टहल कर जब वापस आ रहा था तो एक विदेशी कुत्ते के पीछे दो देशी कुत्ते लगे थे। विदेशी कुत्ते के गले में पट्टा लगा था और उसका मालिक गर्व से अपने प्यारे कुत्ते को अंग्रेजी में हिदायत दे रहा था। देशी कुत्ते लापरवाह थे। उन्हें विदेशी कुत्ते पर रस्क आ रहा था। वे भी चाहते थे कि उनके गले में पट्टा हो, कोई अंग्रेजी में उनसे बात करे। समय पर खाना दे। उन्हें तेल-साबुन से नहलाये। गली में भी कोई जीवन है? कभी कोई ढेला मारता है, तो कोई दुरदुरा देता है। देशी कुत्ते को पता नहीं है कि उस तरह के कुत्ते बनने के लिए नस्ल बदलनी पड़ती है। भेड़िये वाला गुण चाहिए तो कुत्ते और भेड़िए में क्रास करवाया जाता है और सियार वाला गुण चाहिए तो सियार से। यह युग संकर-युग है। किसी जानवर से किसी अन्य जानवर का क्रास करवा दो। वह दिन दूर नहीं, जब मानव में भी इस तरह के तथाकथित वैज्ञानिक प्रयोग हो सकते हैं। देशी आदमी मुख्य धारा से विस्थापित हो सकता है। प्रकृति ने अलग-अलग नस्लें बनायीं। आदमी संकर नस्ल तैयार कर रहा है। विज्ञान को भूख, गरीबी, बेरोजगारी आदि से लड़ना नहीं है। उसे भी धन पशुओं का गुलाम हो जाना है। धन पशु धन की प्राप्ति के लिए कुछ भी कर सकता है। उसकी आँखें धन पर टिकी रहती हैं।
विदेशी कुत्ते को जब कोई आदमी सुबह-सुबह टहलाने ले जाता है तो गर्व से भरा रहता है। उसके पास अमुक नस्ल का कुत्ता है। वह कुत्ते में सम्मान ढूँढता है। कोई अपनी कार में कुत्ते रखता है। कोई अपने घर में। कुत्ते को घर में किसी भी कमरे में जाने की आजादी है। वह सोफे पर लेटे या पलंग पर – उसे पूरी छूट है। कुछ लोग कुत्ते को अपने साथ सुलाते हैं। ऐसे कुत्ते देशी भाषा नहीं समझते। उनसे अंग्रेजी में बात करनी पड़ती है। वे कुत्ते को हिदायत देते हैं। कुत्ता उसके अनुसार काम करता है। मालिक खुश हो जाता है। उसे लगता है कि कोई है, जो उसके निर्देशों का पालन करता है। आफिस में जाकर तो उसे किसी और के निर्देशों का पालन करना है। कुत्तों के साथ रहते हुए आदमी में कुत्तत्व का गुण आ जाता है। विदेशी कुत्ते विद्रोही नहीं होते। देशी कुत्ते झाँव-झाँव कर लेते हैं। विदेशी कुत्ते जितने मालिक के गुलाम होंगे, वे उतने ही सफल होंगे। उनकी सफलता गुलामी में है। बिना मेहनत के जो आदमी सफल होना चाहता है, उसमें विदेशी कुत्ते का गुण चाहिए। ऐसा आदमी जब किसी पद पर पहुँचता है तो अपने गुणों का प्रसार करता है। उसे गुलाम चाहिए, स्वतंत्र दिमाग वाला आदमी नहीं। अक्सर राष्ट्राध्यक्ष के अंदर कुत्तत्व के गुण भरे होते हैं।
वैसे कुत्ते ने अपनी नस्ल खुद नहीं बदले। आदमी नस्ल बदल रहा है। आदमी जीवों के अन्य नस्लों के प्रति सदय नहीं है। वह सभी को पालतू बनाना चाहता है। घोड़े, गाय , कुत्ते आदि पहले पालतू नहीं थे। आदमी ने अपने काम और लाभ के लिए उन्हें पालतू बनाया। ट्रंप जैसे आदमी को आदमी भी पालतू चाहिए। सत्ताधारियों की यह पुरानी आदत है। वह स्वतंत्रता का ढोंग कर सकता है, उसे बर्दाश्त नहीं कर सकता। यही वजह है कि जो जितना बड़ा ढोंगी होगा, वह लंबी-लंबी फेंकेगा, क्योंकि ढोंग उसका हथियार है। लोग विचित्रता – पसंद होते हैं। उसे ढोंग में ही मजा आने लगता है। आजकल हर जगह ढोंगियों की चलती है। कथावाचक हों या राज नेता हों – वे ढोंग में अभूतपूर्व ढंग से विश्वास करते हैं। वे जानते हैं कि वे ढोंग कर रहे हैं। सुनने और देखने वाला भी जानता है, मगर दोनों मशरूफ हैं।
संकर युग में ढोंग ही परम धर्म है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






