जाड़े में सुबह-सुबह बगीचा शांत रहता है। किसी किसी पेड़ पर चिड़िया। आम, कटहल, जामुन, लीची की पत्तियों पर फिसलती ओस की बूँदें। धरती पर बूँदों के धब्बे। पूरब क्षितिज पर सूरज की धमक। हल्का कुहरा। सूरज का गोला तो है, मगर ताप नहीं है। हरेक का ताप एक दिन शिथिल होता है।
मनुष्य के अंदर की ऐंठन चुक जाती है। दुर्योधन की ऐंठन ने उसे कहीं का रहने नहीं दिया। यहाँ तक कि सुयोधन से दुर्योधन हो गया। इतिहास में उसकी छवि बर्बाद हो गई। वीर होकर भी वीर न रहा। विदुर वीर नहीं था, मगर उसकी छवि और छाप बनी हुई है। आदमी वीर हो, मगर ऐंठन न हो। तो उसकी छवि सुरक्षित रहती है। गांधी देह से कमजोर दिखते हैं, लेकिन कर्म से वीर हैं। लाख उन पर आक्रमण होता है, बचे हुए हैं, क्योंकि ऐंठन नहीं थी। सावरकर को वीर बनाने की कोशिश जारी है। ठेल कर गाछ पर कितने ही चढ़ाये जायेंगे, मगर भद से गिर जायेंगे। दूसरे के कंधे पर बंदूक रख कर चलाने वाले को इतिहास कितना याद रखेगा? थोड़ी सी संपत्ति और शोहरत प्राप्त कर आदमी तलवार की तरह तन जाता है। वह आदमी नहीं रहता, तलवार बन जाता है। तलवारें काटती हैं, बनाती नहीं हैं, जबकि आदमी वही है जो बनाता है, काटता नहीं है। आदमी होने की सार्थकता रचने में है। आजकल दुनिया में होड़ मची हुई है कि कौन कितना काटता है?
मुझे तो आश्चर्य लगता है कि किसी पर बुलडोजर चलने से कोई खुश कैसे होता है? अतिक्रमण के नाम पर जिन लोगों को हटाया जा रहा है, वे कौन लोग हैं? क्या वे हत्यारे हैं, क्या वे लुटेरे हैं? क्या गुनाह किया है उन्होंने? उनमें से ज्यादातर छोटे छोटे रोजगार करते हैं। सब्ज़ियाँ बेचते हैं, ठेला लगाते हैं, फल बेचते हैं, जीने के लिए छोटी झोपड़ियाँ बना ली हैं। सवाल यह है कि वे देश के नागरिक हैं या घुसपैठिए हैं? अमीरों के लिए बैंक के पैसे लुटा रहे हैं, पूँजीपतियों को जमीन और जंगल औने-पौने दाम पर दे रहे हैं और निर्धन पर बुलडोजर चला कर वाहवाही लूट रहे हैं। उनके जीने का इंतजाम क्यों नहीं है? देश की इकोनॉमी पाँच ट्रिलियन की हो जाय या दस ट्रिलियन की, फुटपाथ पर जी रहे लोगों के लिए उसमें कोई जगह है या नहीं?
छत पर बैठा हुआ हूं। कौआ काँव-काँव कर रहा है। संसद में भी काँव-काँव हो रहा है। मैं अपने गाँव में देखता था कि दो औरतों ने लड़ाई की शुरूआत की, फिर उनके साथ अन्य औरतें झींका देने आ गई। खूब लड़ाई हुई। गर्जन भी और गालियाँ भी। सभी को मालूम है कि नतीजा कुछ नहीं आयेगा। संसद की हालत गाँव की गली से बदतर है। सत्ता पक्ष सुनने के लिए तैयार नहीं है। उसे विपक्ष पर कोई भरोसा नहीं है और न विपक्ष को सरकार पर। दो अविश्वासी गुट लड़ रहे हैं। भला नतीजा कैसे निकलेगा! मजबूरी है सरकार की कि उसे संसद का सत्र बुलाना पड़ता है। सत्ता पक्ष को संसद की जरूरत नहीं है। मजा यह है कि संसद के पटल पर झूठ बोले जाते हैं और झूठ बोलने वाले पर कोई कार्रवाई नहीं होती। यहां तक कि टोका भी नहीं जाता। अध्यक्ष की मजबूरी है कि वह सत्ता के साथ रहे। हम ऐसे युग में रह रहे हैं, जहाँ झूठ बोलने वालों का सम्मान होता है।
केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी ने कहा है कि बहुत से शराब का धंधा करने वाले टिकट खरीद कर और चुनाव जीत कर विधानसभा में पहुँच गये हैं। मांझी जी ने अपनी पार्टी का टिकट स्वजनों में बाँट दिया। इन्हें दुख है कि और टिकट रहता तो कुछ को बेच कर टका का भी इंतजाम कर लेते।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






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