सरकारी फिजूलखर्ची भ्रष्टाचार का एक बड़ा स्रोत है। वह आदमी पूरी तरह से भ्रष्ट है, जो राजकोष के रुपए बेमतलब खर्च करता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बहुत से लोगों को बहुत उम्मीदें थीं। वे सामान्य घर से आये थे। अपनी सामान्यतया को भी उन्होंने निर्धनता में बदल दिया था। वे चाय बेच कर आये थे। इसका चुनावी प्रचार धड़ल्ले से हुआ। खोजबीन करने के बाद न वह रेलवे स्टेशन मिला, जहाँ वे चाय बेचते थे, न कोई और ठोस सबूत मिला। मीडिया, उनके मातृ संगठन और उनके समर्थकों ने इतना हल्ला किया कि देश को लगा कि वे चाय बेचते-बेचते नामांकन करने आ गये हैं। जबकि वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे और लंबे समय से उस पर जमे हुए थे। एक झूठ कैसे जनता के दिमाग को ग्रस लेता है, इसका सर्वोत्तम उदाहरण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उसके समर्थकों द्वारा फैलाया गया यह झूठ है। बावजूद इसके लोगों ने उन पर विश्वास किया कि वे आयेंगे तो सचमुच देश के अच्छे दिन आयेंगे।
लेकिन हुआ क्या? एक निर्धन देश के राजकोष को अपने ऊपर बेतरह बहाया। अपने लिए करोड़ों करोड़ का हवाई जहाज, लक्जरी गाड़ी, अपने तरह-तरह के वस्त्र और खाने। अब उनकी एक रैली के खर्चे देखिए। गुजरात में उनकी एक रैली हुई। आदिवासी विकास फंड का रूपया खर्च किया गया। आरटीआई के माध्यम से जो सूचना आम आदमी पार्टी के एक विधायक को उपलब्ध हुई, वह यों है – मंडप बनाने पर सात करोड़, डोम पर तीन करोड़, स्टेज पर पाँच करोड, चाय और नाश्ते पर दो करोड़, बस पर सात करोड़। यह देश के साथ क्रूर मजाक नहीं है? इतनी महँगी रैलियों का क्या मतलब है?
जिस देश की अस्सी फीसदी जनता को खाने के पाँच किलो अनाज सरकार दे रही है । दो सौ लाख करोड़ रुपए देश पर विदेशी कर्ज है। डालर की तुलना में रुपये की कीमत धड़ाधड़ गिर रही है। पेट्रोल से लेकर बाजारू सामान की कीमत पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। वहाँ प्रधानमंत्री की रैलियों पर इतना खर्चा क्या बताता है?
प्रधानमंत्री को इतना हक इसलिए मिल गया कि उन्हें बनारस की जनता ने चुना है। इसके पूर्व के प्रधानमंत्रियों को किसने चुना था? क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आत्मा इसके लिए शर्मसार नहीं होती? अगर नहीं होती है तो इसका मतलब है कि देश से वे छद्म प्यार करते हैं।
मंडप और स्टेज क्या सोने के बनाये गये थे जिस पर बारह करोड़ रुपए खर्च हुए? यह तो एक रैली की बात है। प्रधानमंत्री तो रैलियाँ करते ही रहते हैं। खास कर चुनाव के मौसम में। देश के राजस्व को इस तरह से लुटाने का हक उन्हें किसने दिया है? प्रधानमंत्री नेहरू पर रोजाना मात्र पच्चीस हजार के खर्चे पर डा लोहिया ने संसद में कितने सवाल उठाए और सार्वजनिक सभाओं में लगातार बोलते रहे।
अब तो कोई ऐसा नेता भी नहीं है जो ऐसे सवाल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से कर सकें। इसकी बड़ी वजह है कि लगभग सभी नेताओं की आदतें ऐसी ही हो चली है। सरकारी पैसे को व्यक्तिगत संपत्ति मान कर खर्च कर रहे हैं। पहले के नेताओं पर सुरक्षा के मद में इस तरह से फौज नहीं लगायी जाती थी। महात्मा गांधी ने तो सुरक्षा लेने से साफ मना कर दिया था। नेहरू हों या पटेल – उनकी सभाओं की तस्वीरें देखिए तो आपको अंदाजा लगेगा कि सभा कितनी सहजता से आयोजित की जाती थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सभा में भीड़ दिखे, इसके लिए बस पर सात करोड़ का खर्च है। लोग को ढो-ढो कर उनकी सभा में लाये जाते हैं।
प्रधानमंत्री और उनके लोग इस आर्थिक तबाही पर भले तालियाँ पीटें, लेकिन देशभक्तों को तो जरूर सोचना चाहिए और प्रधानमंत्री से तीखे सवाल करना चाहिए।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







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