3 जनवरी 2026 सिर्फ वेनेजुएला के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक खतरे की घंटी है। अमेरिका द्वारा किया गया सैन्य हमला और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी का दावा किसी एक देश की सत्ता बदलने की घटना भर नहीं है। यह उस साम्राज्यवादी मानसिकता का खुला प्रदर्शन है, जो अब कूटनीति की भाषा छोड़कर सीधे कब्ज़े की भाषा बोलने लगी है। और इस मानसिकता का सबसे बेशर्म चेहरा हैं—डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिका और ट्रंप यानी करेला और वह भी नीम पर
वेनेजुएला पर हमले के बाद ट्रंप के बयान सिर्फ तेल या “सुरक्षा” तक सीमित नहीं है। उन्होंने इससे पहले और इसके समानांतर कई बार यह सोच सार्वजनिक रूप से रखी है कि अमेरिका को दूसरे क्षेत्रों और देशों को अपने दायरे में ‘शामिल’ कर लेना चाहिए। कभी ग्रीनलैंड को खरीदने की बात, कभी कनाडा को “स्वाभाविक रूप से अमेरिका से जुड़ा क्षेत्र” बताने जैसा अहंकारी संकेत, कभी पनामा और लैटिन अमेरिका को अमेरिकी प्रभाव-क्षेत्र मानने का दावा—ये सब जुबान फिसलने की घटनाएँ नहीं हैं। ये उस विस्तारवादी सपने की झलक हैं, जिसमें पूरी दुनिया को अमेरिकी मानचित्र का विस्तार समझा जाता है।
ट्रंप की भाषा दरअसल साम्राज्यवाद की पुरानी, लेकिन आज और अधिक नंगी भाषा है— “जो हमारे काम का है, वह हमारा है।”
वेनेजुएला के संदर्भ में यह भाषा और भी साफ हो जाती है, क्योंकि यह मामला सिर्फ जमीन का नहीं है, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार दांव पर हैं और उससे भी अधिक विश्व व्यवस्था और UNO की साख का भी है।
मादुरो की गिरफ्तारी और उसके तुरंत बाद अमेरिकी राष्ट्रपति का यह कहना कि अमेरिका अब वेनेजुएला में “मजबूती से शामिल” होगा, इस बात का सबूत है कि यह हमला लोकतंत्र के नाम पर नहीं, बल्कि संसाधनों के खुले कब्ज़े के लिए किया गया है।
“तीन घंटे में सब खत्म” होने की कहानी साम्राज्यवाद के नए मॉडल को दिखाती है। आज अमेरिका सीधे लंबे युद्धों में फंसना नहीं चाहता; वह पहले से ही भीतर “मीर जाफर” तैयार करता है। सेना, नौकरशाही और राजनीति के कुछ हिस्सों को खरीदो, संस्थाओं को खोखला करो, और फिर निर्णायक वार करो। भारत के संदर्भ में देखें तो 1757 में प्लासी में यही हुआ था—तब ईस्ट इंडिया कंपनी थी, आज पेंटागन है; तब व्यापार के नाम पर कब्ज़ा था, आज लोकतंत्र और ड्रग्स-विरोध के नाम पर।
ट्रंप का यह सपना कि अमेरिका अलग-अलग क्षेत्रों को अपने प्रभाव या सीधे नियंत्रण में ले आए, केवल बयानबाज़ी नहीं है। यह उसी मानसिकता का हिस्सा है जिसने इराक को तहस-नहस किया, लीबिया को अराजकता में धकेला और अब वेनेजुएला को निशाना बनाया। फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह सब खुलेआम कहा जा रहा है, बिना किसी नैतिक आवरण के। साम्राज्यवाद अब शर्मिंदा नहीं है; वह गर्व से अपने इरादे जाहिर कर रहा है।
अमेरिका का सबसे बड़ा झूठ यह है कि वह “तानाशाहों” के खिलाफ लड़ रहा है। सच्चाई यह है कि वह उन सरकारों के खिलाफ लड़ता है, जो उसकी शर्तों पर नहीं चलतीं। वेनेजुएला का अपराध तानाशाही नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक स्वायत्तता है। जिस दिन किसी देश ने कहा कि उसका तेल, उसकी जमीन और उसकी नीतियाँ उसके अपने लोगों के लिए हैं, उसी दिन वह अमेरिकी निशाने पर आ जाता है।
ट्रंप के क्षेत्र-विस्तार वाले बयान इस बात को और खतरनाक बना देते हैं, क्योंकि वे संकेत देते हैं कि यह हमला अपवाद नहीं, बल्कि भविष्य का ट्रेलर है। आज वेनेजुएला, कल कोई और—लैटिन अमेरिका, एशिया या अफ्रीका का कोई भी देश, अगर उसने सिर उठाया, तो उसे “अमेरिकी हितों के खिलाफ खतरा” घोषित किया जा सकता है।
यह हमला सिर्फ वेनेजुएला पर नहीं है; यह पूरी तीसरी दुनिया के आत्मनिर्णय पर हमला है। यह संदेश दिया जा रहा है कि संप्रभुता तभी तक मान्य है, जब तक वह अमेरिकी नक्शे में फिट बैठती है। संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक नैतिकता—सबको ताक पर रखकर अगर यह मॉडल स्वीकार कर लिया गया, तो दुनिया फिर से औपनिवेशिक युग में लौट जाएगी, फर्क सिर्फ इतना होगा कि इस बार झंडा अलग होगा।
इतिहास बताता है कि साम्राज्य अपने सबसे घमंडी दौर में ही गिरावट की ओर बढ़ते हैं। ट्रंप का खुला विस्तारवाद, उसकी बेशर्म भाषा और वेनेजुएला पर किया गया हमला उसी घमंड का प्रतीक है। सवाल यह नहीं कि अमेरिका क्या चाहता है; सवाल यह है कि दुनिया कब तक इस लूट और कब्ज़े को चुपचाप देखती रहेगी।
काराकास आज जल रहा है, लेकिन उसकी आग दूर तक रोशनी फैला रही है। यह रोशनी बता रही है कि या तो साम्राज्यवाद के खिलाफ एकजुट होकर खड़ा होना होगा, या फिर इतिहास बार-बार खुद को दोहराएगा—हर बार किसी नए देश की कीमत पर, और हर बार उसी पुराने अमेरिकी लालच के साथ।

शिक्षक, भौतिक बिज्ञान
कोषाध्यक्ष, बिहार राज्य समिति, एटक








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