वसंत पंचमी भी खत्म हुई। आकाश में रात भर चाँद भी रहता है। लेकिन चाँदनी में नहाते आम के पेड़ों में मंजर नहीं आ रहे। शायद ठंड की वजह से। यों 30 जनवरी को जब मैं मधुपुर जा रहा था तो कटोरिया-चांदन के आसपास के जंगलों में आम के पेड़ों पर कहीं-कहीं मंजर दिखाई पड़े थे। यहाँ तो पेड़ों के पत्तों पर धूल जमी है। सुगबुगाहट भी नहीं है, लगता है कि पेड़ भी अकर्मण्य हो गये हैं। पेड़ों ने भी मान लिया है –होइहि सोइ जो राम रचि राखा। राम की रचना में कोई क्यों दखल दे?
इधर दुनिया को नया स्वरूप देने के लिए तत्पर हैं – एलन मस्क। वे कह रहे हैं कि ऐसा युग आने वाला है, जिसमें आदमी को हाथ-पैर नहीं हिलाना पड़ेगा। बैठे रहिए। खाना पीना उपलब्ध रहेगा। दास मलूका ने कहा है न- ‘अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए सबके दाता राम।’ एलन मस्क दुनिया के नये दास मलूका हैं। चार्वाक ने कहा था – यावज्जीवेत सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः”। यह भस्मीभूत देह कभी वापस नहीं आयेगी, इसलिए जब तक जीयो, सुख से जीओ। ऋण लेकर भी घी पीते जाओ। एलन मस्क जानते हैं कि बिना मेहनत किए कुछ नहीं होता। उन्होंने जो आर्थिक साम्राज्य बनाया है, वह मेहनत कर के बनाया है। यह अलग बहुत है कि उसमें थोड़ी दबंगई है, धूर्तता है, लूट है। लूटने का हुनर भी कम बड़ा हुनर थोड़े ही है!
सपना देखने और दिखाने का भी हुनर होना चाहिए। यह हुनर अपने प्रधानमंत्री में कूट-कूट कर भरा हुआ है। हर बजट में सपने-ही-सपने हैं। बजट के दावे अब तक पूरे हुए होते तो स्वर्ग के सभी देवता धरती पर उतर आते। कितने स्टार्टअप बिना स्टार्ट हुए, काल-कवलित हो गये। मरे हुए स्टार्टअप को पुनः पैकेजिंग कर जनता को परोस दिये गये। सच्चाई यह है कि जनता बजट को नहीं समझती। जनता क्या, पढ़े-लिखे लोग भी नहीं समझते। बजट के पीछे जो चतुराई छिपी रहती है, उसे चतुर सुजान भी नहीं समझते। बजट इस पर जरा भी चिंता नहीं करता कि एक नागरिक को जीने के लिए पाँच किलो अनाज और दूसरे नागरिक को करोड़ों-करोड़ क्यों है? हर साल का बजट आर्थिक विषमता क्यों बढ़ाता है? अभी भी सरकार को अस्सी प्रतिशत टैक्स आम जनता देती है। कारपोरेट मात्र पंद्रह-बीस प्रतिशत। कारपोरेट को देश लूटने की छूट है और जनता को देश बनाने के लिए चमड़ी को भी नीलाम करना है।
सरकार ने बहुत हंगामा किया, वन नेशन का स्लोगन देकर। सरकार यह क्यों नहीं करतीं कि वन नेशन, वन टैक्स होगा। नौकरी पेशेवाले से लेकर भिखमंगे तक विभिन्न तरीके से कई-कई बार टैक्स देता है। पहले सरकार को भरिए इनकम टैक्स। फिर बैंक से लेकर किसी भी वस्तु को खरीदिए – आपको देना होगा टैक्स और जीएसटी। सरकार सिर्फ वसूलना जानती है और जनता का पैसा पूँजीपतियों तक पहुँचाती है।
बजट समता कायम करने नहीं, आर्थिक गैर बराबरी बढ़ाने के लिए लाया जाता है। यह अमीरों का उपक्रम है। सरकार सिर्फ इतना जानती है कि गरीबों से वोट लेना है और वोट लेने के लिए पैसा चाहिए। पैसा कोई भूखा-नंगा तो देगा नहीं, इसलिए अमीरों के लिए बजट में अनेकानेक दरवाजे खोल दो और गरीबों के लिए सपनों का जाल फैला दो। कभी बहेलिया से सावधान होने की सीख दी जाती थी – ‘बहेलिया आयेगा, दाना डालेगा, लोभ से फंसना नहीं।’ अब तो बुद्धि भी लोभ के शिकार हैं।
इस लोकतंत्र में बहेलिया की मौज ही मौज है। सावधान करने वाले या तो डरे हुए हैं या लोभ में फँसे हैं या झिझक रहे हैं।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






