कुछ कुछ होता है। सिर्फ प्यार में ही नहीं होता, सत्ता के गलियारे में भी होता है। सुप्रीम कोर्ट ने आनन-फानन में बलात्कारी कुलदीप सेंगर और अरावली की खनन पर तत्काल रोक लगा दी। यह रोक स्थायी रहेगी या अस्थायी – यह आगे देखा जायेगा। वैसे ये दोनों कार्य जरूरी थे। लेकिन जरूरी और भी चीजें थीं। हंसदेव जंगल को जिस तरह से नरभक्षियों ने काटा है, उस पर सुप्रीम कोर्ट को स्वत: संज्ञान लेना था। उल्टे जो जंगल काटने के विरोध कर रहे थे, उसकी खूब धुनाई हुई। आदिवासियों को अक्सर जंगली समझते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि वे सबसे ज्यादा सभ्य कौम है।
मैं गाँव में जब था तो खेतों में काम करते हुए मिट्टी को पहचानता था। किस मिट्टी की प्रकृति क्या है और उसमें कौन सी फसल लगेगी, यह मैं जानता था। मेरे पिता तो मिट्टी के एक्सपर्ट ही थे। केबाल मिट्टी या दोमट मिट्टी कैसे काम करती है, सालों काम करते हुए पिता जान गये थे। कोई भी कृषि वैज्ञानिक उतनी बातें नहीं बता सकता, जितनी बातें पिता बता सकते थे। उसी तरह जंगल के बारे में जितना बेहतर ज्ञान आदिवासियों को होता है, उतना अडानी अंबानी को नहीं होता, मगर सत्ता की गोद में बैठ कर मुनाफाखोरी के लिए ये लोग कौन सा पाप नहीं करते! सत्ताधारी भी कम बदमाश नहीं होते। दोनों भीतर-ही-भीतर शोले फिल्म वाली दोस्ती रखते हैं – ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर, साथ न छोड़ेंगे।
15 फरवरी 2024 को इलेक्ट्रोल बांड का फैसला आया था। सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रोल बांड को अवैध घोषित किया। लेकिन इस इलेक्ट्रोल बांड के द्वारा जो पैसा आया, वह वैध बना रहा। इस बांड के द्वारा सरकार ने कितने घोटाले किए, पूँजीपतियों ने काले को सफेद बनाया, इसके बदले में सरकार ने पूँजीपतियों को ठेका दिया और सरकारी संपत्ति का वारा न्यारा किया – इसके बारे में सुप्रीम कोर्ट चुप रहा। यह अधूरा फैसला था। अगर सुप्रीम कोर्ट इसकी तह में जाकर व्यवस्था की पोल-पट्टी खोलता तो देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर बड़ी कृपा होती।
कोविड में पीएम केयर फंड बनाया गया। पीएम यानी प्रधानमंत्री उसके सर्वेसर्वा थे। उस समिति में कई केंद्रीय मंत्री थे। आप कल्पना कीजिए कि नरेंद्र मोदी जी प्रधानमंत्री नहीं रहते और फंड के लिए आह्वान करते तो कितने पैसे आते! पीएम के कारण करोड़ों करोड़ आये, लेकिन पैसा सरकारी न रहा । पीम सरकारी, केंद्रीय मंत्री सरकारी, लेकिन पैसे निजी। आप आरटीआई के माध्यम से भी यह जानकारी नहीं ले सकते कि वस्तुत: कितने रुपए जमा हुए और वे पैसे कहाँ लगाए गये।
सचमुच कुछ-कुछ होता है। एक निर्धन देश में बहुत कुछ हो रहा है। पंडित और मुल्ला दोनों लगभग अधार्मिक होते हैं। लंबी-लंबी हांकते रहते हैं। एक को शरीयत का कानून चाहिए और दूसरे को मनुस्मृति का। दोनों खुद को संविधान से ऊपर घोषित करते हैं। ऐसे महान पुरुषों से नम्र निवेदन है कि वे इस देश को माफ करें। यह देश संविधान से चलता है और चलेगा। जिन्हें मनुस्मृति या शरीयत प्यारा है, वे किसी और जगह अपना देश बसायें। पूजा पाठ अपनी हद में रह कर करें तो कोई बात नहीं। संविधान में इसके लिए प्रावधान है, लेकिन संविधान से ऊपर कुछ नहीं है। जिन्हें ईश्वर या अल्लाह में भरोसा करना है, करें, लेकिन उन्हें संविधान के दायरे में ही चलना है। मनुस्मृति और शरीयत के पूजक अपने अपने धर्मावलंबियों में तो समता कायम नहीं कर सकते। क्या ईश्वर या अल्लाह ने किसी को ब्राह्मण और किसी को डोम बनाया या किसी को पठान और किसी को हलालखोर बनाया?
धर्म के नाम पर अंधेर कायम मत कीजिए। खिड़कियों से झीनी झीनी रोशनी भी आती है श्रीमान!

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






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