ठंड पड़े, कोई बात नहीं, लेकिन दिन में सूरज उगे। तीन चार दिनों से सूरज ने कुहरे के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है। यह कोई बात हुई। कायनात का सबसे बलशाली सूरज अदना कुहरे के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो जाए। यह मन को सुहाता नहीं है। वैसे इस ठंड में मैं इधर-उधर ही बौखता रहा हूँ। कभी इस मीटिंग में, कभी उस मीटिंग में। मीटिंग का रोमांस तो तब है, जब ठंड हो और सूरज भी हो। ऐसे वक्त में विचारों के तूफान आते हैं। खूब गर्मागर्म बहस होती है। दुनिया को बदलने के सपने तैरते रहते हैं। यह अलग बात है कि खुद बदलने के बारे में नहीं सोचते। कर्म और विचार दो सिरे पर पड़े रहते हैं। एक नदी के इस पार और दूसरे नदी के उस पार। वैचारिक रोमांस अच्छी बात है, लेकिन वह जीवन का अभिन्न हिस्सा हो।
इस देश की धरती में ऐसा कुछ है जो द्वैत पैदा करता है। हम लंबी-लंबी बात करने के लिए अभिशप्त हैं। महाभारत को देखिए। कितना प्रदीर्घ है! किसी भी कौम के पास शायद ही इतने खंडों में विभक्त कहानी हो। उसमें भी पात्रों का आत्मलाप, उसके बयान और उसका संघर्ष। कभी मनुष्यता खंड-खंड कर बिखर जाती है और फिर वह खुद को समेट कर सीना तान कर खड़ी हो जाती है। पात्रों की उलझन, उसके स्वार्थ और अपने स्वार्थ को विचारों में गूँथने की कला की अभिव्यक्ति गजब की है।
वेदव्यास महाभारत के लेखक भी हैं और पात्र भी। अम्बिका, अम्बालिका और मर्यादा के साथ नियोग कर संतानोत्पत्ति करते हैं। विचित्रवीर्य की मृत्यु के बाद महाभारत की कथा रूक जाती है। हस्तिनापुर का कोई उत्तराधिकारी नहीं बचा। एक भीष्म हैं तो प्रण से बंधे हैं। वेदव्यास को भी महाभारत लिखते हुए लगा होगा कि उसके सृजित सभी पात्र तो मर गये। अब क्या हो? उन्हें तो महाभारत रचना था। तब वे खुद पात्र बन कर आ गये। जब दुनिया दूसरे से नहीं संभलती तो अपने हाथों में दुनिया की रास थामनी पड़ती है। वेदव्यास ने रास थामी और अंधे पुत्र धृतराष्ट्र, पीलिया से ग्रसित पांडु और राजनीतिज्ञ पुत्र विदुर को जन्म दिया। जब कथा अंतिम साँसें गिन रही थीं, वह आगे बढ़ी। धृतराष्ट्र ने भी दो पुत्रों को जन्म दिया – दुर्योधन और दु:शासन। सौ पुत्रों की जो कथा है, उनमें पिता धृतराष्ट्र हैं। माँ गांधारी नहीं है। वे या तो वेश्याएं हैं या दासियाँ हैं। युयुत्सु वेश्या का पुत्र है। कुंती के चार पुत्र हैं – कर्ण, युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन। माद्री के भी दो पुत्र – नकुल और सहदेव। ये सभी पांडु के औरस पुत्र नहीं हैं। सभी का जन्म नियोग से हुआ है। ऐसे पुत्र को क्षेत्रज पुत्र कहा जाता था और राजघरानों में इसकी मान्यता थी। महाभारत की कथा में किसी ने किसी की इस बात के लिए खिल्ली नहीं उड़ाई कि उसके पिता कोई और हैं। आज की नैतिकता की कसौटी पर कसें तो ये रिश्ते टिक नहीं पायेंगे और ऐसी संतानों को अवैध करार करेंगे।
नैतिकता कोई जड़ चीज नहीं है। समय, काल और स्थान पर नैतिकता परिवर्तित हो जाती है। मेरे सर्वप्रिय शिक्षक राधाकृष्ण सहाय ने जर्मनी प्रवास पर एक बेहतरीन किताब लिखी – ‘फिर मिलेंगे’। उसमें एक पारिवारिक घटना का जिक्र है। राधा बाबू और उनकी पत्नी मालती दी को एक जर्मन परिवार खाने पर बुलाता है। जैसे ही लोग खाने पर बैठते हैं कि जर्मन परिवार का वह लड़का आ जाता है, जो दूसरे शहर में रहता है। मालती दी जर्मन परिवार से कहती है कि लड़के को भी खाने पर बुला लीजिए। जर्मन परिवार की स्त्री कहती है कि नहीं, वह बिना सूचना दिए आया है। उसका खाना नहीं बना है। मालती दी भारत से हैं। वह ऐसी बात सोच नहीं सकती। वह बहुत अधूरे मन से खाना खाती है और रह-रह कर लड़के को देख लेती है। खैर।
मैं भटकते हुए दूर निकल गया। कहना यह था कि हमें महाभारत बनना और लिखना आता है – दीर्घ और दीर्घ।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







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