बहराइच (उत्तर प्रदेश) के शायर हुसैन रिजवी का जीवन मुफलिसी में गुजरा और 1964 में दुनिया से विदा हो गये। वे लंबे समय तक गुमनाम ही रहे। उन्होंने ही तंज कसते हुए लिखा था- “बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी था/ हर शाख़ पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा।” आदमी घमंड से भर जाय, बर्बादी के लिए काफी है और अगर उसमें लालच और स्वार्थ भी जगह बना लें तो गुलिस्ताँ को उजड़ने से कोई नहीं रोक सकता।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप में तीनों गुण हैं। वैसे अमेरिका के कई राष्ट्रपतियों में ये दुर्गुण भरे हुए थे, जिसकी वजह से हिरोशिमा-नागासाकी पर बम बरसे और ढाई लाख इंसान मारे गए। नरसंहार उनकी आदत में शामिल है। उसने कोरिया को दो टुकड़े में बाँटा। वियतनाम को तंग-तबाह किया। फिलिस्तीन को कब्रिस्तान बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। इराक को बदनाम कर उसे बर्बाद किया। उसकी बर्बरता के शिकार अफगानिस्तान, सीरिया, चिली, ब्राजील, उरुग्वे, पैरागुआ और अर्जेंटीना जैसे देश भी हुए। हाल फिलहाल वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उठा लिया और अब ईरान पर मिसाइलें दाग रहा है। अमेरिका हथियार का बड़ा व्यापारी है और युद्ध उसके लिए मुनाफा कमाने का जरिया है। दूसरे देशों की संपत्ति हड़प लेना उसके लिए मामूली बात है। तेल और व्यापार पर कब्जा जमाने की होड़ ने विश्व को तृतीय विश्व युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है।
आसमान और समुद्र से दागी जा रही मिसाइलें न जाने कहाँ-कहाँ तबाही मचा रही होंगी – कितने मनुष्य, पशु, पक्षी और जलजीव असमय दुनिया से विदा हो रहे होंगे, यह न ट्रंप को पता होगा, न नेतन्याहू को। हसरत जयपुरी की पंक्तियों हैं – “पंछी बनूँ उड़ती फिरूँ मस्त गगन में/ आज मैं आज़ाद हूँ दुनिया के चमन में।” मनुष्य पंछी को देखता है और आजादी का ख्वाब सजाता है। दुनिया के बादशाहों के कुकर्मों से अंजान हजारों पंछी तड़प-तड़प कर मर रहे होंगे। दुनिया में जिन बच्चों ने आँखें खोलीं होंगी, उन दुनिया में चारों ओर पसरी हुई बारुदी गंध होगी, औरतें और निस्सहाय थर-थर काँप रहे होंगे। जो लोग सवेरे का स्वप्न देख रहे होंगे, उन पर अंधेरा काबिज हो रहा होगा। जो नौजवान चांद, सितारों और सूरज से खेलने और आकाश को बाहों में भरने के सपने देखते होंगे, उनकी छाती से रक्त की धार बह रही होगी।
लोग कहते हैं कि यह ऐसा युग है जिसमें ज्ञान का विस्फोट हो गया है, तो फिर अज्ञानियों की फौज की इतनी जमघट क्यों है? एआई को भी स्वयंभू मान कर बहुप्रचारित किया जा रहा है। वह इस युद्ध को बढ़ा रही है या रोक रही है? मनुष्य में तबाही के बहुत से दुर्गंण हैं। उसमें अगर पलीता लग गया तो ओढ़ी हुई तमाम नैतिकताएँ जल उठती हैं। अमेरिका वैसे भी गर्वोगुमान से लैस है। उसके लिए नैतिकता, अंतर्राष्ट्रीय कानून और विश्व पंचायत कोई मायने नहीं रखता। उसका इतिहास भी बहुत पुराना नहीं है और जो है, वह खून से भरा है। जो भी हो। दिनकर जी ने कभी लिखा था- ’समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध / जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।’
ईरान से भारत की दोस्ती रही है। ईरान के सर्वेसर्वा की हत्या हुई है और हम दो शब्द श्रद्धांजलि के भी नहीं कह सकते। दुश्मन को भी श्रद्धा-सुमन देते हैं। यहाँ तो दोस्तों को भी नहीं दे पा रहे। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर जो ‘पालिसी पारालाइसिस’ का आरोप लगाते थे, आज हर अंग पारालाइज्ड है। युद्ध की हालत को देखकर दुनिया की जनता से कहने की इच्छा है कि कम से कम अपने-अपने देश के नेता को सोच समझकर चुनें। हाट से जानवर तक देखभाल कर लेते हैं और जिन्हें देश के नेतृत्व के लिए चुनते हैं, उन्हें कम से कम लापरवाही या भड़काऊ बयानों के आधार पर न चुनें।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







