"भारत की मौजूदा राजनीति एक चक्रव्यूह में फँस गई है। इस राजनीति के लिए भ्रष्टाचार बहुत ज़रूरी है। अगर आप भ्रष्ट और बदतमीज़ नहीं हैं तो इस राजनीति से दूर रहिए। " - इसी आलेख से
"आज संभव है कि सभी विपक्षी दल इस पर न सोचे और सिर्फ़ अपनी बारी की प्रतीक्षा करते रहें। यह भी हो सकता है कि सचेत नागरिक सत्ता की विकरालता और उसकी धौंस का सामना न कर सके, लेकिन लोकतंत्र के अपहरण का यह जीता-जागता मिसाल है।" - इसी आलेख से
"प्रधानमंत्री का नौका विहार भी सुमित्रानंदन पंत का नौका विहार नहीं है। वे यहाँ भी वोट का व्यापार कर रहे हैं। बेचारे को कितना काम करना पड़ता है। मजा के लिए थोड़ा-सा जो भी वक़्त होता है, वह भी व्यापार की भेंट चढ़ जाता है।" - इसी आलेख से
"प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जानते थे कि जिस तरह की शर्तें वे महिला आरक्षण बिल में जोड़ रहे हैं, उन्हें विपक्ष स्वीकार नहीं करेगा। इन शर्तों को लागू करने के लिए दो तिहाई बहुमत चाहिए, जो उनके पास है नहीं। फिर उन्होंने अचानक लोकसभा की बैठक क्यों बुलाई?" - इसी आलेख से
"जिस देश की अस्सी फीसदी जनता को खाने के पाँच किलो अनाज सरकार दे रही है । दो सौ लाख करोड़ रुपए देश पर विदेशी कर्ज है। डालर की तुलना में रुपये की कीमत धड़ाधड़ गिर रही है। पेट्रोल से लेकर बाजारू सामान की कीमत पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। वहाँ प्रधानमंत्री की रैलियों पर इतना खर्चा क्या बताता है?" - इसी लेख से
डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार गिरता जा रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री चुप हैं। उनके मंत्रीगण अजब-ग़ज़ब जवाब दे रहे हैं। पहले जो लोग हर छोटी-बड़ी बात पर हाहाकार मचाते थे, वे भी आज चुप हैं। मीडिया मौन है। शोर है तो केवल मंदिर और मस्जिद बनने का। क्या कारण है इसका? पढ़िए इस आलेख में।
कल भागलपुर में पुराने साथियों की बैठक हुई। संदर्भ बिहार का चुनाव था। पुराने साथियों का जिक्र इसलिए किया, क्योंकि किसी का संबंध जेपी आंदोलन से था, किसी का झुग्गी झोपड़ी आंदोलन से तो किसी का गंगा मुक्ति आंदोलन से।…
लोकसभा के शीतकालीन सत्र में संविधान के 75वें वर्ष के उपलक्ष्य में संविधान पर विशेष चर्चा आयोजित की गई थी। सत्तारूढ़ दल और उसके मुखिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सारी ऊर्जा, लोकतंत्र के सशक्तिकरण और संवैधानिक मूल्यों को व्यावहारिक जीवन में उतारने के दृष्टिकोण की प्रस्तुति की अपेक्षा कांग्रेस की निंदा करते हुए खर्च हो गई।