिले। टैक्स थोड़ा कम हो, कमाई थोड़ी बढ़े। पर देश की दशा देखकर ऐसा लगता नहीं है कि ऐसा कोई चमत्कार होने वाला है। खैर, इसकी खबर आपको मीडिया देती ही रहेगी। मेरी भी कोशिश रहेगी कि मैं इस बजट सत्र पर अपनी टिप्पणी आप लोगों के सामने करूँ। इस आलेख में हम देश, सरकार की अर्थनीति को समझने के प्रयास करते हैं। बजट क्यों बनता है? कैसे बनता है? और कैसे बेहतर हो सकता है, इस पर चर्चा करेंगे।
अगर बाज़ार पब्लिक की सारी जरूरतों को पूरी करने में समर्थ होता तो शायद हमें किसी सरकार की भी जरूरत नहीं होती। इतिहास हमें बताता है कि ऐसा काल कभी आया ही नहीं, जहाँ इंसान के लालच का अंत मिला। मनोविज्ञान हमें बताता है कि इंसान के सामने तीन चुनौती ऐसा है, जिसे वह चाहकर भी नजरअंदाज नहीं कर सकता — खाना, संभोग और ख़तरा। खतरों का अनुमान ना लगा पाने के कारण वह जितना संसाधन अपने लिए बटोर सकता है, कोशिश में लगा रहता है। इसलिए बाजार से आज तक कोई प्रेम नहीं ख़रीद पाया। करुणा, संवेदना, दया कैसे उत्पाद फैक्टरियों में नहीं बनते। इसलिए, व्यक्ति को बाज़ार से भी कुछ ज़्यादा चाहिए। उसे स्नेह चाहिए, थोड़ा लाड़-प्यार चाहिए, थोड़ी देख-भाल चाहिए। ये सब चीजें आजकल बाजार देने भी लगा है। प्राइवेट स्कूलों और हॉस्पिटलों में पैसों से आपको यह सब मिल जाएगा। पर वहाँ भी आपको संतोष नहीं मिलेगा। हर किसी के पास इतना पैसा भी नहीं होता कि इतना भी सुख बाज़ार से ख़रीद ले। जब समाज किसी को भूख से मरते, बाढ़ में डूबते, भूकंप से त्रस्त इंसानों को देखता है, तो और डर जाता है। इस डर से लड़ने को जो आगे आया राजा बन गया। कुछ सदियों तक तो ठीक-ठाक चल रहा था। फिर, पब्लिक राजा से डरने लगी।
कुछ ऐसा ही डर हमें लोकतंत्र तक ले आया। और आज फिर ऐसी हालत है, जहाँ पब्लिक अपने ही बनाये सिस्टम से डरने लगी है। वह पुलिस से लेकर डॉक्टर से डरती है। ऐसी दशा में यह बहुत जरूरी है कि हम, भारत के लोग इस बात को समझें कि देश चल कैसे रहा है?
कोई भी सरकार हो उसे अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करने के लिए पैसे चाहिए। सरकार के पास पैसे आने के चार मुख्य रास्ते हैं। पहला तो टैक्स, दूसरा मुनाफ़ा, तीसरा ब्याज और चौथा उधार। सरकार या तो सीधे जनता पर टैक्स लगा सकती है, जैसे इनकम टैक्स। या फिर उंगली टेढ़ी कर भी टैक्स वसूलती है, जैसे जीएसटी। जितना भी टैक्स सरकार ले रही है, भरते हम, भारत के लोग ही हैं। कितना अच्छा होता कि हमें वेतन भी मिलता, और टैक्स भी ना भरना पड़ता। लेकिन ऐसा तभी हो सकता है जब सरकार प्रर्याप्त मुनाफा कमाये। सरकार को सबसे ज़्यादा मुनाफा पीएसयू या पब्लिक सेक्टर की संस्थाओं से आता है, जैसे रेलवे, जो देश में सबसे ज़्यादा भर्ती निकालती है। अगर मुनाफा हद से ज़्यादा हो तो सरकार देश-विदेश के विकास के लिए निवेश कर सकती है और ब्याज कमा सकती है। और कर्ज लेने की उसे कभी नौबत ही ना आए। तब शायद आयेगा राम राज्य!
अगर ऐसा होने लगा तो पंद्रह-पंद्रह लाख अपने-आप हम सबके अकाउंट में आ जाएँगे। लेकिन हालत ऐसे हैं कि सरकार ही उधार पर चल रही है।
मेरी समझ से इसका कारण निजीकरण है। एक उदाहरण से इसे समझने कि कोशिश करते हैं — शिक्षा एक आवश्यक जरूरत है। अशिक्षित समाज लोकतंत्र नहीं चला सकता है। क्योंकि अर्थ अज्ञानता में नहीं है। इसलिए जो जितना पढ़ा लिखा होगा, उसकी कमाई उतनी ज़्यादा होनी चाहिए, अगर वह अर्थ के उत्पादन में अपनी भूमिका ईमानदारी से निभा रहा है तो। पर, ऐसा होता नजर नहीं आता है। कभी सोचा है — क्यों?
आपका अनुमान बिल्कुल सही है — भ्रष्टाचार। भ्रष्टाचार जब अपने चरम पर पहुँचता है तब शिक्षा चौपट हो जाती है। हाल में वैश्विक स्तर पर निजीकरण अपने चरम पर है। ऐसे में होता यह है कि सरकार टैक्स का पैसा ही निजी क्षेत्रों में निवेश करने लगती है। ताकि ब्याज से मुनाफे की भरपाई कर पाये। प्लान तो अच्छा है, पर काम नहीं कर रहा — क्योंकि निजी क्षेत्र में जिसे मुनाफा हुआ वह दुनिया के अमीरों में शरीक होता जा रहा है। और देश उनकी शादियाँ देखकर दंग है। बेचारे जिनका दिवालिया निकल गया, वे देश से भी निकल गए।
आप ख़ुद सोचिए, अगर आपके पास खाने को रोटी नहीं है, तो क्या आप शेयर मार्केट में निवेश करेंगे? बच्चों को पढ़ाने से लेकर बाप के मृत्यु प्रेम पत्र तक के लिए रिश्वत देनी पड़ती है। अपने बच्चे को पढ़ाने के लिए भी हम लाखों भर रहे हैं। क्या यह रिश्वत नहीं है? क्या सिर्फ़ सरकार ही घुसखोर है? क्या हमने सरकार को शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए पैसे नहीं दिए हैं।
खैर, अब सरकार के पास पैसा आ गया। देखते हैं इसे खर्च करने की उनकी प्राथमिकता क्या है। सबसे पहले तो सरकार पर अगर कोई ब्याज है, तो उसे उतारने की कोशिश होनी चाहिए। फिर जितनी सैलरी, पेंशन आदि का भुगतान करे। उसके बस अपनी योजनाओं के अंतर्गत जिन योजनाओं में उन्होंने सब्सिडी दी है, उसकी आपूर्ति करे। उसके बाद देश के सुरक्षा, कानून के राज को सुनिश्चित करे। तब जो पैसा बचे उसमें समाज सेवा करे, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, ग़रीबी हटाओ, आदि। उसके बाद भी बच जाये तो दान-अनुदान करे।
बड़ी चिंताजनक स्थिति है, जब सरकारें देश की सुरक्षा को भी निजी हाथों में सौंप रही है। जब तक किसी को अशिक्षा, बीमारी, और युद्ध से मुनाफा होता रहेगा, कोई सुरक्षित नहीं रहेगा। सरकारों की पहली प्राथमिकता शिक्षा और स्वास्थ्य होना चाहिए, जो हमें सिर्फ़ वहीं मिल सकता है, जहाँ हम रहते हैं। इसलिए मेरे अनुमान से स्थानीय सरकारी इकाई के पास टैक्स का इतना हिस्सा सीधा पहुँचे कि केंद्र से राज्य, राज्य से पंचायत, पंचायत से स्कूल तक टपकते-टपकते बूँद-बूँद को जनता तरस न जाये। टैक्स का इतना हिस्सा सीधे पंचायत तक पहुँचना चाहिए कि हमारे पड़ोस का स्कूल और हॉस्पिटल जीवन के पक्ष में हो। पब्लिक पालिका की प्रस्तावना इसी दिशा में आर्थिक परियोजना है, जो आपके ध्यान की अभिलाषी है।
वैसे तो, सरकारों का काम नहीं होना चाहिए बम-बारूद बनाना, पर कई ऐसी आपदाएँ हैं, जिसके लिए इनकी जरूरत पड़ सकती है। मगर इसे निजीकरण से बचाना चाहिए। बंदूक बनाने से अगर किसी को मुनाफा होता रहेगा, तो वह रक्षक और भक्षक दोनों को अपना शिकार बनाता रहेगा।
आप क्या सोचते हैं? अपनी राय हमें जरूर बतायें।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)








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