तमिलनाडु की राजनीति में 10 मई 2026 केवल सत्ता परिवर्तन की तिथि नहीं, बल्कि एक ऐसे राजनीतिक युग की शुरुआत बन गई है, जिसने दक्षिण भारतीय राजनीति के पारंपरिक समीकरणों को गहराई से प्रभावित किया है। लगभग पाँच दशकों से द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच घूमती रही सत्ता की धुरी इस बार टूट गई और पहली बार एक गैर-द्रविड़ दल तमिऴ वेत्रि कषगम (टीवीके) सत्ता तक पहुँच गया। प्रसिद्ध अभिनेता और ‘थलपति’ के नाम से लोकप्रिय जोसेफ विजय अब तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री हैं। यह केवल किसी अभिनेता का राजनीति में सफल प्रवेश नहीं, बल्कि तमिल समाज की बदलती राजनीतिक चेतना का संकेत भी है।
चेन्नई में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में विजय का अंदाज़ भी पारंपरिक राजनीति से अलग दिखाई दिया। तमिलनाडु की राजनीति में जहाँ सफेद धोती और कुर्ता लंबे समय से सादगी तथा द्रविड़ परंपरा का प्रतीक माने जाते रहे हैं, वहीं विजय सफेद शर्ट, ब्लेज़र और काली पैंट में दिखाई दिए। यह परिवर्तन केवल वेशभूषा का नहीं, बल्कि राजनीति की शैली बदलने का प्रतीकात्मक संदेश था। अपने प्रथम संबोधन में उन्होंने “नई शुरुआत”, “वास्तविक धर्मनिरपेक्षता” और “सामाजिक न्याय” की जिस प्रकार चर्चा की, उससे स्पष्ट हो गया कि वे स्वयं को पारंपरिक द्रविड़ राजनीति तथा भाजपा की राष्ट्रवादी राजनीति — दोनों से भिन्न एक नए विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं।
विजय ने कहा, “मैं किसी राजवंश में पैदा नहीं हुआ हूँ, मैं आपका ‘थंबी’ हूँ।” यह कथन भावनात्मक होने के साथ-साथ राजनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। उन्होंने यह भी कहा कि “मैं कोई फ़रिश्ता नहीं, बल्कि एक सामान्य मनुष्य हूँ।” इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उस राजनीतिक शैली के प्रत्युत्तर के रूप में भी देखा जा रहा है, जिसमें व्यक्तिगत संघर्ष और असाधारण नेतृत्व की छवि को लगातार प्रमुखता दी जाती रही है। गरीबी और भूख का उल्लेख कर विजय ने सीधे उस जनभावना को स्पर्श करने का प्रयास किया, जिसे भाजपा पिछले एक दशक से राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती रही है।
तमिलनाडु के चुनाव परिणाम भाजपा के लिए इसलिए भी महत्त्वपूर्ण झटका माने जा रहे हैं, क्योंकि दक्षिण भारत में उसकी राजनीतिक स्थिति अभी भी सीमित है। आंध्र प्रदेश में वह सहयोगी दलों पर निर्भर है, केरल में कांग्रेस और वामदलों के बीच अपनी जगह नहीं बना पा रही है, जबकि तेलंगाना और कर्नाटक में कांग्रेस अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में है। ऐसे में भाजपा को तमिलनाडु से बड़ी अपेक्षाएँ थीं। माना जा रहा था कि यदि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनती है, तो वह अन्नाद्रमुक के सहयोग से सत्ता समीकरण अपने पक्ष में कर सकती है। किंतु ऐसा संभव नहीं हो सका। टीवीके को 108 सीटें प्राप्त होने के बाद कांग्रेस ने तत्काल समर्थन की घोषणा कर दी। इसके पश्चात माकपा, भाकपा, वीसीके और आईयूएमएल जैसे दल भी विजय के समर्थन में आ गए और सरकार गठन का मार्ग प्रशस्त हो गया।
हालाँकि सरकार गठन की प्रक्रिया ने कई संवैधानिक और राजनीतिक प्रश्न भी खड़े किए। राज्यपाल द्वारा बार-बार बहुमत सिद्ध करने की माँग तथा विजय को राजभवन से लौटाया जाना विपक्ष के लिए यह आरोप लगाने का अवसर बन गया कि केंद्र सरकार संवैधानिक संस्थाओं का राजनीतिक उपयोग कर रही है। यही कारण है कि शपथ ग्रहण शीघ्र कराने को विपक्ष ने संभावित “विधायक तोड़ो राजनीति” से बचाव की रणनीति के रूप में भी देखा। भारतीय राजनीति में पिछले वर्षों में ऐसे अनेक उदाहरण सामने आए हैं, जहाँ सत्ता प्राप्ति के लिए रातों-रात राजनीतिक समीकरण बदले गए।
लेकिन वास्तविक चुनौती अब आरंभ होती है। चलचित्रों में नायक अकेले संघर्ष कर विजय प्राप्त कर सकता है, किंतु लोकतंत्र में ऐसा संभव नहीं होता। विजय की सरकार गठबंधन के समर्थन से बनी है और गठबंधन की राजनीति में प्रत्येक निर्णय संतुलन, संवाद और समझौते की माँग करता है। कांग्रेस, वामदल तथा अन्य सहयोगी दल वर्तमान में भाजपा को रोकने के उद्देश्य से विजय के साथ खड़े हैं, किंतु भविष्य में यही समर्थन दबाव की राजनीति का कारण भी बन सकता है। विजय के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वे अपनी लोकप्रियता को प्रशासनिक विश्वसनीयता में परिवर्तित कर पाते हैं अथवा नहीं। तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से सामाजिक न्याय, भाषाई अस्मिता और क्षेत्रीय स्वाभिमान के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है। हिंदी की अनिवार्यता, नई शिक्षा नीति, नीट परीक्षा तथा परिसीमन जैसे विषयों पर केंद्र और तमिलनाडु के बीच लगातार टकराव की स्थिति बनी रही है। पूर्व मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने इन मुद्दों पर केंद्र सरकार के विरुद्ध आक्रामक रुख अपनाया था। अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या विजय भी उसी प्रकार का रुख अपनाएँगे?
विशेष रूप से परिसीमन का प्रश्न आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति का सबसे विवादास्पद विषय बन सकता है। दक्षिण भारतीय राज्यों का मानना है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की, किंतु भविष्य में लोकसभा सीटों के नए परिसीमन के बाद उनकी राजनीतिक शक्ति कम हो सकती है। यही कारण है कि दक्षिण भारत में “संघीय अधिकार बनाम केंद्रीकरण” की बहस निरंतर तीव्र होती जा रही है। यदि विजय इस मुद्दे को प्रभावशाली ढंग से उठाते हैं, तो वे केवल तमिलनाडु के नेता नहीं, बल्कि दक्षिण भारतीय अस्मिता के प्रमुख राजनीतिक चेहरे के रूप में उभर सकते हैं।
इस समूचे राजनीतिक परिदृश्य में राहुल गाँधी की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण होती जा रही है। विजय के शपथ ग्रहण समारोह में उनकी उपस्थिति केवल राजनीतिक शिष्टाचार नहीं थी, बल्कि यह संकेत भी था कि कांग्रेस दक्षिण भारत में भाजपा के विरुद्ध नए सामाजिक और क्षेत्रीय गठबंधन की रणनीति पर कार्य कर रही है। यदि तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना और केरल में भाजपा विरोधी शक्तियाँ साझा राजनीतिक विमर्श तैयार कर लेती हैं, तो 2029 का लोकसभा चुनाव नए राजनीतिक समीकरणों के साथ सामने आ सकता है।
दरअसल, तमिलनाडु का यह चुनाव केवल सरकार परिवर्तन की घटना नहीं है। यह उस नई राजनीतिक बेचैनी का परिणाम है, जिसमें युवा मतदाता पारंपरिक दलों से अलग विकल्प की तलाश कर रहा है। विजय उसी बेचैनी की राजनीतिक अभिव्यक्ति हैं। किंतु इतिहास साक्षी है कि केवल लोकप्रियता चुनाव जिता सकती है, सुशासन नहीं दे सकती। एम. जी. रामचंद्रन और जे. जयललिता जैसे नेताओं ने भी अपनी लोकप्रियता को संगठनात्मक क्षमता और प्रशासनिक कौशल में परिवर्तित कर ही स्थायी राजनीतिक विरासत निर्मित की थी। अब पूरा देश इस बात पर दृष्टि लगाए हुए है कि विजय केवल लोकप्रिय अभिनेता बने रहते हैं अथवा एक गंभीर और प्रभावशाली राजनीतिक नेता के रूप में स्वयं को स्थापित कर पाते हैं। यदि वे धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और संघीय अधिकारों की राजनीति को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने में सफल होते हैं, तो संभव है कि 2029 की राष्ट्रीय राजनीति का मार्ग वास्तव में चेन्नई से होकर गुजरे।
(ये लेखक के निजी विचार हैं। ‘लोकजीवन’ का इससे सहमत होना आवश्यक नहीं है।)

शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना
रुपेश रॉय एक समर्पित शोधार्थी हैं जिनका राजनीतिक विज्ञान में किया गया कार्य शासन, नीति और सामाजिक न्याय के बीच के अन्तर्संबंधों का अन्वेषण करता है। उनका शोध समकालीन समाज के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने और संबोधित करने की प्रतिबद्धता से निर्देशित है।







