शिक्षा : अधिकार से बाजार तक – नागरिक, कॉर्पोरेट और राज्य

शिक्षा, जो ऐतिहासिक रूप से सामाजिक पुनरुत्पादन और नागरिक चेतना के निर्माण का माध्यम रही है, नवउदारवादी पूँजीवाद के चरण में एक ऐसी वस्तु में रूपांतरित की जा रही है जिसे बाज़ार में खरीदा–बेचा जा सकता है। राज्य, जो शिक्षा के माध्यम से सामाजिक समानता और पुनर्वितरणकारी न्याय की भूमिका निभाने वाला कारक था, अब पूँजी के हितों के अनुरूप अपनी जिम्मेदारियों का स्थानांतरण कर रहा है। इस प्रक्रिया में नागरिक श्रम–शक्ति के वाहक और ऋणग्रस्त उपभोक्ता में बदलता जा रहा है, जबकि कॉर्पोरेट शिक्षा के क्षेत्र में मूल्य–अधिशेष के नए स्रोत के रूप में स्थापित हो रहा है।
  • AISHE Reports (2018–2022). Ministry of Education, India.
  • U-DISE+ Data (2020–2023).
  • NITI Aayog. (2023). State of Education in India.
  • Chomsky, N. (2017). Requiem for the American Dream.
  • Illich, I. (1971). Deschooling Society.
  • NEP 2020. Ministry of Education.
  • Davis, Oven. (2013). 6 ways neoliberal education reform is destroying our college system
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कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

Dr. Anil Kumar Roy
Dr. Anil Kumar Roy

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

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5 Comments

  1. सर,
    पोर्टल पर प्रकाशित आपका अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक आलेख “शिक्षा : अधिकार से बाज़ार तक – नागरिक, कॉर्पोरेट और राज्य” मैंने बहुत ध्यान से पढ़ा। इस लेख ने न केवल शिक्षा के समकालीन संकट को समझने में मेरी दृष्टि को और स्पष्ट किया, बल्कि कई नए विचारों से मुझे वैचारिक रूप से समृद्ध भी किया।

    चूँकि मैं स्वयं शिक्षा और समाज पर उसके प्रभाव को लेकर नियमित रूप से लिखता रहा हूँ, इसलिए यह आलेख मेरे लिए विशेष रूप से लाभप्रद और प्रेरक रहा। ऐसे गहन, तथ्यपरक और विचारोत्तेजक लेख के माध्यम से पाठकों को दिशा देने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद और साधुवाद।

  2. यह लेख शिक्षा के संकट को किसी एक नीति, किसी एक सुधार या किसी एक सरकार की विफलता के रूप में नहीं देखता, बल्कि उसे राज्य–पूँजी–नागरिक संबंधों में घटित हुए एक गहरे वैचारिक पुनर्संयोजन के रूप में चिन्हित करता है। इसकी सबसे बड़ी वैचारिक शक्ति यही है कि यह शिक्षा के बाज़ारीकरण को सतही प्रशासनिक निर्णयों से ऊपर उठाकर उस ऐतिहासिक प्रक्रिया से जोड़ता है, जिसमें शिक्षा धीरे–धीरे सामाजिक संस्था और नागरिक अधिकार से खिसककर आर्थिक वस्तु और निवेश–उपकरण में बदल दी गई है। लेख यह स्पष्ट करता है कि यह परिवर्तन आकस्मिक नहीं, बल्कि सुनियोजित, दीर्घकालिक और संरचनात्मक है—जिसे ऐतिहासिक संदर्भ, सैद्धांतिक व्याख्या और अनुभवजन्य तथ्यों—तीनों के सहारे समझाया गया है।

    नवउदारवाद, उपभोक्तावाद और सामाजिक असमानता—इन तीन स्तंभों पर आधारित विश्लेषण लेख को वैचारिक रूप से सुदृढ़ बनाता है। यह त्रिस्तरीय ढाँचा पाठक को यह समझने में सक्षम करता है कि शिक्षा का संकट किसी एक नीति दस्तावेज़ या किसी चुनावी सरकार की उपज नहीं, बल्कि पूँजीवादी पुनर्संरचना की एक दीर्घकालिक परियोजना है, जिसमें राज्य की भूमिका कल्याणकारी से प्रबंधकीय और अंततः सहायक की होती चली गई है। इस विभाजन के कारण लेख भावनात्मक आक्रोश से बचते हुए एक ठोस बौद्धिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आता है।

    इवान इलिच, हायक, फ्रीडमैन और नोम चॉम्स्की जैसे विचारकों के संदर्भ लेख को केवल वैचारिक धार नहीं देते, बल्कि उसे अकादमिक विश्वसनीयता भी प्रदान करते हैं। ये संदर्भ यह स्पष्ट करते हैं कि लेखक किसी वैचारिक आग्रह से नहीं, बल्कि वैश्विक बौद्धिक विमर्श के भीतर खड़े होकर भारतीय यथार्थ का विश्लेषण कर रहा है। इसी कारण लेख आरोप-पत्र नहीं बनता, बल्कि संरचनात्मक आलोचना का रूप लेता है।

    मानव-पूँजी निर्माण, राज्य की वित्तीय जिम्मेदारी का स्थानांतरण, मानकीकरण, ऋण-आधारित फंडिंग और कॉर्पोरेटीकरण—इन प्रक्रियाओं को लेखक ने नारेबाज़ी या नैतिक उपदेश की शैली में नहीं, बल्कि ठोस तर्क और संस्थागत विश्लेषण के साथ प्रस्तुत किया है। विशेष रूप से “स्वायत्तता = आत्मनिर्भरता = फ़ीस वृद्धि” का सूत्र भारतीय उच्च शिक्षा की मौजूदा वास्तविकता को असाधारण सटीकता के साथ पकड़ता है। यह वाक्य मात्र व्याख्या नहीं, बल्कि पूरे नवउदारवादी शिक्षा मॉडल का संक्षिप्त निदान बन जाता है।

    छात्र का नागरिक से ग्राहक में रूपांतरण, डिग्री का पैकेज्ड उत्पाद बन जाना और शिक्षा संस्थानों का कंपनी की तरह व्यवहार करना—यह खंड शिक्षा के नैतिक और लोकतांत्रिक पतन को उजागर करता है। MacDonaldisation of Education जैसी अवधारणा यह स्पष्ट करती है कि किस प्रकार शिक्षा से संदर्भ, स्थानीयता, सांस्कृतिक जटिलता और बौद्धिक स्वतंत्रता को छीलकर एक मानकीकृत, तेज़-खपत योग्य उत्पाद में बदल दिया जा रहा है।

    NEET, IIT और कोचिंग संस्कृति से जुड़े आँकड़े यह मिथक तोड़ते हैं कि ‘मेरिट’ एक तटस्थ और निष्पक्ष श्रेणी है। लेख प्रभावी ढंग से दिखाता है कि मेरिट अब सामाजिक–आर्थिक विशेषाधिकार का कोडवर्ड बन चुकी है। U-DISE+, AISHE, शिक्षा-ऋण और कोचिंग उद्योग के आँकड़े लेख को विचारधारात्मक आरोप से ऊपर उठाकर नीति–आधारित और तथ्य–समर्थित आलोचना में रूपांतरित कर देते हैं।

    बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के उदाहरण यह प्रमाणित करते हैं कि शिक्षा में कटौती कोई अमूर्त आर्थिक नीति नहीं, बल्कि जीवित सामाजिक यथार्थ है—जो बच्चों के स्कूल छूटने, शिक्षकों पर मुकदमों और पूरे समुदायों के शैक्षिक भविष्य के अंधकारमय होने में प्रकट होता है। GDP के 6% निवेश की कोठारी आयोगीय अनुशंसा और वर्तमान 2.9% व्यय का तुलनात्मक संदर्भ राज्य की कथनी–करनी के गहरे अंतर को निर्विवाद रूप से उजागर करता है।

    महत्वपूर्ण यह भी है कि लेखक निजीकरण के पूर्ण निषेध की वैचारिक संभावना स्वीकारते हुए भी यथार्थ की सीमाओं को पहचानता है। प्रस्तावित समाधान—बजट आबंटन में वृद्धि, निजी संस्थानों का कड़ा नियमन, शिक्षा में मुनाफ़ाखोरी पर रोक, सामाजिक न्याय की पुनर्स्थापना और PPP मॉडल पर संतुलित नियंत्रण—किसी क्रांतिकारी नारे की तरह नहीं, बल्कि राज्य की पुनर्वितरणकारी और लोकतांत्रिक भूमिका को पुनर्जीवित करने की व्यावहारिक रणनीति के रूप में सामने आते हैं।

    समग्र रूप से यह लेख शिक्षा को बाज़ार की वस्तु मानने की वैचारिक स्वीकृति को चुनौती देता है और यह स्थापित करता है कि शिक्षा का प्रश्न मूलतः लोकतंत्र, समान अवसर और नागरिकता का प्रश्न है। यह लेख केवल समीक्षा नहीं, बल्कि एक वैचारिक हस्तक्षेप है—जो यह याद दिलाता है कि जब शिक्षा बाज़ार के हवाले होती है, तब केवल स्कूल और विश्वविद्यालय नहीं बदलते, बल्कि समाज का भविष्य भी निजी हाथों में गिरवी रख दिया जाता है।

  3. पहली बार मैंने पाउलो फ़्रेरे के बारे में केदारनाथ श्रम एवं समाज अध्ययन संस्थान द्वारा आयोजित एक सेमिनार में सुना था। विषय था—उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र (Pedagogy of the Oppressed)। सेमिनार के बाद मैंने इस किताब को भी पढ़ा लेकिन साफ साफ कहूं तो उस समय उनकी बातों से मैं पूरी तरह सहमत नहीं हो सका
    मैं समझता था कि शिक्षा का काम हीं यह बताना होता है कि शोषण क्या है और कौन कर रहा है। मुझे लगता था कि शिक्षा अपने आप में निष्पक्ष होती है, जबकि फ़्रेरे का यह कहना कि—
    “शिक्षा कभी तटस्थ नहीं होती; या तो वह उत्पीड़न को मज़बूत करती है या उत्पीड़ितों को मुक्त करती है”
    उस समय मुझे ज़्यादा सैद्धांतिक और कुछ हद तक अतिशयोक्तिपूर्ण लगता था।
    लेकिन आज, जब मैं देखता हूँ और आपके इस लेख को पढ़ रहा हूं तो फ़्रेरे की बात साफ साफ समझ में आ रहा है है कि शिक्षा का सिर्फ़ सिलेबस नहीं होता—उसका अपना चरित्र होता है। और यह चरित्र किसी नैतिक आदर्श से नहीं, बल्कि राजनीति और सत्ता-संबंधों से तय होता है।
    आज तथाकथित पढ़े-लिखे लोग शिक्षा में बदलाव के नाम पर
    निजीकरण, रैंकिंग सिस्टम,फाइव-स्टार और फोर-स्टार सुविधाओं वाले स्कूल-कॉलेज की बातें करते हैं—और इसी को शिक्षा मान लेते हैं।
    लेकिन वे कभी यह सवाल नहीं उठाते कि शिक्षा क्यों दी जा रही है, किसके लिए दी जा रही है,और किसके हित में काम कर रही है।
    आज शिक्षा व्यवस्था,शिक्षण सामग्री,पाठ्यक्रमऔर मूल्यांकन सब कुछ बाज़ार की ज़रूरतों के अधीन है। शिक्षक अब शिक्षाविद नहीं, बल्कि एक तरह से सेल्स एग्ज़ीक्यूटिव बनते जा रहे है, जिसका लक्ष्य छात्र की समझ विकसित करना नहीं, बल्कि ऐसे तैयार करना है जिन्हें पैकेज करके बेचा जा सके।
    हमने बार-बार देखा है कि कोचिंग संस्थानों में पढ़ने वाले या यों कहें NEET और JEE की तैयारी करने वाले छात्र‌/ छात्रा किताब और मॉड्यूल में फर्क नहीं कर पाते, इलेक्ट्रिक और इलेक्ट्रॉनिक जैसे भौतिकी के शब्दों के अंदर को नहीं बता पाते स्क्रु गेज का इस्तेमाल नहीं आता लेकिन उसी अध्याय के अंकित प्रश्न बेहद आसानी से हल कर लेते हैं
    यह संयोग नहीं है। उन्हें इसी तरह ट्रेंड किया जा रहा है मैं “पढ़ाई” की जगह जानबूझकर “ट्रेनिंग” शब्द का इस्तेमाल करता हूँ। क्योंकि वह वेल ट्रेंड लेवर बनने के लिए हीं तैयार किया गया है।

    ट्रेनिंग और पढ़ाई में यही बुनियादी अंतर है—
    ट्रेनिंग बाज़ार के लिए उत्पाद तैयार करती है, और पढ़ाई समाज के लिए चेतन नागरिक।
    वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पढ़ाई नहीं, उत्पाद तैयार करती है ।
    आपका यह लेख सच में इस बात को साफ साफ और विस्तार से बता रहा है और यह काफी चिंता जनक स्थिति है
    हाँ, पर मेरी एक आपत्ति है
    आप के लेख से लगता है कि आप राज्य को “असफल” या “कमज़ोर” बता रहे हैं, लेकिन मेरी समझ यह है कि यह कोई प्रशासनिक विफलता नहीं है। राज्य द्वारा जानबूझकर, सोची समझी नीति हैं, ताकि उपयुक्त मानव-संसाधन, यानी सस्ता, आज्ञाकारी और सवाल न करने वाला कच्चा माल उपलब्ध हो सके।
    यह राज्य की मजबूरी नहीं, राज्य का वर्गीय चुनाव है।
    और शायद यही बात फ़्रेरे अपने लेख में कहना चाह रहे थे

  4. सर यहआलेख तथ्यों पर आधारित है। बहुत बढ़िया है, शिक्षा के बाजारीकरण उपभोक्तावादी संस्कृति के साथ लोगों के सोचने के तरीकों मे भी बदलाव कर रहा है स्वतंत्र एवं वैज्ञानिक सोच की दृष्टि समाप्त हो रही है और संस्थागत रीति रिवाज, प्रचलित प्रतिमान,परम्परागत और अवैज्ञानिकता समाहित किया जा रहा है जो न्यायपूर्ण एवं समतामूलक समाज की स्थापना में बहुत बड़ा बाधक हो रहा है

  5. बढ़िया और सारगर्भित आलेख। कई नई जानकारी मिली।।आप से।ऐसे ही आलेखों की उम्मीद करता हूं।।

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