
"इस संगीन अपराधकर्म में न्यायपालिका भी है, विधायिका भी और कार्यपालिका भी। तीनों पर से वस्त्र उतर रहे हैं। बिल्किस बानो का केस याद होगा। निचली अदालत अपराधियों की सजा माफ करता है। अपराधी जेल से निकलता है तो ध्वजधारी पार्टी के लोग माला लेकर उसके स्वागत में नारे लगाते हैं। यह कौन समाज है भाई!" - इसी आलेख से

"दरअसल सरकार समझने में असमर्थ है कि राज्य के विकास में काम चाहिए। भ्रष्टाचार मुक्त सरकारी दफ्तर चाहिए। सम्मान से जीने के संसाधन चाहिए। पेट को अन्न चाहिए।" - इसी आलेख से

"झोपड़ियाँ इसलिए नहीं उगतीं कि लोग क़ानून तोड़ने का आनंद लेते हैं, बल्कि इसलिए कि शहर रोज़गार तो देता है, रहने की जगह नहीं। गाँवों से मजबूरी में हुआ पलायन, असंगठित श्रम, न्यूनतम मज़दूरी और महँगा शहरी आवास—ये सब मिलकर झोपड़ी को अपराध नहीं, बल्कि विकल्पहीनता का परिणाम बना देते हैं।" - इसी आलेख से।

"जिसे कोई काम न मिला, वह देश चला रहा है। घर भर रहा है। जिसे काम मिला, वह मजे कर रहा है। शहर-दर-शहर में अपार्टमेंट पीट रहा है।" - इसी आलेख से

"संसद में भी काँव-काँव हो रहा है। मैं अपने गाँव में देखता था कि दो औरतों ने लड़ाई की शुरूआत की, फिर उनके साथ अन्य औरतें झींका देने आ गई। खूब लड़ाई हुई। गर्जन भी और गालियाँ भी। सभी को मालूम है कि नतीजा कुछ नहीं आयेगा। संसद की हालत गाँव की गली से बदतर है।" - इसी आलेख से

संसद अब सवाल और जवाब नहीं, आरोप और प्रत्यारोप की जगह हो गयी है। राष्ट्र के अस्तित्व और लोकतंत्र की बुनियाद के जरूरी प्रश्न भी भद्दी बहसों में खो जाती है।

आज डॉ० अम्बेडकर का परिनिर्वाण दिवस है और बाबरी मस्जिद को ढाहने का दिवस भी। अम्बेडकर परिनिर्वाण दिवस के दिन बाबरी मस्जिद को ढाहने वाले आज भी झुग्गी-झोपड़ियों को ढाहते चले जा रहे हैं।

जीविका दीदियाँ मछली पालन करेंगी, इसके लिए तालाब बनवाया गया। तालाब में पानी नहीं था तो मुख्यमंत्री के आने के दिन उसमें बोरिंग से पानी भरा गया। मुख्यमंत्री वही तालाब जीविका दीदियों को समर्पित करके चले गए।

"देश भौंचक है। सरकार क्या केवल अपना एजेंडा चलायेगी और विपक्ष को ही सिरफिरा साबित करेगी। दुर्भाग्य यह है कि विपक्ष की मांग को प्रधानमंत्री ड्रामा कह रहे हैं।" - इसी आलेख से

सड़कों के किनारे बसे हुए लोग केवल झुग्गी-झोपड़ियाँ ही नहीं खड़ी करते, बल्कि अपने लिए रोज़ी-रोजगार भी खड़े करते हैं। जब सरकार शहर की सफाई के नाम पर झोपड़ियों को उजाड़ती है तो केवल झोपड़ी नहीं उजड़ती है, बल्कि उन ग़रीबों का रोज़गार भी उजड़ता है।