नीरव वातावरण। आम के सैकड़ों पेड़। पूर्व क्षितिज पर उभरता सूर्य का लाल गोला। सुनहरी आभा पेड़ों की फुनगियों पर बिखरती हुई। कोई कोलाहल नहीं। इक्के-दुक्के लोग। चिड़ियों के संगीत। आकाश का नीलापन। मन मुग्ध भी होता है और शांत भी। पहाड़ों पर या सागर के तट या नदियों के किनारों वर्णनातीत सौंदर्य की अनुभूति होती है। चंद्रगुप्त नाटक में कार्नेलिया भारतवर्ष के सौंदर्य का यों अंकन करती है –
अरुण यह मधुमय देश हमारा जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा। सरल तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर। छिटका जीवन हरियाली पर, मंगल कुंकुम सारा।। लघु सुरधनु से पंख पसारे, शीतल मलय समीर सहारे। उड़ते खग जिस ओर मुँह किए, समझ नीड़ निज प्यारा।।
कार्नेलिया दूसरे देश की है, मगर भारतवर्ष के सौंदर्य और स्वभाव पर मुग्ध है। मगर आज क्या हो रहा है। कार्नेलिया जो अनजान क्षितिज थी, उसे देश सहारा देता था, मगर आज अपने वाशिंदों का भी सहारा छीनने को उत्सुक है। एक मुख्यमंत्री किसी का घर उजाड़ देता है, यह कह कर कि यह घर अवैध है। झूठे आरोप में गिरफ्तार भी करवा देता है। वर्षों वह जेल में रहता है। अपार कष्ट भोगता है और एक दिन कोर्ट से फैसला आता है कि उसका घर भी वैध है और उस पर लगाए गए आरोप झूठे हैं। उस व्यक्ति का सब-कुछ लुट जाता है। कोर्ट भी अधूरा फैसला देता है। जिसने घर उजाड़ा, झूठे आरोप लगाये, कम से कम उसको तो सजा देनी चाहिए थी। लोकतंत्र लोक व्यवहार है। लोगों के मान-सम्मान की रक्षा, बराबरी का हक। मुख्यमंत्री और एक सामान्य आदमी में कोई अंतर नहीं है। लेकिन कोर्ट का व्यवहार असामान्य है। उसके तरीके में कहीं न कहीं खोट है।
कोविड के समय प्रधानमंत्री के नेतृत्व में बना पीएम केयर फंड। इसकी समिति में प्रधानमंत्री तो हैं ही, गृहमंत्री और अन्य मंत्री भी हैं। अरबों रुपए जमा हुए। अब आप यह नहीं जान सकते और न पूछ सकते हैं कि कितने जमा हुए और कहाँ-कहाँ खर्च हुए? लोकतंत्र में पारदर्शिता बेहद जरूरी है। अगर आप सही हैं और पैसे की लेन देन में कोई गड़बड़ी नहीं है तो आप जवाब क्यों नहीं देंगे? यह आपकी निजी कमाई नहीं है, न निजी फंड है। जो खुद को शीलवान और प्रज्ञावान कहते थे, उनकी प्रज्ञा फंड में खो गयी है। अगर उनके आप समर्थक हैं तो चुप रहेंगे या समर्थन करेंगे, लेकिन अपनी चेतना को कैसे जवाब देंगे? संसद में जो हंगामे हैं और उनके अंदर का जो सत्य है, वह कितना अंधेरा पैदा कर रहा है।
अमेरिकी सामान पर हम 16 फीसदी टैरिफ लगाते थे, उसे शून्य कर दिया और हमारे सामान पर जो टैरिफ 3 प्रतिशत था, वह 18 प्रतिशत हो गया। उलटे अमेरिका धमकाता है कि अगर तेल रूस से खरीदे तो 25 प्रतिशत ऊपर से टैरिफ लगायेंगे। इसकी घोषणा भी अमेरिका ही करता है तो आप सोचिए कि आपके देश के स्वाभिमान को बेच कर खा गया है।
हो सकता है कि अंधभक्ति में कुछ दिखाई नहीं दे। लेकिन इतनी बात तो जान लेनी चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अब एक हताश-निराश व्यक्ति हैं। उनकी गर्दन पर असहनीय बोझ है। यह बोझ क्यों ढो रहे हैं, इसकी वजह तो वे जानें, लेकिन देश को तबाह करने की इजाजत किसी को नहीं है। सवाल उठाया गया तो सवाल पर जवाब नहीं देकर एक खानदानी सपूत ने कहा कि अमुक व्यक्ति बहुत चुनाव हारा है, इसलिए फ्रस्ट्रेशन में बोल रहा है। अगर आप चुनाव हार गए तो क्या देश के नागरिक नहीं रहे? आप सवाल पूछने के काबिल भी नहीं रहे? ऐसे बदतमीज ने ही गोली मारो सालों को का नारा लगाया था। यह देश एक अरब चालीस करोड़ लोगों का है, इस तथ्य को किसी को नहीं भूलना चाहिए।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






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