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इन दिनों : माथे पर मुरैठा और दिमाग में नफ़रत की नदी

आज डॉ० अम्बेडकर का परिनिर्वाण दिवस है और बाबरी मस्जिद को ढाहने का दिवस भी। अम्बेडकर परिनिर्वाण दिवस के दिन बाबरी मस्जिद को ढाहने वाले आज भी झुग्गी-झोपड़ियों को ढाहते चले जा रहे हैं।

इन दिनों : सैंया भए कोतवाल

सुबह सूरज ठीक से उगा नहीं। सूरज पर कटे-कटे बादल छाये रहे। ठंड के कारण खिड़कियां बंद रहती हैं, इसलिए चिड़िया के स्वर सुनाई नहीं पड़े। खिड़कियों में लगे शीशे के बाहर सबकुछ शांत लगता है। आम, नारियल और महुगनी…

इन दिनों : गिद्ध और मांस की पोटली की आधुनिक कथा

हमाम में नंगे लोग अगर सबको कपड़े पहनने का आह्वान करे तो उसकी बात कोई क्यों मानेगा? जिसके हाथ अपराधियों को टिकट देने से नहीं कांपे और हत्यारोपी विधायक बनाता रहे, उसके राज में अपराध खत्म कैसे होगा?

इन दिनों : मुख्यमंत्री का कारुणिक अवसान बहुत कुछ कहता है

"आज भी नीतीश कुमार के अंदर इच्छाएं जोर मारती हैं, लेकिन शरीर उस काबिल नहीं रहा। चेतना भी दूर होती जा रही है। अपने स्वार्थ के लिए कुछ लोग अपना कंधा लगाये हुए हैं। सम्मान सहित कुर्सी से उतरना ज्यादा सारगर्भित होता, धक्के मार कर कुर्सी से हटाना बहुत बुरा होगा।" - इसी आलेख से

इन दिनों : ताड़ खड़खड़ाते हैं केवल, चील गीध ही गाते

"डॉ लोहिया ने कहा था कि पांच सालों तक जिंदा कौमें इंतजार नहीं करतीं। सच पूछिए तो जिंदा कौमें की एक शमां तो बननी चाहिए।" - इसी लेख से

इन दिनों : नेताओं का धर्म – अपराध और जाति का संरक्षण

'लोकजीवन' के 'इन दिनों' कॉलम में प्रो० योगेंद्र बिहार की राजनीति में अपराध और जाति के राजनीतिक संयोजन की चर्चा कर रहे हैं।

इन दिनों : प्रधानमंत्री का कट्टा प्रेम और बिहार का दुखड़ा

कल भागलपुर में पुराने साथियों की बैठक हुई। संदर्भ बिहार का चुनाव था। पुराने साथियों का जिक्र इसलिए किया, क्योंकि किसी का संबंध जेपी आंदोलन से था, किसी का झुग्गी झोपड़ी आंदोलन से तो किसी का गंगा मुक्ति आंदोलन से।…

राजनीतिक एवं सामाजिक उपेक्षा और उद्देश्यविहीन प्रशासनिक कवायदों के बीच मूल्य खोती बिहार की विद्यालयी शिक्षा के सवाल

देश की विविधता पूर्ण स्वतंत्र वैचारिक चेतना पर नियंत्रण के उद्देश्य से राजनीतिक नियामक समूह विकासोन्मुख नीतियों के नाम पर विद्यालयों में एक ऐसा शैक्षणिक ढाँचा तैयार करने जा रहा है, जो “राष्ट्रीय एकता” के नाम पर विविधता और आलोचनात्मक चेतना को दबा रहा है। - इसी आलेख से

‘शुद्ध’ मतदाता सूची की अशुद्धता

क्या बिहार में मतदाता सूची वास्तव में 'शुद्ध' हो गई है?इस आलेख में, जमीनी स्तर के प्रमाणों के साथ एसआईआर की अंतिम सूची, जिसे 'शुद्ध' कहा गया है, का विश्लेषण प्रस्तुत है।

बिहार का पलायन : एक बड़ा चुनावी सवाल

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 ऐसे समय पर हो रहे हैं जब युवाओं का पलायन राज्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। लाखों लोग रोज़गार और बेहतर अवसर की तलाश में बाहर जा चुके हैं, जिससे गांव और कस्बे खाली होते जा रहे हैं। यह चुनाव इस सवाल का सामना करेगा कि क्या राजनीति अब सच में रोजगार और विकास को केंद्र में रखेगी, या फिर बिहार एक बार फिर पीछे छूट जाएगा।