ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है। कोई मुकम्मल जहाँ हम अपना बसा पाते तो कोई बात होती। एक हरी-भरी ज़मीन मिल जाती, एक खुला आसमाँ मिल जाता, तो कोई बात होती। मिली है तो यह दुनिया, जहाँ लोग बेवजह, बेमौत मर रहे हैं। कोई सड़क चलता स्वर्ग पहुँच रहा है। तो कोई हवाई यात्रा से सीधा यमलोक रवाना हो जाता है। मरने-मारने से नए नए तरीकों का आविष्कार किया जा रहा है। कोरोना महामारी का जनक इंसान ही तो था, कोई प्राकृतिक आपदा तो थी नहीं। ईसा मसीह ने हमें बताया कि Love Thy Neighbour, अपने पड़ोसियों से प्रेम करो। मेरी समझ से पहले उन्हें यह बताना चाहिए था — Love Thyself First, जो ख़ुद से प्रेम करेगा वही तो पड़ोसी से, प्रकृति से प्रेम कर पाएगा।
बुद्ध के दर्शन में ऐसा देखने को मिलता है। वे प्रेम तक पहुँचने की सीढ़ी के छह पायदान बताते है। पहला, ख़ुद पर तरस खाओ, क्षणभंगुर है ज़िन्दगी। दूसरा, ख़ुद पर दया करो, तभी किसी और पर तरस आयेगा। तीसरा, ख़ुद से सहनभूति रखो, शरीर तो नश्वर है, उसे नष्ट करने से क्या मिलेगा? चौथा, सहभूति तक जब पहुँचोगे तब करुणा जागेगी, ख़ुद का दुख भोगना छोड़कर उसे महसूस कर पाओगे। पाँचवाँ, दुख का जब अनुभव होगा तब जाकर आनंद मिलेगा। छठे पायदान पर तुम्हें प्रेम की अनुभूति होगी। रस्ता कठिन है, इसलिए उन्होंने अष्टांग मार्ग का दर्शन भी दिया।
खैर, किसे पड़ी है ज्ञान की, यहाँ तो अब डिग्री की भी वैल्यू नहीं बची है। सिस्टम में सर्वोच्च पद पर बैठा जाहिल कहता है — “मैं कोई पढ़ा लिखा नहीं हूँ दोस्तों, स्कूली शिक्षा के बाद मैं चल पड़ा ….”, फिर Entire Political Science की डिग्री भी दिखाता है। उस पर भी बहस चल रही कि फर्जी है या नहीं। हम मूर्ख हैं, या बनाये जा रहे हैं? अब तो समझ भी नहीं आता। कॉलेज के खुलने नहीं, बंद हो जाने के ढोल पीटे जा रहे हैं, क्योंकि अधर्मियों का दाखिला हो गया था। लगता तो है, हम मूर्ख हैं भी, और बनाये भी जा रहे हैं।
देखा है, इन तथाकथित लोकतंत्र के चयनित महानुभावों को। मुझे तो इनकी दुनिया का नागर नहीं बनना, मैं तो इनकी दुनिया में गँवार भी ना बनूँ। मैंने तो कल ही सोचा था, चलो अब वक्त आ गया है चाँद को ही हथिया लेते हैं, एक घर मामा के पास बनाते हैं। आज कल माँ बहुत बेचारी है। गाय को ही देख लीजिए, कहने को माँ है, जब जरूरत नहीं तो मिथुन बन जाती है। बेचारे मिथुन दा! का आज कल सोशल मीडिया पर मजाक उड़ रहा है। गाय के धड़ में उनका चेहरा लगा, तो बिल्कुल गणपति सा दिखता है। साड़ी के महानायक ने खूब थाली-ताली पीटी महामानव के लिए, अब शायद बूढ़े हो चले हैं। राजनीति से अब उनका कोई वास्ता नहीं। खिलाड़ी कुमार ने खूब डंका बजाए, आम कैसे खाते हैं? यह भी कोई बताने वाली बात है। आम तो हम छुपा कर ही खाते हैं। महंगाई इतनी है कि आम आदमी आम नहीं चूस पा रहा। आजकल तो तिलकधारी बाबू-भैया भी नजर नहीं आते। लगता है उनकी धोती नहीं मिल रही होगी।
खैर छोड़िये! भारत में अब रहना ही कौन चाहता है। खिलाड़ी कुमार भी सुना है कनाडा में बसते हैं। बस धंधा यहाँ चंगा है। तो चलिए, कनाडा, वहाँ से भारतीयों को भगाया जा रहा है। अमेरिका वाले ने बेड़ियों में हमें चलता किया। कभी रूस यूक्रेन पर हमला करता है। कभी इसराइल गजा पर बम गिरा देता है। खेल तो लगता है बस तेल का चल रहा है। जहाँ से मिले बटोर लो। सुना है तेल ख़त्म हो रहा है। क्या लगता है आपको, तेल नहीं रहेगा तो दुनिया नहीं चलेगी। गाड़ी के रुक जाने से क्या सफ़र समाप्त हो जाता है?
खैर, कल अमेरिका वाला भारत वाले विश्व-गुरु की खिल्ली उड़ा रहा था, ५० से सीधे ५०० प्रतिशत टैरिफ़ की धमकी दे रहा था। जब नाच-नाचकर वह अपनी ही बेज्जती करवा रहा था। चाइना वाले उसका कार्टून बनाकर जनहित में जारी कर रहा था। मैंने सोचा अपना वाला किधर है। आज कल नजर नहीं आता। मैं इंटरनेट की गलियों में बहुत ढूँढा तो पता चला, दो दिन पहले वह बुलडोजर बाबा के साथ देशहित में गंभीर चिंतन-मनन करते पाए गए। मनन का मुद्दा वही चुनाव रहा होगा। शागिर्द भी परेशान है। मालूम चला है कि अब तो विपदा ऐसी है, राजपूतों के सिरमौर ख़ुद बोल रहे है — कुछ ज़्यादा ही मतदाता शहीद हो गए। कुछ को कब्र से वापस ही ले आओ।
इधर जेएनयू के छात्र प्रधान और गृह मंत्री की कब्र खोदने के नारे लगा रहे हैं। पढ़ाई-लिखाई किया कीजिए। नारे अच्छे भी तो लगाए जा सकते हैं। जैसे — “गाँव बचाओ, देश बचाओ — अभियान चलाओ!”, “आओ बच्चो तुम्हें तुम्हारा गाँव बुलाता है!”, “दिल्ली से वापस चलो रे!”
मगर इधर देखा तो कल ही हमारे महामानव खेलों का उद्घाटन करते हुए भी वे आज भी विपक्ष को कोस रहे थे। बेचारे! अब तो मंत्री, संतरी, बाबू, अधिकारी भी इन राष्ट्रवादियों की ख्वाइशें पूरी करते-करते परेशान हैं। बंगाल में ही देख लीजिए। दीदी-ओ-दीदी ने अपने ही घर बुलाकर गृह मंत्री की सारी शाही निकाल दी। जिनको गिरफ़्तार करने भेजा था, उनके ख़िलाफ़ ही वारंट निकाल बैठी। बिहार में तो चोरी हो गई, अब बंगाल की बारी है। हार भी जाए दीदी तो अब यकीन कौन करेगा। कोई कभी तो क्रोनोलॉजी देखेगा। आज ना भी देखा तो कल तो देखेगा, कब तक भूत की भागती धोती के पीछे देश भागता रहेगा?
हमें ख़ुद को शिक्षित करने की जिम्मेदारी लेनी ही होगी। शिक्षकों को अपने अंदर झाँककर एक पूरा देश देखना होगा। विद्यार्थी और शिक्षक का संबंध परस्पर मेल-जोल का होना चाहिए। एक दूसरे को नीचा दिखाने से किसी को कोई विद्या नहीं मिलेगी। यहाँ तो स्कूल और कोचिंग ही आपस में प्रतिस्पर्धा करने को तत्पर हैं। देखें कहाँ एडमिशन ज़्यादा होता है?
आजकल के छात्र बड़े मनचले हो गए हैं। मैं स्कूल में था, तब मेरे कुछ सहपाठियों ने मिलकर केमिस्ट्री वाले मस्साब को भरे बाज़ार में बोर में बंदकर कूटा था। खैर, वो बात फिर भी इज्जतदार थी। कम-से-कम बोर का पर्दा तो था। अब तो खुले आम शिक्षकों को गोली मारी जा रही है। देश के गद्दारों को, गोली मारो॰॰॰॰
नहीं मत मारो, उन्हें भी जगह दो। अभिव्यक्ति जरूरी नहीं है अच्छी हो, पर हर अभिव्यक्ति जरूरी है।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)








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