अब आम में मंजर आने लगे हैं। यों पेड़ धूल से सने हैं, लेकिन मंजर निकल रहे हैं। जब भी टहलने जाता हूँ, आम की टहनियों को देखता हूँ। कई दिनों से देख रहा हूँ। अब आम की टहनी कोंचियाने लगी है। वर्षों बरस शहर में रहने के बाद भी आम के मंजर को भूल नहीं पाया। गाँव का जो बगीचा था, हम बच्चों के लिए स्वर्ग से बढ़ कर था। कब मंजर आया, कब बौर लगे, कब अमौरियों का रूप लिया। बच्चों को अमौरियों का इंतजार रहता। अमौरियाँ जब आम बन जातीं तो हम सब के हाथ में जब-तब ढेले होते। ढेले से निशाना टीपना हम लोगों का सर्वप्रिय खेल था। खैर, मंजर सृजन की कथा है। हर वर्ष आम के पेड़ मंजर से नये हो जाते हैं। निश्चित समय, निश्चित रचना।
मनुष्य हर वर्ष पुराना होता जाता है। यों वह भी नया हो सकता है। गांधी ताउम्र नये ही रहे। रचते रहे, लड़ते रहे, अडिग रहे, निर्भय रहे। जो भी रचना में संलग्न है, वह नया ही रहता है। रचना चाहे विचारों में हो या लेखन में हो या समाज के नव निर्माण में हो। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने एक ललित निबंध लिखा है – ‘आम फिर बौरा गये।’ वे लिखते हैं – ‘कहा, कैसा मनोहर कोरक है! बलिहारी है इस ‘आताम्रहरित – पाण्डुर शोभा’ की! अभी सुगंधि नहीं फैली है, किन्तु देर भी नहीं है। कालिदास ने आम्र-कोरकों को वसंत-काल का ‘जीवितसर्वस्व’ कहा था। उन दिनों भारतीय लोगों का ह्रदय अधिक संवेदनशील था। वे सुन्दर का सम्मान करना जानते थे। गृहदेवियाँ इस लाल-हरे -पीले आम्र – कोरक को देखकर आनंद विह्वल हो जाती थीं। वे इस ‘ऋतुमंगल’ पुष्प को श्रद्धा और प्रीति की दृष्टि से देखती थी। आज हमारा संवेदन भोथा हो गया है। पुरानी बातें पढ़ने से ऐसा मालूम होता है, जैसे कोई अधभूला पुराना सपना है।
पाँच-छह दिनों से संसद ठप है। सभी सांसद आते हैं। हंगामे होते हैं और फिर चले जाते हैं। सरकार चाहती है कि वह जो कहे, विपक्ष वहीं बोले। विपक्ष चाहता है कि जो उसके मन में है, वही कहेंगे। हो-हंगामे के बीच सरकार ने अमेरिका से डील भी कर ली। डील की घोषणा अमेरिका करता रहा। बहुत शर्मिंदगी महसूस होती है कि भारत की डील की घोषणा अमेरिका करता है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अमेरिका ने उठवा लिया। वह अन्य देशों को भी धमका रहा है। भारत को भी धमकाता है। आजकल ऐसा लगता है कि देश दिल्ली से नहीं वाशिंगटन से चलता है। अमेरिका यह कहे कि भारत को तेल खरीदना पड़ेगा और रूस से वह तेल नहीं खरीदेगा। अगर चोरी छुपे रूस से तेल खरीदा तो उस पर पचास प्रतिशत टैरिफ लगायेंगे। भारत सरकार उसकी बात मान लेता है। क्या यह देश का स्वाभिमान बेचना नहीं हुआ? धमकी देकर मुफ्त में भी कोई तेल दे तो नहीं लेना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ‘माई डियर फ्रेंड‘ कहते थे। अमेरिका और चीन किसी का फ्रेंड नहीं हो सकता। दोनों के लिए अपना व्यापार प्यारा है। चीन पर नेहरू जी ने अतिरिक्त विश्वास किया, उसने सीने में छुरा घोंपा। नरेंद्र मोदी जी ने बीजेपी कार्यालय में चीन से जो बातचीत की, वह सवर्था ग़लत थी। ऊपर से आर एस एस से बातचीत। आर एस एस क्या कोई सरकार है? भारत के बीस सैनिकों को जिस तरह से मारा और जिस भाषा में भारत के इलाकों पर दावा ठोकता है, वह भारत का कभी फ्रेंड नहीं बन सकता। उससे कूटनीतिक संबंध ही हो सकते हैं।
भारत सरकार को समझना है कि भारत को अंदर से मजबूत करें। आपस में टकराने से देश मजबूत नहीं होगा। देश की मजबूती के लिए आपसी सद्भाव और सम्मान जरूरी है। देश के आर्थिक संसाधन पूँजीपतियों के हवाले करने से देश खोखला होता जायेगा।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर





