कल मैं नेता-विपक्ष राहुल गांधी को सुन रहा था। वे मज़दूरों के अधिकार की बात कर रहे थे। सरकार पर हमला करते हुए कह रहे थे कि अगर हम मिलकर सरकार पर दबाव डालेंगे तो जी-राम-जी सरकार वापस लेकर मनरेगा वापस ले आएगी। जैसा कि किसान क़ानून के साथ हुआ। मैं उनकी बातों से प्रभावित तो हूँ, पर सहमत नहीं। क्यों हमें पुरानी योजना वापस लानी है, जिसके बारे में हमारे प्रधानमंत्री ने संसद में कहा था — “मेरी राजनैतिक सूझ-बुझ कहती है कि मनरेगा कभी बंद मत करो। मैं ऐसी गलती नहीं कर सकता हूँ, क्योंकि मनरेगा आपकी विफलताओं का जीता-जागता स्मारक है। आजादी के साठ साल के बाद, आपको गड्ढे खोदने को भेजना पड़ा, ये आपकी विफलताओं का स्मारक है, और मैं गाजे-बाजे के साथ इसका ढोल पीटता रहूँगा।”
मैं मोदीजी से सहमत हूँ। पर, अफ़सोस उनकी ही सरकार ने मनरेगा को बंदकर जी-राम-जी को ले आए। कहाँ गया वो गाजा-बाजा? कहाँ गई वो सूझ-बुझ? ऐसा लगता है विफलताओं के स्मारक पर भी बुलडोजर चल गया। आइए! एक नजर डालते हैं क्या बदलाव आए हैं, और क्या हो सकता है? एक अनुमान लगाते हैं।
मनरेगा कानून 2005 में लागू हुआ था, और 2025 में जी-राम-जी बिल आया। आइए! दोनों के अंतर को समझते हैं। जहाँ मनरेगा 100 दिन की गारंटी देता था। मजदूरी का पूरा खर्चा और सामग्री का 75% केंद्र सरकार उठाएगी, बाक़ी राज्य सरकार को उठाना होगा। काम माँग आधारित होगा, जब मजदूर चाहें , काम माँग सकते हैं। सरकार की जिम्मेदारी होगी कि हर मजदूर को कम-से-कम 100 दिन की मजदूरी दी जाएगी। साल भर में कभी भी मज़दूर काम माँग सकेंगे। यह योजना मुख्यतः श्रमिकों के लिए थी, मुख्य रूप से कच्चा काम, जैसे गड्ढा खोदना। आधार कार्ड पर पैसों का भुगतान होता था।
अब देखते हैं जी-राम-जी ने क्या बदलाव लाए? अब काम का वादा 100 से बढ़कर 125 हो गया है। मगर केंद्र सरकार अब मात्र 60% और बाक़ी का 40% राज्य सरकारों को उठाना होगा। काम अब माँग आधारित नहीं होगा, बल्कि योजना-आधारित, मतलब बजट और पूर्व-निर्धारित लक्ष्यों के अनुसार काम मिलेगा। अब काम साल भर मिलने की कोई गारंटी नहीं है, कम से कम फसल की बुआई और कटाई के साठ दिन, मजदूरों को सरकार काम नहीं देगी। इसे “एग्रो-पॉज़” का नाम दिया गया है। और इसका उद्देश्य टिकाऊ बुनियादी ढाँचों का निर्माण करना होगा, जैसे पक्की सड़कें, भंडारण, और जल संरक्षण।
दोनों योजनाओं की अपनी खूबियाँ और ख़ामियाँ हैं। पर, मेरा उद्देश्य आपको एक नया सपना दिखाना है। एक अनुमान के अनुसार जितना भी टैक्स हम, भारत के लोग भरते हैं, उसका 40-45% हिस्सा केंद्र को जाता है, 55-60 राज्य सरकारों के पास, और मुश्किल से 1-3% पंचायत को सीधा मिलता है। इसे ऐसे समझें तो टैक्स के हर 100 रुपये से 42 केंद्र, 56 राज्य और 2 रुपया सीधा पंचायत को मिलता है। केंद्र के पास टैक्स पहुँचने का मुख्य जरिया इनकम टैक्स और कॉर्पोरेट टैक्स है। और राज्य के पास स्टाम्प ड्यूटी, प्रॉपर्टी टैक्स से लेकर एक्साइज ड्यूटी और मोटर व्हीकल टैक्स है। बेचारी म्युनिसिपैलिटी के पास स्ट्रीट लाइट लगाने या पार्किंग से मिला चंदा पहुँचता है। अब होता क्या है? केंद्र सरकार कोई कल्याणकारी योजना बनाती है, उसके लिए फण्ड देती है। योजना और राशि राज्य कार्यपालिका तक पहुँचती है। उसके बाद राज्य अपनी योजना के अनुसार पैसे पंचायत को देता है। जिसमें सरपंच जी की गृहस्थी भी ठीक से नहीं चल पा रही। इधर जो जितने ऊँचे पद पर है, मलाई चाट रहा है। भले मोदीजी कहते हैं कि ना खाऊँगा ना खाने दूँगा, फिर भाजपा के पास 1000 करोड़ का खजाना कहाँ से आ गया। छोटे-मोटे प्रतिनिधि भी बड़े मौज में हैं, इंदौर से विधायक जी को देख लिए कैसे बात करते हैं।
खैर, ये तो रही वो बातें जो अनुभव दिखा रही है। अब आते हैं, अनुमान पर। एक आदर्श समाज कि कल्पना करते हैं। मान लेते हैं — इस आदर्श समाज में 1000 लोग रहते हैं, इनमें से कुछ बच्चे होंगे, कुछ जवान, और कुछ बूढ़े। रिसर्च के अनुसार एक आदर्श जनसंख्या विभाजन कुछ इस तरह होगा — 240 बच्चे, 680 जवान, और 80 बूढ़े। इस विभाजन को थोड़ा और विस्तार देते हैं — 14 साल तक के लगभग 260 बच्चे होंगे, जो स्कूल जाने की उम्र में होंगे। 15-24 साल के लगभग 180 किशोर जो कॉलेज छात्र होंगे। 25 से 44 साल के लगभग 320 वयस्क जो अपने कौशल और अर्थोपार्जन के लिए संघर्ष कर रहे होंगे। 45 से 64 से ऊपर लगभग 180 लोग, जो अपनी विधा में निपुण हो चुके होंगे और अपनी वाली पीढ़ी को तैयार करने में अपना योगदान दे रहे होंगे। अंत में 65 से ऊपर लगभग 60 लोग होंगे, जिनका अनुभव हमारे बच्चों के लिए बहुत जरूरी है, क्योंकि जब बच्चे छोटे होते हैं, तब उनके माता-पिता अपने-अपने काम में व्यस्त होते हैं। इस काल में नाना-नानी और दादा-दादी ही बच्चे को अपना समय दे सकते हैं। खैर, इस आंकड़े को देखा जाए तो 500 लोगों पर 500 लोगों को पालने की जिम्मेदारी है। एक अगर एक के साथ हो तो यह दुनिया हमारी बन सकती है।
यह तो हुई जीवन के अर्थ की बातें, अब मुद्रण पर आते हैं। क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि सिर्फ़ हमारा दिया आयकर सीधा स्थानीय इकाई को मिले, हमारे वार्ड और को पंचायत मिले। अकेला इनकम टैक्स ही सारे टैक्सों का 22 प्रतिशत होता है। केंद्र अपने पास 17% कॉर्पोरेट टैक्स रख ले। ऐसा करने से स्थानीय इकाई के पास कितने पैसे हैं, इसका पता चल पाएगा। स्थानीय स्तर पर एक छोटी विधायिका का गठन हो, जिसके सदस्य वहाँ के MP, MLA, सरपंच, मेयर, पार्षद, के साथ साथ विभिन्न सामाजिक संगठनों के चुने हुए प्रतिनिधि भी हों। इसी इकाई का नाम मैंने पब्लिक पालिका रखा है। यहाँ केंद्र सरकार, और राज्य सरकार की योजनाओं के आलोक में स्थानीय इकाई जनहित के कामों का संचालन करवाएगी। जैसे हमारे पास अब एक इंदौर पालिका होगी, जो वहाँ की नगर पालिका को सीधा पैसे देने में सक्षम होगी, साथ ही जिम्मेदारी का निर्धारण करना आसान होगा।
ऐसी ही एक इकाई राज्य स्तर और केंद्र स्तर पर भी होगी, जो स्थानीय स्तर पर जहाँ कमी हो, वहाँ आपूर्ति करेगी। ख़ासकर शिक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी और उस पर निगरानी पब्लिक पालिका रखेगी। हम सब इसके सदस्य होंगे। मैंने विस्तार से इस मॉडल पर एक मैनिफेस्टो भी लिखा, आगे भी इस पर चर्चा करता रहूँगा। आप अपनी टिप्पणी में हमें ज़रूर बतायें।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)







