किसी भी राज्य की वैचारिक सेहत का सबसे भरोसेमंद पैमाना यह होता है कि वह अपने शिक्षकों को किस निगाह से देखता है। शिक्षक सिर्फ एक कर्मचारी नहीं होता, वह वह संस्था होता है जिस पर राज्य का भविष्य टिका होता है। लेकिन बिहार सरकार का हालिया आदेश—जिसमें आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों को नोडल अधिकारी बनाकर सर्वे, निगरानी, रिपोर्टिंग और समन्वय की जिम्मेदारी सौंपी गई है—यह स्पष्ट कर देता है कि राज्य में समस्या केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि गहराई से जड़ जमाई हुई वैचारिक बीमारी की है।

यह आदेश शिक्षा नीति नहीं, शिक्षा के प्रति सरकार की मानसिकता का आईना है। यह पहला मौका नहीं है और शायद अंतिम भी नहीं।
बिहार में शिक्षक को कक्षा से बाहर निकालने की एक स्थायी परंपरा बन चुकी है। कभी जनगणना के नाम पर, कभी चुनाव ड्यूटी में, कभी बीएलओ बनाकर, कभी शराबबंदी और स्वच्छता अभियान में, कभी आपदा सर्वे में—और अब कुत्तों की गिनती, नसबंदी और टीकाकरण की निगरानी में। हर बार तर्क एक ही दिया जाता है—“काम ज़रूरी है”। लेकिन सवाल यह है कि क्या बच्चों की पढ़ाई ज़रूरी नहीं?
क्या शिक्षा हमेशा स्थगित की जा सकने वाली गतिविधि है?
यह आदेश यह मानने से इनकार करता है कि शिक्षक एक प्रशिक्षित पेशेवर है।
यह भी की शिक्षक का मूल कार्य पढ़ाना है और यह भी कि शिक्षक को बार-बार कक्षा से बाहर करना सीधे-सीधे संविधान के अनुच्छेद 21A—निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के मौलिक अधिकार—का उल्लंघन है।
यहीं भारतीय परंपरा और सरकारी सोच का टकराव सबसे साफ दिखाई देता है। कबीरदास ने गुरु को जो स्थान दिया, वह केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक घोषणा थी—
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥”
कबीर के लिए गुरु वह था जो अज्ञान से मुक्ति दिलाता है। लेकिन आज वही गुरु—वही शिक्षक—सरकारी आदेश के तहत कक्षा छोड़कर कुत्तों की गिनती करता दिखाई देता है। यह केवल विडंबना नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना का अपमान है, जिसने सदियों तक शिक्षा को समाज का केंद्र माना।
सरकार की सोच अब किसी पर्दे में नहीं है। वह हर आदेश में साफ झलकती है—
शिक्षक हर काम के लिए उपलब्ध है, क्योंकि वह सबसे कम सवाल करता है, और उससे सबसे अधिक सहने की उम्मीद की जाती है।
जब सरकार शिक्षक को डॉग शेल्टर, नसबंदी अभियान और एंटी-रेबीज टीकाकरण की निगरानी में लगाती है, तो वह यह साफ संदेश देती है कि उसकी नजर में शिक्षक राष्ट्र-निर्माता नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलताओं को ढोने वाला सर्व-उपयोगी संसाधन है। यह वैसा ही है जैसे डॉक्टर को ऑपरेशन छोड़कर एंबुलेंस गिनने भेज दिया जाए और फिर स्वास्थ्य व्यवस्था के सुधार पर लंबा भाषण दिया जाए।
यह आदेश उस मानसिकता की घोषणा है— कि पढ़ाई अर्थात् बच्चों का भविष्य इंतज़ार कर सकता है, लेकिन सरकारी अभियानों और फाइलों में कोई देरी बर्दाश्त नहीं।
अब बात ज़मीनी सच्चाई की, बिहार के अधिकांश प्राथमिक विद्यालय पहले से ही शिक्षक-संकट, बहु-कक्षा शिक्षण और गिरते शैक्षणिक स्तर से जूझ रहे हैं। अभी भी न पर्याप्त शिक्षक हैं और न ही विषयवार। ऐसे में सरकार का हर नया आदेश यह मानकर चलता है कि शिक्षक के पास समय भी अनंत है और सहनशीलता भी असीम। यह नीति नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुविधा और वैचारिक आलस्य है।
सबसे गंभीर सवाल यह नहीं है कि शिक्षक कुत्तों की गिनती क्यों कर रहा है।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या सरकार ने यह मान लिया है कि बच्चों की पढ़ाई रुक जाना कोई संकट नहीं?
क्योंकि हर आदेश में यह सवाल गायब है— जब शिक्षक फील्ड में होगा, तो कक्षा कौन चलाएगा? क्या पढ़ाई सिर्फ टाइमटेबल की औपचारिकता है?
यह चुप्पी बताती है कि शिक्षा सरकार की प्राथमिकताओं की सूची में बहुत नीचे खिसक चुकी है। और, जब शिक्षा नीचे जाती है, तो पूरा समाज नीचे जाता है।
यह शिक्षक का नहीं, बच्चों के भविष्य का अपमान है। यह शिक्षा का नहीं, संविधान का अपमान है। और, यह किसी एक आदेश की नहीं, बल्कि बिहार सरकार की वैचारिक बीमारी का लक्षण है।
जिस राज्य में कबीर के गुरु को सबसे सस्ता, सबसे आज्ञाकारी और सबसे उपेक्षित संसाधन मान लिया जाए, वहाँ विकास के सारे दावे खोखले हो जाते हैं। वहाँ न कुत्तों की समस्या स्थायी रूप से सुलझती है, न शिक्षा मज़बूत होती है—बस आदेश बढ़ते जाते हैं और भविष्य सिकुड़ता जाता है और जब इतिहास यह सवाल करेगा कि बिहार की शिक्षा क्यों पिछड़ी, तो जवाब किसी एक शिक्षक में नहीं मिलेगा,
बल्कि इन्हीं आदेशों, इन्हीं प्राथमिकताओं और इसी सोच में मिलेगा।

शिक्षक, भौतिक बिज्ञान
कोषाध्यक्ष, बिहार राज्य समिति, एटक







जब सत्ता पर नालायक आसीन हो जाएँ तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है।