मानव सभ्यता की कहानी तकनीक के बिना न तो पूरी होती है और न ही समझी जा सकती है। जैसे ही मानव ने अपने चारों ओर फैले प्राकृतिक संसार को समझना और उस पर नियंत्रण स्थापित करना शुरू किया, तकनीक ने जन्म लिया। आग का आविष्कार, पत्थर के औजार, चक्के की खोज और कृषि उपकरणों का विकास—ये सभी केवल सुविधाजनक साधन नहीं थे, बल्कि उन्होंने मानव समाज की संरचना, उत्पादन पद्धति और आपसी संबंधों को मौलिक रूप से बदल दिया।
तकनीक ने मानव को प्रकृति के सामने असहाय प्राणी से एक संगठित, सृजनशील और निर्णायक शक्ति में बदल दिया। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि तकनीक कभी तटस्थ नहीं रही। हर तकनीकी बदलाव ने सत्ता, संसाधनों और श्रम के रिश्तों को पुनर्परिभाषित किया है। आज, जब हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और कृत्रिम सामान्य बुद्धिमत्ता (AGI) के युग में प्रवेश कर चुके हैं, तो यह प्रश्न पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है—क्या यह तकनीकी विकास मानवता के लिए समान रूप से लाभकारी है, या यह असमानता, नियंत्रण और वर्चस्व को और गहरा करेगा?
मानव इतिहास में तकनीक का विकास हमेशा सामाजिक परिवर्तन से जुड़ा रहा है। प्रारंभिक युग में पत्थर के औजारों और आग ने मानव को भोजन, सुरक्षा और सामूहिक जीवन का आधार दिया। इन साधनों ने मानव को शिकारी से आगे बढ़कर संगठित समाज की ओर अग्रसर किया।
कृषि क्रांति ने तकनीक और समाज के रिश्ते को और गहराई दी। हल, सिंचाई और अनाज भंडारण ने स्थायी बस्तियों को जन्म दिया। लेकिन इसी के साथ भूमि, उत्पादन और संसाधनों पर नियंत्रण के सवाल भी उभरे। समाज में वर्गीय विभाजन की नींव यहीं से और मजबूत हुई।
औद्योगिक क्रांति ने तकनीक को अभूतपूर्व गति और शक्ति प्रदान की। मशीनों और कारखानों ने उत्पादन को कई गुना बढ़ाया, लेकिन इसके साथ ही श्रम का यंत्रीकरण हुआ। श्रमिक धीरे-धीरे उत्पादन के साधनों से अलग होते गए और तकनीक पूँजी के नियंत्रण में सिमटती चली गई। शहरों का विकास, मजदूर बस्तियाँ, बेरोजगारी और असमानता—ये सभी औद्योगिक तकनीक के सामाजिक परिणाम थे।
डिजिटल युग में तकनीक केवल उत्पादन का साधन नहीं रही; यह सूचना, विचार और व्यवहार को नियंत्रित करने की शक्ति बन गई है। डेटा आज का सबसे मूल्यवान संसाधन है। AI एल्गोरिदम, सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और डिजिटल निगरानी प्रणालियाँ न केवल हमारे विकल्पों को प्रभावित करती हैं, बल्कि हमारे सोचने के तरीके को भी आकार देती हैं।
तकनीक अब केवल विज्ञान की उपलब्धि नहीं, बल्कि आर्थिक शक्ति और राजनीतिक प्रभुत्व का उपकरण बन चुकी है। कुछ गिनी-चुनी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ डेटा, AI और डिजिटल अवसंरचना पर नियंत्रण रखती हैं। इससे सत्ता का केंद्रीकरण होता है और आम नागरिक धीरे-धीरे उपभोक्ता और डेटा-स्रोत में बदल जाता है।
AI और डिजिटल तकनीक ने शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी संभावनाएँ खोली हैं। आज शिक्षा कक्षा की चारदीवारी से बाहर निकलकर मोबाइल स्क्रीन और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म तक पहुँच चुकी है।
AI आधारित शिक्षा छात्रों की व्यक्तिगत क्षमता और सीखने की गति के अनुसार पाठ्यक्रम तैयार कर सकती है। कमजोर छात्रों को अतिरिक्त सहायता और तेज़ सीखने वालों को उन्नत सामग्री मिल सकती है। डिजिटल कक्षाओं ने दूरदराज़ और ग्रामीण इलाकों तक शिक्षा पहुँचाई है, जहाँ कभी योग्य शिक्षक मिलना भी मुश्किल था।
VR और AR तकनीक ने चिकित्सा, इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा में व्यावहारिक प्रशिक्षण को नया आयाम दिया है। शिक्षक AI की मदद से मूल्यांकन और योजना पर कम समय लगाकर छात्रों के मार्गदर्शन पर अधिक ध्यान दे सकते हैं।
लेकिन शिक्षा में तकनीक का यह विस्तार कई सवाल भी खड़े करता है। डिजिटल असमानता आज भी एक बड़ी सच्चाई है। जिनके पास इंटरनेट, स्मार्टफोन और डिजिटल साक्षरता है, वही इन सुविधाओं का लाभ उठा पा रहे हैं।
इसके अलावा, शिक्षा का बढ़ता व्यावसायीकरण चिंता का विषय है। AI आधारित प्लेटफ़ॉर्म शिक्षा को एक उत्पाद में बदल रहे हैं, जहाँ गुणवत्ता से अधिक मुनाफ़ा प्राथमिकता बनता जा रहा है। मानवीय संपर्क, संवेदना और आलोचनात्मक सोच की जगह एल्गोरिदमिक निर्देश लेते जा रहे हैं।
स्वास्थ्य क्षेत्र में AI ने निदान, उपचार और प्रबंधन को नई दिशा दी है। टेलीमेडिसिन ने ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों तक विशेषज्ञ सेवाएँ पहुँचाई हैं। AI आधारित इमेजिंग सिस्टम कैंसर, हृदय रोग और अन्य जटिल बीमारियों की पहचान में डॉक्टरों की सहायता कर रहे हैं। डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड और स्मार्ट प्रशासन ने स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक पारदर्शी और संगठित बनाया है। आपदा प्रबंधन में AI आधारित पूर्वानुमान मॉडल राहत और बचाव कार्यों को तेज़ और प्रभावी बना रहे हैं।
लेकिन यहाँ भी सवाल वही है—क्या ये सेवाएँ सभी के लिए समान रूप से सुलभ हैं? या फिर उच्च गुणवत्ता वाली तकनीकी स्वास्थ्य सेवाएँ केवल उन्हीं तक सीमित हैं, जो भुगतान करने में सक्षम हैं?
AI अभी विशिष्ट कार्यों तक सीमित है, लेकिन AGI का लक्ष्य मानव जैसी सामान्य बुद्धिमत्ता विकसित करना है। यदि AGI वास्तविकता बनती है, तो यह समाज के हर पहलू—रोजगार, शासन, सुरक्षा और संस्कृति—को प्रभावित करेगी।
ऑटोमेशन और बुद्धिमान मशीनें लाखों नौकरियों को प्रभावित कर सकती हैं। यदि तकनीक का उपयोग केवल लागत घटाने और मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए किया गया, तो बेरोजगारी और असमानता और गहरी हो सकती है।
AGI के निर्णय यदि कुछ संस्थाओं या सरकारों के हाथ में केंद्रित हो गए, तो यह लोकतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। साइबर युद्ध, स्वायत्त हथियार और डेटा आधारित नियंत्रण भविष्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल हैं।
तकनीक को समाज के लिए वरदान बनाने के लिए केवल नवाचार पर्याप्त नहीं है; इसके लिए नीति, दृष्टि और सामाजिक जिम्मेदारी जरूरी है। तकनीक और AI पर सार्वजनिक तथा लोकतांत्रिक नियंत्रण होना चाहिए। शिक्षा और स्वास्थ्य में तकनीक का उपयोग समानता और सार्वभौमिक पहुँच के लिए हो। श्रमिकों को प्रतिस्थापित करने के बजाय उनकी क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया जाए। डेटा और AGI का उपयोग पारदर्शी और विविध हो। स्थानीय संस्कृति, भाषा और सामाजिक मूल्यों को तकनीकी डिज़ाइन में स्थान मिले।
तकनीक के इतिहास में हर नई खोज को “मानव मुक्ति” का औज़ार बताकर पेश किया गया है। भाप इंजन से लेकर इंटरनेट तक—हर बार कहा गया कि अब मेहनत घटेगी, समय बचेगा और इंसान ज़्यादा स्वतंत्र होगा। आज वही दावा AI और AGI के साथ दोहराया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि यह प्रगति किसकी है और किस कीमत पर? AI कोई मासूम औज़ार नहीं है। यह शक्ति है—और शक्ति जब लोकतांत्रिक नियंत्रण से बाहर जाती है, तो वह समाज को नहीं, सत्ता को मज़बूत करती है।
AI का सबसे पहला और सीधा वार मेहनतकश वर्ग पर पड़ता है। दफ्तरों से लेकर कारखानों तक, सफ़ेदपोश से लेकर ब्लू-कॉलर काम तक—मशीनें इंसान की जगह ले रही हैं। कहा जा रहा है कि “नए रोज़गार बनेंगे”, लेकिन यह आधा सच है। नए रोज़गार कम, और उच्च कौशल वालों के लिए होंगे; जबकि बेरोज़गारी व्यापक और स्थायी होगी। यह तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि वर्गीय पुनर्संरचना है—जहाँ मुनाफ़ा बढ़ेगा, मज़दूरी घटेगी।
AI सस्ता नहीं है। डेटा, सर्वर, ऊर्जा और विशेषज्ञता—ये सब कुछ चंद बहुराष्ट्रीय कंपनियों और ताक़तवर राज्यों के पास है। नतीजा यह कि ज्ञान और निर्णय की ताक़त कुछ हाथों में सिमटती जा रही है। यह एक नया डिजिटल साम्राज्यवाद है, जहाँ विकासशील देश डेटा के खदान बनेंगे और फ़ैसले कॉर्पोरेट एल्गोरिदम करेंगे।
चेहरा पहचानने वाली तकनीक, व्यवहार विश्लेषण, सोशल मीडिया प्रोफाइलिंग आदि ने मिलकर AI निगरानी प्रणाली को आसान, सस्ता और अदृश्य बना दिया है। अब सरकार को विरोध दबाने के लिए लाठी नहीं, एल्गोरिदम चाहिए।असहमति “डेटा पैटर्न” बनती जा रही है और इसके साथ ही नागरिक “संभावित अपराधी”। यह लोकतंत्र नहीं, डिजिटल तानाशाही की ओर क़दम है।
डीपफेक और जनरेटिव AI ने सच और झूठ के बीच की रेखा धुंधली कर दी है। चुनाव, अदालत, इतिहास—सब कुछ हेरफेर के दायरे में है। जब हर वीडियो संदिग्ध हो और हर आवाज़ नकली हो सकती है, तो लोकतंत्र का आधार—विश्वास—ढह जाता है।
AI से आगे की अवस्था, यानी AGI, सिर्फ़ औज़ार नहीं होगी—वह निर्णय ले सकेगी, लक्ष्य बना सकेगी। अगर उसके लक्ष्य मानव मूल्यों से टकराए, तो उसे रोकने की कोई गारंटी नहीं। यह विज्ञान-कथा नहीं, बल्कि अस्तित्व का सवाल है। इतिहास बताता है कि जब भी ज़्यादा ताक़तवर बुद्धि सामने आती है, कमज़ोर को हाशिये पर धकेल दिया जाता है।
AI–AGI का प्रश्न तकनीक का नहीं, राजनीति और सत्ता का है। अगर यह कॉर्पोरेट मुनाफ़े और राज्य नियंत्रण का औज़ार बना रहा, तो यह मानव मुक्ति नहीं, मानव अवमूल्यन की कहानी होगी। ज़रूरत इस बात की है कि AI पर सवाल पूछे जाएँ, उसे चुनौती दी जाए, और उसे लोकतांत्रिक, सामाजिक नियंत्रण में लाया जाए। वरना भविष्य में मशीनें नहीं, हमारी चुप्पी हमें अप्रासंगिक बना देगी।
AI और AGI पर उठने वाली हर आलोचना के जवाब में एक प्रश्न लगभग आरोप की तरह उछाला जाता है— “तो क्या तकनीक को आने से रोका जा सकता है?क्या भौतिकी, गणित और तकनीकी शोध बंद कर दिए जाएँ?” यह प्रश्न सुनने में तार्किक लगता है, लेकिन दरअसल यह बहस को भटकाने की कोशिश है।तकनीक को न रोका जा सकता है, न रोका जाना चाहिए। इतिहास इसका साक्षी है। मानव सभ्यता ने जब-जब नया ज्ञान पाया, उसने आगे बढ़ने का रास्ता चुना। आग, पहिया, भाप इंजन, बिजली, कंप्यूटर—किसी को भी “रोकने” की कोशिश नाकाम रही। वैज्ञानिक जिज्ञासा मनुष्य का स्वभाव है। भौतिकी और तकनीकी में शोध रोकना न संभव है, न वांछनीय। ऐसा करना स्वयं प्रगति से मुँह मोड़ना होगा। इसलिए AI और AGI पर सवाल उठाना विज्ञान-विरोध नहीं है।
असल प्रश्न तकनीक का नहीं, सत्ता का है। विवाद यह नहीं है कि तकनीक आएगी या नहीं। विवाद यह है कि वह किसके हाथों में होगी और किसके लिए काम करेगी। तकनीक कभी तटस्थ नहीं होती। उसका चरित्र तय होता है उस सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था से, जिसमें वह विकसित होती है। परमाणु ऊर्जा ने एक ओर बिजली दी, दूसरी ओर हिरोशिमा और नागासाकी। दोष भौतिकी का नहीं था, बल्कि उसके उपयोग का था। आज AI का विकास भी मानव ज़रूरतों से अधिक मुनाफ़े, निगरानी और युद्ध की ज़रूरतों से संचालित है।
तकनीकी प्रगति और अंधी तकनीकी दौड़ में फर्क है। प्रगति वह है जो समाज को सशक्त करे; अंधी दौड़ वह है जो सत्ता को और ताक़तवर बनाए। AI को बिना सामाजिक बहस, बिना लोकतांत्रिक नियंत्रण और बिना नैतिक सीमाओं के आगे बढ़ाना प्रगति नहीं, बल्कि भविष्य के लिए संकट बोना है।
AGI कोई साधारण तकनीक नहीं होगी। यह पहली बार होगा जब मनुष्य ऐसी प्रणाली बनाएगा जो स्वयं सीख सकेगी, निर्णय ले सकेगी और लक्ष्य तय कर सकेगी। यहाँ “बाद में देखेंगे” का तर्क खतरनाक है। नियंत्रण खो जाने के बाद पश्चाताप का कोई मूल्य नहीं होगा। AGI पर सावधानी बरतना विकास-विरोध नहीं, बल्कि सभ्यता-बोध का प्रमाण है।
तो रास्ता क्या है?
रास्ता तकनीक को रोकने का नहीं, उसे जनता के नियंत्रण में लाने का है—शोध खुले और सार्वजनिक हों, डेटा पर नागरिकों का अधिकार हो, एल्गोरिदम पारदर्शी हों, निर्णयों में मानवीय जवाबदेही अनिवार्य हो, सैन्य और निगरानी उपयोग पर सख़्त सीमाएँ हों। यानी तकनीक को नहीं, बेलगाम सत्ता को नियंत्रित करना होगा।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि तकनीक, AI और AGI न तो अपने आप में वरदान हैं और न ही अभिशाप। वे उस समाज का प्रतिबिंब हैं, जो उन्हें विकसित और नियंत्रित करता है। यदि तकनीक केवल लाभ, नियंत्रण और वर्चस्व का साधन बनी रही, तो यह सामाजिक विभाजन को और गहरा करेगी। लेकिन यदि इसे समानता, सार्वजनिक हित और मानव गरिमा के मूल्यों के साथ जोड़ा जाए, तो यही तकनीक शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा और मानव विकास की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है।

शिक्षक, भौतिक बिज्ञान
कोषाध्यक्ष, बिहार राज्य समिति, एटक







