भारत में शिक्षा का परिदृश्य पिछले तीन दशकों में गहरे संरचनात्मक परिवर्तनों से गुज़रा है। सामाजिक अधिकार के रूप में शिक्षा की अवधारणा, धीरे-धीरे, बाज़ार के तर्कों, निजीकरण, उपभोक्ता मॉडल, शुल्क-आधारित पहुँच और आपसी प्रतिस्पर्धी व्यावसायिक ढाँचे में परिवर्तित हो रही है। शिक्षा का यह चरित्रगत परिवर्तन केवल संस्थागत परिवर्तन नहीं है, बल्कि राजकीय चरित्र के व्यापक वैचारिक बदलाव का नतीजा है। यह परिवर्तन ज्ञान को एक सामाजिक वस्तु के स्थान पर बाजारू वस्तु में बदल रहा है और इस तरह यह अपने मूल अभिप्राय को ही खोता जा रहा है। इवान इलिच (Illich, 1971) के शब्दों में –“Education becomes meaningless where learning becomes purchasable.” यद्यपि शिक्षा को भारत के संविधान ने मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21A) और समान नागरिकता की आधारशिला माना है। तथापि उदारीकरण के बाद से शिक्षा, धीरे-धीरे, सार्वजनिक कल्याण से हटकर निजी व्यावसायिक ढाँचे की दिशा में अग्रसर हुई है।
शिक्षा का बाजारीकरण तीन सैद्धांतिक पायों पर खड़ा होता है – नवउदारवाद, उपभोक्तावाद और सामाजिक असमानता।
नवउदारवाद
नवउदारवाद पूँजी के संचालन का आर्थिक-राजनीतिक मॉडल है, जो केवल वस्तु को ही नहीं, बल्कि सारी चीजों को- कला, साहित्य, गीत को भी, यहाँ तक कि प्रेम, हर्ष, विषाद, चिंतन आदि भाव और विचार तक को – बाजार के हवाले कर देता है। यही सिद्धांत शिक्षा को भी बाजार की जरूरतों के अनुकूल बनाता है – संरचनात्मक से लेकर वैचारिक तक। यह शिक्षा के सार्वजनिक अधिकार और सामाजिक कल्याण की पारंपरिक बुनियाद को बदलकर प्रतिस्पर्धा, निजीकरण और लागत-लाभ की नयी बुनियाद स्थापित भी करता है और स्वीकार्य भी बनाता है। फ्रेडरिक हायक और मिल्टन फ़ाइडमैन इसके बड़े पैरोकार रहे हैं।
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इस सिद्धांत की मुख्य विशेषताएँ हैं –
(i) नागरिक के बदले मानव-पूँजी का निर्माण :
शिक्षा का नवउदारवादी ढाँचा शिक्षार्थी को सक्षम नागरिक बनाने के बदले पूँजी में बदल देता है। पूँजी का अर्थ वह धन है, जिससे मुनाफा कमाया जा सकता है। नवउदारवादी प्रभाव में बच्चों को व्यापार की वस्तु समझा जाता है। इसीलिए उसमें पूँजी लगायी जाती है, पूँजी के बल पर उसे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लायक बनाने की कोशिश की जाती है और इसमें सफल होने पर लागत की वापसी के साथ मुनाफा देखा जाता है। यह शिक्षा के द्वारा सामाजिक समानता लाने के बदले उसे धन-सक्षम लोगों के हाथों में सौंपता है।
(ii) राज्य की वित्तीय भूमिका का स्थानांतरण :
नवउदारवाद में राज्य सार्वजनिक शिक्षा के प्रति लगातार अनुदार होता जाता है। बच्चों को पढ़ाने का राजकीय दायित्व, धीरे-धीरे, अभिभावकों की आर्थिक जवाबदेही में बदल जाता है। राज्य बच्चों को पढ़ाने की जवाबदेही से ही नहीं भागता है, बल्कि संस्थाओं के वित्त-पोषण की जवाबदेही भी उतार फेंकता है। इसलिए वह स्वायत्तता की नयी परिभाषा गढ़ता है, जिसका वास्तविक अर्थ होता है – आत्मनिर्भर होना, अर्थात् अपने अस्तित्व को बचाने के लिए फ़ीस बढ़ाने की छूट, फंडिंग लाना, स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रम चलाना आदि। अर्थात् दायित्व का स्थानांतरण होता है।
(iii) वाणिज्यीकरण :
नवउदारवादी व्यवस्था में निजी विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, कोचिंग संस्थानों का विस्फोट होता है। इसका कारण शिक्षा का प्रसार करना नहीं, बल्कि शिक्षा को ‘उद्योग’ बनाना होता है। शिक्षा परमार्थिक से वाणिज्यिक होने लगती है और बाजार को सौंपा जाने लगता है। यह बाजार स्थानीय उद्यमियों के लिए ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय रूप से खोला जाता है। इसीलिए वर्तमान शिक्षा नीति में भी विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में खोलने की अनुमति दी गई है।
(iv) मानकीकरण :
नवउदारवाद का यह महत्वपूर्ण ‘औजार’ है। इस औजार के माध्यम से वह कुछ संस्थाओं को ‘बेहतर’ घोषित करता है और अनेक (जिनमें अधिकतर सार्वजनिक संस्थाएँ ही होती हैं) को घटिया। इसके लिए रैंकिंग सिस्टम, जैसे – NAAC, NIRF, QS World Ranking आदि, को अनिवार्य बनाया जाता है। इसके ज़रिए कुछ संस्थाओं को ‘विश्व स्तरीय संस्थान’ बनाने का जुनून परोसा जाता है, जबकि उसी समय हजारों संस्थाएँ भुखमरी का शिकार होकर दम तोड़ देने के कगार पर होती हैं। केवल सस्थाओं का ही नहीं, बल्कि परीक्षाओं का भी मानकीकरण किया जाता है। मानकीकृत परीक्षण (Standardised Testing), जैसे – JEE, NEET, CUET आदि, इसी के तरीक़े हैं। विज्ञापनों, वक्तव्यों, कठिन प्रवेश आदि के द्वारा जिन संस्थाओं और परीक्षाओं का विशिष्टीकरण किया जाता है, वे विशिष्ट और मानकीकृत संस्थाएँ और उन परीक्षणों में सफल छात्र उच्च स्तर के माने जाते हैं, बाक़ी साधारण। यह पढ़ाई के दौरान ही तय हो जाता है।
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(v) फंडिंग का नया फ़ंडा :
नवउदारवादी शिक्षा मॉडल में राज्य द्वारा शिक्षा संस्थानों के वित्तपोषण (अनुदान) को ऋण से विस्थापित किया जाता है। शिक्षा संस्थानों को अब राज्य से प्राप्त होने वाले अनुदान के बदले बैंक या बाजार से कर्ज लेकर चलाने के लिए प्रेरित किया जाता है। इस तरह शिक्षा संस्थान को व्यापारिक संस्थान में बदल दिया जाता है। छात्रों को भी शिक्षा-ऋण के लिए प्रोत्साहित किया जाता है तथा स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमों की बाढ़ आ जाती है। मुख्य रूप से इन्हीं स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमों से होने वाली आय पर महाविद्यालय-विश्वविद्यालय निर्भर होते चले जाते हैं। इस तरह, फीस के मामले में, निजी और सार्वजनिक संस्थाओं के बीच का अंतर मिटाया जाता है।
(vi) कॉर्पोरेटीकरण :
नवउदारवादी मॉडल शिक्षा में नागरिक और सामाजिक पक्ष को नष्ट कर देता है और उसके बदले उसे औद्योगिक आवश्यकताओं के अनुकूल गढ़ने लगता है। वोकेशनल कोर्सेस की भरमार और नौकरी दिला सकने की संभावना के कारण उनके प्रति छात्रों का आकर्षण तथा स्किल इंडिया के नारे आदि इसी के उदाहरण हैं। इतना ही नहीं, शिक्षा संस्थानों के संचालन, पाठ्यक्रम, नीति-निर्माण, निर्णय आदि की प्रक्रियाओं में कॉर्पोरेट और इंडस्ट्री के खिलाड़ियों को शामिल किया जाता है। संस्थानों में शामिल होकर वे इंडस्ट्री की व्यावहारिक जरूरतों के अनुसार उसे दिशा देते हैं। इस तरह, शिक्षा संस्थानों का, शरीर और आत्मा दोनों ही स्तरों पर, धीरे-धीरे, कॉर्पोरेटीकरण किया जाता है।
(vii) दस्तावेजीकरण :
अपने रास्ते को सुगम बनाने के लिए नवउदारवाद बौद्धिक तैयारी पहले से ही करके रखता है। इन दस्तावेजों में निजीकरण-औद्योगीकरण को ही उचित उपाय के रूप में समझाया जाता है, उसके रास्ते भी सुझाए जाते हैं और इस तरह नागरिकों को मानसिक रूप से पहले से ही तैयार कर लिया जाता है, जिससे बाद में होनेवाला विरोध कमजोर हो जाता है। भारत में अंबानी-बिरला रिपोर्ट (2000), नॉलेज कमीशन (2005-09), राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020) आदि ऐसे ही दस्तावेज हैं।
(viii) बदनाम करना :
सार्वजनिक शिक्षा संस्थानों को बदनाम करने का सुनियोजित अभियान चलाया जाता है। पहले संस्थानों को कुपोषित रखा जाता है, अध्ययन-अध्यापन की संस्कृति को कमजोर किया जाता है, अध्यापन के अवसरों को कम किया जाता है, अकादमिक सहयोग के बदले प्रशासनिक निगरानी तंत्र के द्वारा शत्रुवत् व्यवहार किया जाता है; फिर रैंकिंग, रिपोर्ट आदि का सहारा लेकर उन्हें नाकाबिल घोषित किया जाता है।
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उपभोक्तावाद
नवउदारवाद ही शिक्षा के उपभोक्तावादी मॉडल को स्थापित करता है, जिसमें शिक्षा का मूल्य उसके बाजार-मूल्य अर्थात् नौकरी दिलाने की क्षमता से तय होता है और ज्ञान, चेतना, सामाजिक परिवर्तन की क्षमता आदि पारंपरिक मूल्यों का क्षरण हो जाता है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
(i) छात्र का ग्राहक हो जाना :
ग्राहक-संतुष्टि की तरह छात्र-संतुष्टि प्रमुख हो जाता है। इसके लिए जिस तरह दुकानों में ग्राहक के प्रवेश से लेकर ख़रीददारी तक को सुगम बनाया जाता है, उसी तरह निजी शिक्षा संस्थानों में अधिकतम छात्रों के प्रवेश के अनेक रास्ते बनाए जाते हैं। उनकी उपस्थिति, मूल्यांकन, पाठ्यक्रम आदि को लचीला और ढीला किया जाता है और कई बार आसान मार्किंग, प्रोजेक्ट खरीदने की सुविधा, प्लेसमेंट गारंटी आदि सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। इसके उलट कुछ संस्थाएँ प्रवेश को नियंत्रित रखकर अपनी विशिष्टता विज्ञापित करती हैं और उसके बदले विशिष्ट कुलीनता का दर्जा हासिल करती हैं और ऊँची फ़ीस भी।
(ii) छात्र के बदले डिग्री उत्पाद हो जाती है :
छात्र के निर्माण का ध्येय खो जाता है और डिग्री प्रमुख हो जाती है। इस डिग्री को पैकेज्ड प्रोडक्ट की तरह बेचा जाता है। इसके लिए संस्था के नाम की ब्रांडिंग की जाती है और कैंपस की ख़ूबसूरती और प्लेसमेंट के इतिहास का विज्ञापन किया जाता है। छात्र ब्रांड के अनुसार मूल्य चुकाकर डिग्री ख़रीदते हैं और फिर कंपनियों के सम्मुख खड़े होकर उस डिग्री के अनुसार पैकेज्ड नौकरी पाते हैं।
(iii) शिक्षा संस्थान का कंपनी में रूपांतरण :
शिक्षा संस्थान कंपनी का चरित्र धारण कर लेते हैं। जिस प्रकार कंपनी का उद्देश्य मुनाफा कमाना होता है, वही उद्देश्य शिक्षा संस्थानों का भी हो जाता है। ओ पी जिंदल, एमिटी, मणिपाल, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी आदि अनेक संस्थानों के आईपीओ (Initial Public Offering) आ चुके हैं या आने वाले हैं। निजी संस्थान का यह चरित्र सार्वजनिक संस्थान भी अपनाते हैं।
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(iv) मार्केटिंग :
अनेक संस्थाओं के द्वारा फाइव स्टार कैंपस, स्विमिंग पुल, एसी क्लासरूम, विदेशी टूर, सेलिब्रेटी विजिटर, रैंकिंग आदि के नाम पर ब्रांडिंग की जाती है, विज्ञापन निकाले जाते हैं और सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर के द्वारा प्रमोशन कराया जाता है। कई बार तो रैंकिंग खरीदने के आरोप भी ज़ाहिर होते रहे हैं। इस तरह विभिन्न उपायों से संस्थानों की मार्केटिंग की जाती है।
(v) ऊँची फीस बनाम प्रतिष्ठा :
ऊँची फीस का अर्थ ज़्यादा लूट होना चाहिए। लेकिन नवउदारवाद में ऊँची फीस को ऊँची प्रतिष्ठा के साथ जोड़ा जाता है। इस तरह संस्थान और छात्र दोनों के स्तर पर कुलीनता का नया संवर्ग स्थापित होता है।
(vi) शिक्षा का MacDonaldisation :
शिक्षा पिज्जा-बर्गर की दुकान की तरह हो जाता है। किसी ब्रांडेड कॉलेज या स्कूल के फ्रेंचाइजी कॉलेज और स्कूल जगह-जगह खुलने लगते हैं। इन कॉलेजों और स्कूलों में पूरे देश में एक ही सिलेबस चलाया जाता है। इस तरह ब्रांडेड संस्थान अपने प्रति आकर्षण उत्पन्न कर अपनी सहूलियत के अनुसार शिक्षा का ग्लोबल या नेशनल पाठ्यक्रम तैयार करता है, जो क्षेत्रीय और सांस्कृतिक वैविध्य को धीरे-धीरे निगलता चला जाता है।
सामाजिक असमानता
समतामूलक समाज की स्थापना के लिए, उपलब्धता और गुणवत्ता, दोनों ही दृष्टियों से समान शिक्षा व्यवस्था आवश्यक है। लेकिन नवउदारवाद समानता, समावेशी विकास, अवसरों की समानता, कमजोर वर्गों के सशक्तिकरण, राज्य की पुनर्वितरणकारी भूमिका आदि सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को व्यवस्थागत रूप से कमजोर करता है। इसके लिए वह मुख्य रूप से तीन उपायों का सहारा लेता है –
(i) शिक्षा तक पहुँच को घटाना :
शिक्षा तक सभी वर्गों की समान रूप से पहुँच समाप्त एक उद्देश्य हो जाता है। इसके लिए बड़ी तादाद में विद्यालयों को बंद किया जाता है, महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों की फंडिंग में कटौती की जाती है, छात्रों से ली जाने वाली फीस में बढ़ोत्तरी की जाती है और निजीकरण को बढ़ावा दिया जाता है। इन सब उपायों और ऐसे ही अन्य उपायों के कारण शिक्षा तक सभी परिवारों की समान रूप से पहुँच संभव नहीं रह जाती है।
(ii) शिक्षा के अवसर में असमानता :
महँगे कोचिंग, अंग्रेजी माध्यम और ‘मेरिट बेस्ड सिलेक्शन’ से शिक्षा में प्रवेश के अवसर की असमानता उत्पन्न होती है। NEET में सफल शीर्ष 100 में 90 से अधिक शहरों के कोचिंग से आए हुए बच्चे होते हैं। उसी तरह आईआईटी एडवांस में ग्रामीण पृष्ठभूमि के बच्चे 5% से भी कम होते हैं। इस तरह सुविधा-संपन्न समुदाय का शिक्षा पर कब्जा हो जाता है और वंचित समुदाय हाशिये पर रह जाता है।
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(iii) औद्योगिक उपयोग की शिक्षा की प्रमुखता :
नवउदारवादी व्यवस्था में शिक्षा की दिशा बदल जाती है, उद्देश्य भी। शिक्षा-प्राप्ति में निवेश किया जाता है। इसलिए उस खरीदी गयी डिग्री के बल पर कमाई के उपाय की तलाश की जाती है। कमाई का बड़ा सेक्टर नौकरी है और अधिकतर नौकरी औद्योगिक और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में है। इस तरह औद्योगिक और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में नौकरी दिला सकने वाले विषयों में भीड़ लगी रहती है और मानवीय-सामाजिक संदर्भ के मानविकी-सामाजिकी के विषय हाशिये पर ढकेल दिए जाते हैं।
भारतीय परिदृश्य
नवउदारवादी मूल्य भारत में भी शिक्षा के परिदृश्य को लगातार बदलते जा रहे हैं। U–DISE+ 2023-24के अनुसार पिछले 10 वर्षों में 89,441 सार्वजनिक स्कूल बंद कर दिए गए हैं। यह संख्या कुल सार्वजनिक विद्यालयों का 8% है। लेकिन, उपर्युक्त स्रोत के मुताबिक ही, निजी और ग़ैर सहायत प्राप्त स्कूलों की भागीदारी अब 36.80% हो गयी है।
यह छात्रों को त्यागकर बचत करने की नीति के कारण है। बिहार में शिक्षा विभाग की और से विद्यालयों को 10% छात्रों का नाम काट देने का आदेश निर्गत किया गया ताकि डीबीटी के मद के 300 करोड़ रुपए बचाए जा सकें। उत्तरप्रदेश में 5000 विद्यालयों को एकमुश्त बंद कर दिया गया और उस बंद किए गए स्कूल के बच्चों को दूसरे स्कूल में पढ़ने चलने के लिए मनाने वाली शिक्षिका पर मुकदमा कर दिया गया। मध्यप्रदेश के अख़बारों में गौरव के साथ इस बात को प्रकाशित किया गया कि अब एक लाख विद्यालयों के बदले 10,000 अच्छे स्कूल रहेंगे।
उच्च शिक्षा का परिदृश्य इससे भी बदतर है। अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (AISHE), 2022 के अनुसार निजी और ग़ैर सहायता प्राप्त महाविद्यालयों की संख्या 79% हो गयी है और सरकारी कॉलेज सिकुड़कर महज 21.4% रह गए हैं। तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा में निजी महाविद्यालयों की भागीदारी और भी अधिक है – इंजीनियरिंग में 95% और मेडिकल में 65% से अधिक।
भारत में कोचिंग उद्योग का लगभग 60,000 करोड़ का विशाल बाजार बन गया है। शिक्षा-ऋण, जो 2010 में 47,000 करोड़ था, अब एक लाख करोड़ से अधिक का हो गया है। ये परिस्थितियाँ सामाजिक समानता की खाई को चौड़ा तो करती ही हैं, इसके साथ ही छात्रों को ‘ज्ञान आधारित नागरिक’ के बदले ‘कर्ज से दबे कर्मचारी’ बनाकर रखती है।
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सार्वजनिक शिक्षा में निवेश की कमी बाजारू संस्थाओं को प्रवेश का अवसर प्रदान करती है। कोठारी कमीशन ने ही जीडीपी के 6% का निवेश शिक्षा में करने की अनुशंसा की थी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी उसकी पुनर्पुष्टि की गयी। परंतु शिक्षा में निवेश बढ़ाने की तत्परता कभी नहीं दिखाई पड़ी। अभी भी वास्तविक व्यय 2.9% के आसपास ही है।
सार्वजनिक निवेश में कमी के कारण कुपोषित, सिकुड़े और बिलबिलाते हुए सार्वजनिक संस्थाओं के बरक्स निजी खिलाड़ी विशाल भवन और परिसर वाले विद्यालयों-महाविद्यालयों को ‘इंटरनेशनल स्कूल’, ‘ग्लोबल स्कूल’, ‘वर्ल्ड क्लास इंस्टीटूशन’ आदि नामों से ब्रांडिंग करके न केवल शिक्षा का स्तरीकरण कर रहे हैं और न ही केवल अकूत धन कमा रहे हैं, बल्कि समतामूलक लोकतांत्रिक व्यवस्था की जड़ें भी खोद रहे हैं। सरकारें इनके पक्ष में खड़ी हैं नीतियों के पुलिंदे, कानून के संरक्षण और रुपयों के थैले के साथ।राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इन निजी मुनाफ़ाख़ोर संस्थाओं को भी ‘कल्याणकारी’ माना गया है और अंबानी के विश्वविद्यालय को बनाने के पहले ही हज़ारों करोड़ के आवंटन की घोषणा की गयी।
निजी विद्यालयों-महाविद्यालयों की ऊँची फीस, महँगी किताबें, उनके लिबास और रहन-सहन, बोल-चाल आदि ग़रीब और वंचित समुदायों को अपने पास आने से रोकते हैं और समाज में एक नवीन अभिजात्य वर्ग पैदा करते हैं, जो उनके दायरे के बाहर सभी को ‘अकुलीन’ बना देता है। भारत, जो सामाजिक असमानता की बेड़ियों में सदियों से जकड़ा रहा है, असमानता के एक नए खाँचे का सृजन कर रहा है, जिसका माध्यम शिक्षा है।
तो फिर क्या हो?
इस भँवर से बचने का संपूर्ण निदान तो यह होगा कि सारे निजी शैक्षिक संस्थानों का सार्वजनीकरण कर दिया जाए, वैसे ही, जैसे पहले निजी बैंकों, कोयला खदानों का सार्वजनीकरण कर दिया गया था। परंतु नई सरकार के चरित्र और नई शिक्षा नीति की अनुशंसाओं को देखते हुए ऐसा संभव नहीं प्रतीत होता है। अभी तो सार्वजनिक संस्थाओं के निजीकरण का दौर चल रहा है। निजी-सार्वजनिक निवेश के मिले-जुले भारतीय मॉडल में निजी निवेश का पलड़ा लगातार भारी होता जा रहा है। इसलिए राज्य सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करेगा, ऐसा मानने में दिक्कत है। फिर वह चाहे तो निम्नलिखित उपायों के सहारे सार्वजनिक शिक्षा को मजबूत किया जा सकता है –
1. बजट आबंटन में वृद्धि –
सार्वजनिक शिक्षा संस्थानों की मुख्य कमजोरी निवेश की कमी है। निजी क्षेत्र के विस्तार का मुख्य कारण सार्वजनिक प्रणाली की कमजोरी है। इसलिए विद्यालयों में शिक्षक, अवसंरचना, पुस्तकालय, ICT सुविधाएँ, खेल-संस्कृति – इन पर पर्याप्त बजट आवंटन आवश्यक है।इसके साथ ही अनौपचारिक, कॉन्ट्रैक्ट/अस्थायी शिक्षकों पर निर्भरता घटाकर नियमित, प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति की जानी चाहिए।
2. निजी संस्थानों का कठोर नियमन –
निजी शिक्षा संस्थानों के अनियंत्रित विस्तार को नियंत्रित करना राज्य का महत्वपूर्ण दायित्व है। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाये जाने आवश्यक हैं – (क) शुल्क नियंत्रण (Fee Regulation), (ख) प्रवेश प्रक्रिया की पारदर्शिता। “मैनेजमेंट कोटा”, “डोनेशन सीट” जैसे प्रावधानों पर निगरानी हो तथा प्रवेश, नामांकन, छात्रवृत्ति आदि नीति में ईमानदारी सुनिश्चित की जाये।(ग) निजी विश्वविद्यालयों की अकादमिक स्वतंत्रता व जवाबदेही होनी चाहिए। विश्वविद्यालयों द्वारा डिग्री की गुणवत्ता, अनुसंधान मानक, नियुक्तियों में पारदर्शिता पर निगरानी की जानी चाहिए।
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3. शिक्षा में मुनाफ़ाखोरी पर नैतिक व कानूनी रोक –
भारत में शिक्षा ग़ैर लाभकारी क्षेत्र माना गया है, पर अधिकांश निजी संस्थान अप्रत्यक्ष लाभ कमाते हैं। इसलिए राज्य को आवश्यक है कि शिक्षा को लाभ का साधन न बनने दे तथा ऑडिट, CSR का दुरुपयोग, जमीन आवंटन आदि में धांधलियों पर सख्ती करे।
4. सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना –
सरकारी तथा अनुदानित संस्थानों में आरक्षण, छात्रवृत्ति, छात्रावास, भोजन एवं पोषण में सहायता का अनुपालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए तथा लैंगिक,जातीय और आर्थिक असमानताओं को कम करने के लिए लक्षित कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए।ऑनलाइन शिक्षा की तेजी से बढ़ती बाज़ार-निर्भरता को देखते हुए मुफ्त/सस्ती इंटरनेट सेवा, मुफ्त डिजिटल उपकरण तथा ओपन-शैक्षणिक संसाधन (OER) उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
5. शिक्षा को “लोक कल्याण” के रूप में प्रचारित करना –
राज्य का दायित्व है कि शिक्षा को अधिकार, सार्वजनिक निवेश तथा राष्ट्र निर्माण के माध्यम के रूप में प्रस्तुत करे।
6. सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) पर संतुलित नियंत्रण –
PPP मॉडल का उपयोग सहायता और अवसंरचना के लिए किया जा सकता है, लेकिन शैक्षणिक कोर-फंक्शन, जैसे – पाठ्यक्रम, मूल्यांकन, शिक्षक नियंत्रण आदि – निजी हाथों में न जाने पाए।
7. शिक्षक-प्रशिक्षण और पाठ्यचर्या पर नियंत्रण –
बाजार की ताकतें अक्सर पाठ्यक्रम में “स्किल-उन्मुख”, “कॉर्पोरेट-उन्मुख” बदलाव डालने का दबाव बनाती हैं। इसलिए राज्य की जिम्मेदारी है कि पाठ्यचर्या वैज्ञानिक, मानवीय, लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित रहे तथा शिक्षक प्रशिक्षण का अवमूल्यन न हो, बल्कि समान न्यूनतम मानक लागू हों।
8. न्यायिक व उपभोक्ता संरक्षण तंत्र मजबूत करना –
अभिभावकों, छात्रों और शिक्षकों के लिए शिकायत निवारण व्यवस्था हो तथा धोखाधड़ी, भेदभाव, धमकी, फ़ीस शोषण जैसी शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई हो।
बाज़ारीकरण केवल शिक्षा प्रणाली का ढाँचागत परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह एक विस्तृत सामाजिक पुनर्गठन है। इससे न केवल वर्गीय असमानताएँ बढ़ती हैं, बल्कि शिक्षा की नैतिकता कमजोर होती है और लोकतंत्र के लिए आवश्यक ‘समान अवसर’ का सिद्धांत भी क्षतिग्रस्त होता है। नोम चॉम्स्की इसे ‘democratic decay through commercialisation’ कहते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि शिक्षा को बाज़ार की वस्तु नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में देखा जाए और राज्य अपनी भूमिका को पुनः मजबूत करे। भारतीय संदर्भ में शिक्षा के बाजारीकरण को रोकने में राज्य की जिम्मेदारी सिर्फ़ नियमन नहीं, बल्कि एक समग्र सामाजिक दायित्व है।
संदर्भ स्रोत :
- AISHE Reports (2018–2022). Ministry of Education, India.
- U-DISE+ Data (2020–2023).
- NITI Aayog. (2023). State of Education in India.
- Chomsky, N. (2017). Requiem for the American Dream.
- Illich, I. (1971). Deschooling Society.
- NEP 2020. Ministry of Education.
- Davis, Oven. (2013). 6 ways neoliberal education reform is destroying our college system

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।







सर,
पोर्टल पर प्रकाशित आपका अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक आलेख “शिक्षा : अधिकार से बाज़ार तक – नागरिक, कॉर्पोरेट और राज्य” मैंने बहुत ध्यान से पढ़ा। इस लेख ने न केवल शिक्षा के समकालीन संकट को समझने में मेरी दृष्टि को और स्पष्ट किया, बल्कि कई नए विचारों से मुझे वैचारिक रूप से समृद्ध भी किया।
चूँकि मैं स्वयं शिक्षा और समाज पर उसके प्रभाव को लेकर नियमित रूप से लिखता रहा हूँ, इसलिए यह आलेख मेरे लिए विशेष रूप से लाभप्रद और प्रेरक रहा। ऐसे गहन, तथ्यपरक और विचारोत्तेजक लेख के माध्यम से पाठकों को दिशा देने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद और साधुवाद।
यह लेख शिक्षा के संकट को किसी एक नीति, किसी एक सुधार या किसी एक सरकार की विफलता के रूप में नहीं देखता, बल्कि उसे राज्य–पूँजी–नागरिक संबंधों में घटित हुए एक गहरे वैचारिक पुनर्संयोजन के रूप में चिन्हित करता है। इसकी सबसे बड़ी वैचारिक शक्ति यही है कि यह शिक्षा के बाज़ारीकरण को सतही प्रशासनिक निर्णयों से ऊपर उठाकर उस ऐतिहासिक प्रक्रिया से जोड़ता है, जिसमें शिक्षा धीरे–धीरे सामाजिक संस्था और नागरिक अधिकार से खिसककर आर्थिक वस्तु और निवेश–उपकरण में बदल दी गई है। लेख यह स्पष्ट करता है कि यह परिवर्तन आकस्मिक नहीं, बल्कि सुनियोजित, दीर्घकालिक और संरचनात्मक है—जिसे ऐतिहासिक संदर्भ, सैद्धांतिक व्याख्या और अनुभवजन्य तथ्यों—तीनों के सहारे समझाया गया है।
नवउदारवाद, उपभोक्तावाद और सामाजिक असमानता—इन तीन स्तंभों पर आधारित विश्लेषण लेख को वैचारिक रूप से सुदृढ़ बनाता है। यह त्रिस्तरीय ढाँचा पाठक को यह समझने में सक्षम करता है कि शिक्षा का संकट किसी एक नीति दस्तावेज़ या किसी चुनावी सरकार की उपज नहीं, बल्कि पूँजीवादी पुनर्संरचना की एक दीर्घकालिक परियोजना है, जिसमें राज्य की भूमिका कल्याणकारी से प्रबंधकीय और अंततः सहायक की होती चली गई है। इस विभाजन के कारण लेख भावनात्मक आक्रोश से बचते हुए एक ठोस बौद्धिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आता है।
इवान इलिच, हायक, फ्रीडमैन और नोम चॉम्स्की जैसे विचारकों के संदर्भ लेख को केवल वैचारिक धार नहीं देते, बल्कि उसे अकादमिक विश्वसनीयता भी प्रदान करते हैं। ये संदर्भ यह स्पष्ट करते हैं कि लेखक किसी वैचारिक आग्रह से नहीं, बल्कि वैश्विक बौद्धिक विमर्श के भीतर खड़े होकर भारतीय यथार्थ का विश्लेषण कर रहा है। इसी कारण लेख आरोप-पत्र नहीं बनता, बल्कि संरचनात्मक आलोचना का रूप लेता है।
मानव-पूँजी निर्माण, राज्य की वित्तीय जिम्मेदारी का स्थानांतरण, मानकीकरण, ऋण-आधारित फंडिंग और कॉर्पोरेटीकरण—इन प्रक्रियाओं को लेखक ने नारेबाज़ी या नैतिक उपदेश की शैली में नहीं, बल्कि ठोस तर्क और संस्थागत विश्लेषण के साथ प्रस्तुत किया है। विशेष रूप से “स्वायत्तता = आत्मनिर्भरता = फ़ीस वृद्धि” का सूत्र भारतीय उच्च शिक्षा की मौजूदा वास्तविकता को असाधारण सटीकता के साथ पकड़ता है। यह वाक्य मात्र व्याख्या नहीं, बल्कि पूरे नवउदारवादी शिक्षा मॉडल का संक्षिप्त निदान बन जाता है।
छात्र का नागरिक से ग्राहक में रूपांतरण, डिग्री का पैकेज्ड उत्पाद बन जाना और शिक्षा संस्थानों का कंपनी की तरह व्यवहार करना—यह खंड शिक्षा के नैतिक और लोकतांत्रिक पतन को उजागर करता है। MacDonaldisation of Education जैसी अवधारणा यह स्पष्ट करती है कि किस प्रकार शिक्षा से संदर्भ, स्थानीयता, सांस्कृतिक जटिलता और बौद्धिक स्वतंत्रता को छीलकर एक मानकीकृत, तेज़-खपत योग्य उत्पाद में बदल दिया जा रहा है।
NEET, IIT और कोचिंग संस्कृति से जुड़े आँकड़े यह मिथक तोड़ते हैं कि ‘मेरिट’ एक तटस्थ और निष्पक्ष श्रेणी है। लेख प्रभावी ढंग से दिखाता है कि मेरिट अब सामाजिक–आर्थिक विशेषाधिकार का कोडवर्ड बन चुकी है। U-DISE+, AISHE, शिक्षा-ऋण और कोचिंग उद्योग के आँकड़े लेख को विचारधारात्मक आरोप से ऊपर उठाकर नीति–आधारित और तथ्य–समर्थित आलोचना में रूपांतरित कर देते हैं।
बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के उदाहरण यह प्रमाणित करते हैं कि शिक्षा में कटौती कोई अमूर्त आर्थिक नीति नहीं, बल्कि जीवित सामाजिक यथार्थ है—जो बच्चों के स्कूल छूटने, शिक्षकों पर मुकदमों और पूरे समुदायों के शैक्षिक भविष्य के अंधकारमय होने में प्रकट होता है। GDP के 6% निवेश की कोठारी आयोगीय अनुशंसा और वर्तमान 2.9% व्यय का तुलनात्मक संदर्भ राज्य की कथनी–करनी के गहरे अंतर को निर्विवाद रूप से उजागर करता है।
महत्वपूर्ण यह भी है कि लेखक निजीकरण के पूर्ण निषेध की वैचारिक संभावना स्वीकारते हुए भी यथार्थ की सीमाओं को पहचानता है। प्रस्तावित समाधान—बजट आबंटन में वृद्धि, निजी संस्थानों का कड़ा नियमन, शिक्षा में मुनाफ़ाखोरी पर रोक, सामाजिक न्याय की पुनर्स्थापना और PPP मॉडल पर संतुलित नियंत्रण—किसी क्रांतिकारी नारे की तरह नहीं, बल्कि राज्य की पुनर्वितरणकारी और लोकतांत्रिक भूमिका को पुनर्जीवित करने की व्यावहारिक रणनीति के रूप में सामने आते हैं।
समग्र रूप से यह लेख शिक्षा को बाज़ार की वस्तु मानने की वैचारिक स्वीकृति को चुनौती देता है और यह स्थापित करता है कि शिक्षा का प्रश्न मूलतः लोकतंत्र, समान अवसर और नागरिकता का प्रश्न है। यह लेख केवल समीक्षा नहीं, बल्कि एक वैचारिक हस्तक्षेप है—जो यह याद दिलाता है कि जब शिक्षा बाज़ार के हवाले होती है, तब केवल स्कूल और विश्वविद्यालय नहीं बदलते, बल्कि समाज का भविष्य भी निजी हाथों में गिरवी रख दिया जाता है।
पहली बार मैंने पाउलो फ़्रेरे के बारे में केदारनाथ श्रम एवं समाज अध्ययन संस्थान द्वारा आयोजित एक सेमिनार में सुना था। विषय था—उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र (Pedagogy of the Oppressed)। सेमिनार के बाद मैंने इस किताब को भी पढ़ा लेकिन साफ साफ कहूं तो उस समय उनकी बातों से मैं पूरी तरह सहमत नहीं हो सका
मैं समझता था कि शिक्षा का काम हीं यह बताना होता है कि शोषण क्या है और कौन कर रहा है। मुझे लगता था कि शिक्षा अपने आप में निष्पक्ष होती है, जबकि फ़्रेरे का यह कहना कि—
“शिक्षा कभी तटस्थ नहीं होती; या तो वह उत्पीड़न को मज़बूत करती है या उत्पीड़ितों को मुक्त करती है”
उस समय मुझे ज़्यादा सैद्धांतिक और कुछ हद तक अतिशयोक्तिपूर्ण लगता था।
लेकिन आज, जब मैं देखता हूँ और आपके इस लेख को पढ़ रहा हूं तो फ़्रेरे की बात साफ साफ समझ में आ रहा है है कि शिक्षा का सिर्फ़ सिलेबस नहीं होता—उसका अपना चरित्र होता है। और यह चरित्र किसी नैतिक आदर्श से नहीं, बल्कि राजनीति और सत्ता-संबंधों से तय होता है।
आज तथाकथित पढ़े-लिखे लोग शिक्षा में बदलाव के नाम पर
निजीकरण, रैंकिंग सिस्टम,फाइव-स्टार और फोर-स्टार सुविधाओं वाले स्कूल-कॉलेज की बातें करते हैं—और इसी को शिक्षा मान लेते हैं।
लेकिन वे कभी यह सवाल नहीं उठाते कि शिक्षा क्यों दी जा रही है, किसके लिए दी जा रही है,और किसके हित में काम कर रही है।
आज शिक्षा व्यवस्था,शिक्षण सामग्री,पाठ्यक्रमऔर मूल्यांकन सब कुछ बाज़ार की ज़रूरतों के अधीन है। शिक्षक अब शिक्षाविद नहीं, बल्कि एक तरह से सेल्स एग्ज़ीक्यूटिव बनते जा रहे है, जिसका लक्ष्य छात्र की समझ विकसित करना नहीं, बल्कि ऐसे तैयार करना है जिन्हें पैकेज करके बेचा जा सके।
हमने बार-बार देखा है कि कोचिंग संस्थानों में पढ़ने वाले या यों कहें NEET और JEE की तैयारी करने वाले छात्र/ छात्रा किताब और मॉड्यूल में फर्क नहीं कर पाते, इलेक्ट्रिक और इलेक्ट्रॉनिक जैसे भौतिकी के शब्दों के अंदर को नहीं बता पाते स्क्रु गेज का इस्तेमाल नहीं आता लेकिन उसी अध्याय के अंकित प्रश्न बेहद आसानी से हल कर लेते हैं
यह संयोग नहीं है। उन्हें इसी तरह ट्रेंड किया जा रहा है मैं “पढ़ाई” की जगह जानबूझकर “ट्रेनिंग” शब्द का इस्तेमाल करता हूँ। क्योंकि वह वेल ट्रेंड लेवर बनने के लिए हीं तैयार किया गया है।
ट्रेनिंग और पढ़ाई में यही बुनियादी अंतर है—
ट्रेनिंग बाज़ार के लिए उत्पाद तैयार करती है, और पढ़ाई समाज के लिए चेतन नागरिक।
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पढ़ाई नहीं, उत्पाद तैयार करती है ।
आपका यह लेख सच में इस बात को साफ साफ और विस्तार से बता रहा है और यह काफी चिंता जनक स्थिति है
हाँ, पर मेरी एक आपत्ति है
आप के लेख से लगता है कि आप राज्य को “असफल” या “कमज़ोर” बता रहे हैं, लेकिन मेरी समझ यह है कि यह कोई प्रशासनिक विफलता नहीं है। राज्य द्वारा जानबूझकर, सोची समझी नीति हैं, ताकि उपयुक्त मानव-संसाधन, यानी सस्ता, आज्ञाकारी और सवाल न करने वाला कच्चा माल उपलब्ध हो सके।
यह राज्य की मजबूरी नहीं, राज्य का वर्गीय चुनाव है।
और शायद यही बात फ़्रेरे अपने लेख में कहना चाह रहे थे
सर यहआलेख तथ्यों पर आधारित है। बहुत बढ़िया है, शिक्षा के बाजारीकरण उपभोक्तावादी संस्कृति के साथ लोगों के सोचने के तरीकों मे भी बदलाव कर रहा है स्वतंत्र एवं वैज्ञानिक सोच की दृष्टि समाप्त हो रही है और संस्थागत रीति रिवाज, प्रचलित प्रतिमान,परम्परागत और अवैज्ञानिकता समाहित किया जा रहा है जो न्यायपूर्ण एवं समतामूलक समाज की स्थापना में बहुत बड़ा बाधक हो रहा है
बढ़िया और सारगर्भित आलेख। कई नई जानकारी मिली।।आप से।ऐसे ही आलेखों की उम्मीद करता हूं।।