मैं सोचता हूँ। मैं सोचता ही रहता हूँ। कौन हूँ मैं? मैं क्या हूँ? क्यों हूँ मैं? चलिए! मेरे साथ मैं आपको ख़ुद से मिलवाता हूँ। ऐसा नहीं है कि मुझे पता है, डगर क्या है और मंजिल कहाँ? फिर भी मैं चला जा रहा हूँ। चलिए! कुछ दूर आप मेरे साथ चलिए।
प्राकृतिक रूप से मैं आदमी हूँ, एक homo sapien, एक सामाजिक प्राणी। समाज की बुनियाद उसकी राजनीति पर टिकी होती है। कुछ राजनीति हमें बंदरों में भी तो देखने का मौका मिलता है। फलस्वरूप मैं एक राजनैतिक प्राणी भी हूँ।
क्या होती है राजनीति? सत्ता की ललक है राजनीति? या ताक़त की हवास है राजनीति? शासन है? या क़ानून है राजनीति? क्या सिर्फ़ सार्वजनिक जीवन का प्रबंधन है, राजनीति? क्या कोई जिम्मेदारी है, राजनीति? आधार क्या है राजनीति का?
मेरी समझ से “संवाद” है राजनीति। शब्द ना होते तो राजनीति कैसे होती? क्या आपने किसी कुत्ते को भाषण देते सुना है? नहीं ना। जब लोकतंत्र नहीं भी था, थी राजनीति। क्या युद्ध के पहले संवाद नहीं होते थे? अगर बात समझ से सुलझ जाती, तो एटम बॉम क्यों गिराने पड़ते? कभी सोचा है? नहीं भी तो अब सोचिए। मैंने सोचा है, अनुभव किया है, जब भी मेरे पास शब्द कम पड़ गए, तभी मेरे हाथ उठे हैं। मैंने कुछ प्रयोग किए, बोलना ही कम कर दिया। मैं लिखने बैठ गया। अब तो अभिव्यक्ति के मेरे ये शब्द अनगिनत हो चुके हैं। हाँ! मैं एक लेखक हूँ।
पर क्या सिर्फ़ मैं एक लेखक ही हूँ। नहीं, उसके पहले मैं एक बेटा हूँ। एक पिता हूँ। मेरी पहली जिम्मेदारी मेरा परिवार है। देखता हूँ जब अपने घर-आँगन में झाँककर तो पाता हूँ, लोग बाहर चौधरी बनने की फिराक में घर से ही गायब हैं। मेरा घर, मेरा गाँव सूना पड़ा है। जो वहाँ बचे भी हैं, भाग जाने की फिराक में हैं। मैं तो कभी अपनी ज़मीन से ठीक से जुड़ भी नहीं पाया। भागता ही फिरा हूँ। मैं भी एक भगौड़ा हूँ। आज कल तो ना जाने कैसे-कैसे लोग देश लूट भाग गए। उनके गिरेबान तक हाथ ज़रूर पहुँच जाएँ, मगर उसका नश्वर शरीर आज़ाद है। हम सभी आजाद हैं। एक ऐसी आजादी है, जो हमें ना कोई संविधान दे सकता है, ना ही कोई सत्ता हमसे छीन सकती है। वह आजादी कल्पना करने की है। मैं एक कल्पनाकार हूँ।
मेरी समझ से सामूहिक कल्पना ही राजनीति को आकार देती है। लोकतंत्र ना भी होता, तो भी हर राजा बुरा नहीं होता, इतिहास हमें अक़बर से भी मिलवाता है, औरंगज़ेब से भी। इतिहास का ही नहीं, साहित्य का हर किरदार हम सब के अंदर बसता है। राम भी वहीं मिलेंगे, जहाँ रावण मिलेगा। दोनों एक दूसरे के बिना रह ही सकते। चुनाव हमारा है, हम अर्थ को चुनते हैं, या अनर्थ कर बैठते हैं। अर्थ में राम मिलेंगे, अनर्थ ही तो रावण है। चुनाव करने को ना सिर्फ़ हम स्वतंत्र हैं, बल्कि मजबूर हैं। हमरे चुनाव ना करने का फैसला भी एक चुनाव ही तो है। लोकतंत्र बस वह पड़ाव है, जहाँ हमें चुनाव करने की इजाजत समाज ही देता है। मैंने कभी मतदान नहीं किया, फिर भी मैं एक मतदाता हूँ। आजकल मतदाता मर रहे हैं।
लोगों पर चढ़कर,
लोग मर गए,
साँस ना मिली,
घुटन से लोग मर गए।
लोगों से लड़कर,
लोग मर गए,
हक़ ना मिला,
जलन से परिवार जल गए।
लोगों को पढ़कर,
लोग मर गए,
शिक्षा ना मिली,
डिग्री धारी छात्र मर गए।
लोगों को खिलाकर,
लोग मर गए,
अन्न ना मिला,
किसान मर गए।
लोगों को ख़रीदकर,
लोग मर गए,
पैसा ना मिला,
ग्राहक मर गए।
लोगों को मारकर,
लोग मर गए,
गोडसे ना मरे,
गांधी मर गए।
लोगों को पालकर,
लोग मर गए,
माया पाकर,
ब्रह्म मर गए।
मर जाने से भी,
जमीर नहीं मरता,
अहंकार नहीं मरता,
भूत नहीं मरता।
भूत बीत गया,
फिर क्यों अवतार नहीं मरता?
क्यूंकि,
अवतार चेतना की अवस्था है,
जीवन का पक्ष मात्र है,
तभी तो,
जिस वाल्मीकि ने राम को रचा,
रावण की कल्पना भी उसी ने की।
मर जाना नियति है,
जीना चुनाव है,
चुनकर नेता,
मतदाता मर गए।
मर जाना जरूरी है,
मर जाना मुक्ति है,
मुक्ति की हवस में,
मोक्ष मर गया।
ईश्वर काल्पनिक है,
या कल्पना ईश्वर है,
मृत्यु अगर सत्य होती,
तो जीवन के बाद कैसे होती?
गर आत्मा अमर है,
तो काहे का डर है?
इस डर से क्यों लोग जीते जी मर गए?
लोक मर गया,
तंत्र मर गया,
लाशों पर चढ़कर,
सरकार बन गई!
भयभीत लोग,
जीते जी मर गए,
साहस मर गया,
सवाल मर गए,
जिज्ञासा मर गई,
जीने की चाह मर गई,
क्यों जिजीविषा मर गई?
क्यूंकि,
न्याय मर गया,
कानून मर गया,
लोग गए,
उनके साथ,
उनके नाम भी मर गए।
एक नाम ही तो है,
वरना हमारी पहचान क्या होती?
एक आत्मा,
एक परमात्मा,
करोड़ों ईश्वर इस धरा पर,
फिर कहाँ से आए?
अहम् ब्रह्मास्मि,,
तत् त्वम् असि,
तू एक ईश्वर,
मैं भी।
वर्षों से जनगणना नहीं हुई,
सुना है,
ईश्वरों की संख्या,
अरब पार कर गई।
क्या हम इस दुनिया को अर्थ नहीं देते? अर्थहीन इस Earth पर कुछ भी नहीं हैं। अर्थ की तलाश में मैंने अपना अनुभव लिख डाला। नाम दिया इहलोकतंत्र। क्या है इहलोकतंत्र? मैंने पाया यह दुनिया मेरी है। मैं इसे लिख रहा हूँ, ना सिर्फ़ शब्दों में, बल्कि अपने कर्मों से। मैंने अपने कर्म लिख डाले। सनातन दर्शन में ज्ञान के छह ही प्रमाण मिलते हैं — प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति, और अनुपलब्धि। मैंने सिर्फ़ अपना प्रत्यक्ष ही नहीं, अपनी अनुपलब्धियाँ भी लिख डाली। शब्द मिले तो अर्थापत्ति करने का अनुमान मिला। विज्ञान की भी यही पद्धति है। सरल है। पहले इस्तेमाल करो फिर विश्वास करो।
हम क्यों अपने बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य को भगवान भरोसे छोड़ रहे हैं? हम, भारत के लोग इसके भाग्य-विधाता हैं। कोई महामानव हमारी पहचान नहीं बता सकता। हमें ख़ुद को पढ़ना है, हर पुस्तक, हर अनुभव में, तभी हम ख़ुद पर राज कर पाने में सक्षम होंगे। किसे चाहिए लोकतंत्र जो परलोक की बातें करता है। मुझे तो इहलोकतंत्र चाहिए!
संभव है, आप भी थोड़ा ख़ुद के क़रीब आ पाए होंगे। हमें मिलकर जीवन को चुनना ही तो है। कितना आसान है।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)








[…] मुझे तो इहलोकतंत्र चाहिए! […]
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