मुझे डर लगता है। मुझे सबसे ज़्यादा भय ‘डर’ से ही लगता है। मैं भयभीत लोगों को देखकर डर जाता हूँ। और सबसे बड़ी विभीषिका का तो तब बोध होता है, जब मैं राजा को देख कर डर जाता हूँ। संत कबीर ने हमें बताया था —
ऐसा सख्त एक महाराज, जिन घर झूलत हाथी।
जिन घर झूलत हाथी, होय ज्यों ओसरा मोती॥
झोंका पवन का लागे, काया धूरि हो जाती।
फिर लिखते हैं —
मत कर माया को अभिमान, माया ज्यों पाँव की पाँस।
काया गारी काँच की, जैसे ओस की बूँद विलास॥
आप ही बताइए कौन है इस लोकतंत्र का महाराज? जिस लोकतंत्र की परिभाषा हमें बतायी जाती है — जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन — जब शासन जनता का है, तब महाराज कोई संतरी मंत्री कैसे हो गया? हमसे हमारी सत्ता हथिया ली गई है, और हमें पता तक नहीं। बड़े अफसोस की बात है।
अब तो विडंबना और भी गहरी है। मंत्री संतरी ख़ुद आपस में डर कर लड़ने को उतारू हैं। शक्ति हिंसा में नहीं हो सकती। मुझे पता है आप मानेंगे नहीं। तो चलिए! मैं आपको मौत से मिलवाता हूँ। भूत की तरह नहीं, भविष्य की तरह।
मौत से खूबसूरत वरदान जीवन के पास हो भी नहीं सकता है। मौत से समय का जन्म होता है। स्थान को अर्थ मिलता है। आइए! मौत की ख़ूबसूरती को निहारते हैं। सोचिए! अगर हम मर नहीं पाते, तो कैसा होता? मतलब, कोई हमें मार भी नहीं पाता। अब यह शरीर हाड़-मांस का तो बना नहीं होता। तलवार चलती या एटम बॉम ही फट जाता तो भी हमें कुछ नहीं होता। हम जस-के तस-हीरो माफ़िक़ खड़े होते। अब, अब क्या? कोई कहानी ही नहीं बनती। मूवी खत्म, पैसा हज़म! घर जाओ। कहाँ जाएँ? क्यों जाएँ? हम मर तो सकते नहीं हैं, खाने की भी क्या जरूरत? घर मकान, छत या छप्पर का हम क्या करते? क्या हम जंगलों में रहते? जंगल भी फिर क्यों होते? हवा की भी क्या जरूरत बच जाती? क्या करते हम? कभी सोचा है, अगर हम मर नहीं पाते तो?
तो क्या करें, जहर खा कर मर जाएँ? अगर मौत इतनी ही ख़ूबसूरत है तो!
अरे नहीं भाई! थोड़ा सब्र कर। जीवन तो बस मौक़ा है, मौत की ख़ूबसूरती को निहारने का, निहारते रहो, आनंद लो। आप चाहो ना चाहो, आप जीना तो चाहते हो ना। तो संभव है, सामने वाला भी जीना चाहता होगा। एक दूसरे का जीने में सहयोग करो ना! मौत की तरह ही जीवन भी ख़ूबसूरत हो जाएगा। कितना सरल है जीवन? बेकार ही हम उलझे हुए हैं। मत मानो कि — जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है, जो होगा अच्छा होगा।
देखो! जो हुआ वह क्यों जरूरी था। जो हो रहा है, उसकी क्या जरूरत है, और क्या होना चाहिए हम उसका अनुमान लगा पाने में सक्षम हो पायें।
विज्ञान की यही पद्धति होती है। एक परिकल्पना, एक प्रयोग, उसका निष्कर्ष, और एक अनुमान। मगर यह अनुमान निराधार नहीं होता, उसे भौतिक प्रमाणों की जरूरत होती है। होता तो हर वैज्ञानिक साहित्यकार है, ख़ासकर जब वह परिकल्पना लिख रहा होता है। बस उन पर साहित्यकारों से कहीं ज़्यादा प्रमाणों को साबित करने की जिम्मेदारी होती है। एक साहित्यकार परिकल्पना नहीं करता, वह तो अपने सपनों के परिन्दे को खुले आसमान में छोड़ देता है। वो कहते हैं ना! — जहाँ ना पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि!
चलिए! एक कविता का आनंद देखिए:
इक दिन आईना देख,
मैं भड़क उठा,
कहने लगा,
सामने जो व्यक्ति है,
जाहिल है,
देखो तो,
कितना घिनौना दिखता है?
मैं उस आईने पर,
कालिख मल आया,
काली सी सूरत,
वह जहालत,
अब दिखती नहीं,
अब पूरा नजारा ही काला है,
क्या मैं गोरा हो गया?
यह सवाल बिना पूछे ही,
मैं स्कूल चला गया,
वहाँ मेरा परिचय हुआ,
एक नये आईने से,
उस दर्पण में झाँककर देखा,
पद, पैसा और प्रतिष्ठा दिखी,
साहब मिले, मिलकर क्या ख़ुशी हुई?
यह सवाल कभी उठा ही नहीं,
जवानी कॉलेज जा पहुँची,
क्यों? पता भी नहीं,
सबने कहा विकास करो,
आत्मनिर्भर बनो,
कुछ नहीं तो एक नौकरी ही कर लो,
जीवन क्या इतने से ही समृद्ध नहीं?
समृद्धि की कोई एक परिभाषा तक नहीं,
कभी सुख है, तो कभी दुख,
रोता, सोता, जागता, हँसता,
हर दिन आईने से हँसकर मिलता,
उसे अब कोई शिकायत भी नहीं,
पर मायूसी झाँकती है,
प्रतिबिंब में क्या जीवन नहीं?
आईना ही है, सत्य तो नहीं,
फिर मैंने अपनी शक्ल कहीं देखी भी नहीं,
विज्ञान का वरदान आईना है,
पर दर्शन की कोई विधि नहीं,
ना सुख का समानार्थी,
ना दुख पर्यायवाची,
आनंद अभी यहाँ नहीं, तो कहीं नहीं!
आनंद कभी-किसी बाज़ार में नहीं मिलता। बाज़ार में सामान मिलते हैं। बाज़ार में नौकरी मिलती है। मंडी में मजदूरी मिलती हैं। बाज़ार रोज़गार नहीं दे सकता। क्या अंतर है नौकरी और रोजगार में?
मेरे अनुमान से रोज जिस काम करने से हमें अर्थ मिले, वह हमारा रोजगार है। हर नौकरी, हर चाकरी, हर मेहनत-मजदूरी में अर्थ है। हमारे शास्त्रों में वर्णाश्रम व्यवस्था का वर्णन मिलता है। वर्णों का विभाजन कर्मों के आधार पर हुआ, और आश्रम का वर्गीकरण आयु के अनुसार।
एक किसान पिता अगर दिन-रात मेहनत कर अनाज नहीं उपजा रहा होता, तो मैं यहाँ बैठा लिख-पढ़ कैसे रहा होता? अगर कोई इंजीनियर साहब, और मजदूर भाई मेरा घर बना नहीं रहे होते, तो मेरे सिर पर छत कैसे होती? अगर एक प्रोफेसर पिता, इन सब का खर्चा नहीं उठा रहा होते, तो मेरे पास इतना आधुनिक स्टूडियो घर पर ही कैसे होता? इस स्टूडियो में जितना सामान है, सात-आठ समंदर पार कर मुझ तक कैसे पहुँच रहा होता? अगर इतना कुछ नहीं हो रहा होता, तो आज हम इतनी दूर बैठे भी मिल कैसे रहे होते?
कितने सारे लोग मेरी दुनिया को हर पल बेहतर बनाने में लगे हुए हैं। मैं सबका आभारी हूँ, सबका जिनके होने के कारण मैं “ज्ञानिवास” में रह रहा हूँ। मैं आभारी सिर्फ़ उनका ही नहीं, जिन्होंने कभी हाथ से, कभी गाल पर तालियाँ बजाई, बल्कि उनका भी, जिन्होंने मुझे यहाँ पहुँचाया है। अपनी दुनिया जैसी भी है, परफेक्ट है। इसे बेहतर बनाने की इच्छा ही तो जीवन है, इसलिए मैं जीवार्थशास्त्र लिखता हूँ।
हर ज्ञान की तरह यहाँ भी समाधान शांति में है, जीवन अर्थवान है। इस अर्थ के वितरण की एक परिकल्पना है, पब्लिक पालिका। इस लोकतंत्र को एक चौथा मजबूत खंभा चाहिए, वह खंभा आर्थिक हो सकता है। पत्रकारिता तो दर्शक मात्र है। कहीं से सुनकर ख़बरें सुनाती है। आर्थिक अगर कोई खंभा होता तो सोचिए!
एक किसान को अपने बच्चों को अच्छी-से-अच्छी शिक्षा देने में पैसे ही खर्च नहीं करने पड़ते। बीमार पड़े तो स्वास्थ्य सुविधा मुफ्त मिलती। यहाँ-वहाँ आने-जाने के पब्लिक संसाधन पर भी किराया नहीं लगता। तो इन सब सुविधाओं को चलाने का पैसा कहाँ से आता। हम, भारत के लोगों ने फैले ही कमाकर, खरीदकर, बेचकर, पढ़कर, पढ़ाकर, इतना कर इकत्रित नहीं किया है कि बुनियादी सुविधा बाज़ार से अलग कर सकें। अगर ऐसा हो पाता तो क्या वह किसान देश को मुफ्त में खिला नहीं सकता? नहीं चाहिए उसे हवाई जहाज़, वह जमीन पर ही आनंदित है। बेकार हवाई चप्पलों पर देश को उड़ने के सपने दिखाया जा रहा है।
मैं क्या चाहता हूँ। मैं तो जीवन भर छुट्टियाँ मनाना चाहता हूँ। घूमना चाहता हूँ। लिखना पढ़ना चाहता हूँ।
मैं तो पब्लिक पालिका चाहता हूँ।
मैं लेखक हूँ, अपना रोजगार कर रहा हूँ। अर्थ तो है, मुद्रण नहीं। क्या इस देश में कोई लेखक बन अपना जीवन नहीं चला सकता। अभी तक तो मैंने ख़ुद को असफल ही पाया है। इसलिए भी शायद मैं डरता हूँ। क्यों इस देश के विश्वविद्यालयों के साहित्य विभाग से ढंग के पत्रकार नहीं निकल पा रहे?
वैसे आप क्या चाहते हैं? हमें नहीं, पहले आप ख़ुद को यह बतायें।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)








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