बुद्धिजीवियों की भी अजीब हालत है। इनसे उम्मीद की जाती है कि वे धर्म-जाति से मुक्त होंगे । लेकिन ये धर्म और जाति के कीचड़ से कुछ ज़्यादा ही सने हैं। नतीजा है कि उनके मंतव्य आग्रह-पूर्वाग्रह से भरे रहते हैं। उन्हें नज़दीक का स्वार्थ दिखता है। अपने को सत्य साबित करने के चक्कर में एक की गलती से दूसरे की गलती को जस्टिफ़ाई करने से परहेज नहीं करते।
बिहार के मंत्रिमंडल का गठन हुआ। मंत्रियों को लाइन में खड़ा कर कोरस पाठ करवाया गया। लगा ही नहीं लगा कि मंत्रियों द्वारा शपथ ली जा रही है। बच्चा क्लास में जैसे एक्कां एक, दुक्कां दू रटाया जाता है, वैसे ही मंत्रियों से शपथ दिलवाई गई। शायद ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि प्रधानसेवक के पास समय नहीं था। खैर। मंत्रिमंडल में पूर्व के तीन मुख्यमंत्रियों और दो केंद्रीय मंत्रियों के सुपुत्र हैं।
राजनीति में सुपुत्रों की कोई कमी नहीं है। हमाम में अब सब नंगे हैं। इसकी आलोचना और निंदा भरपूर करें। राजनीति में गिरावट के प्रति भी चिंतित हों, लेकिन मेरा सवाल है कि राजनीति में गिरावट की क्या यह अकेली वजह है? राजनीति में वैसे लोग जो परिवारवाद के कारण नहीं आये, वे क्या बहुत अच्छा कर रहे हैं और देश के लिए क्या जान न्योछावर कर रहे हैं? आप परिवारवाद की आलोचना इसलिए नहीं कर सकते कि नॉन परिवारवादियों के पाप की रक्षा कर सकें? बुद्धिजीवियों में के पास अद्भुत कौशल होता है कि वे मनमाने पाप को चुन कर अन्य पापों को ढंक सकें।
वैसे यह परंपरा आज की नहीं है। भारतीय बुद्धिजीवियों ने यह काम पूरे मनोयोग से सदियों से किया है। बुद्धिजीवियों में चारित्रिक दोहरापन कूट-कूट कर भरा है। जब कभी कबीर ने दावा किया था – “सो चादर सुर नर मुनि ओढी,/ ओढि कै मैली कीनी चदरिया/दास कबीर जतन करि ओढी,/ ज्यो की त्यों धर दीन्हीं चदरिया।” तो आचार्य रामचंद्र शुक्ल चिढ़ गये। उन्हें लगा कि नीच घर में जन्मा, न पढ़ा, न लिखा, उसकी यह हिमाक़त कि वह यह दावा करे कि सुर, नर , मुनि जिस चादर को मैली होने से नहीं बचा सके, उसे कबीर जैसा अदना आदमी यह कहे कि जस के तस धर दीन्हीं चदरिया।
यों रामचंद्र शुक्ल भी इंटर फ़ेल ही थे, लेकिन उनका अध्ययन गहरा था। बाक़ायदा वे काशी हिन्दू यूनिवर्सिटी के हिन्दी विभाग में न केवल शिक्षक हुए, बल्कि हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष भी रहे। उनके ज्ञान पर लोग रस्क करते थे। कबीर के प्रति नाराज़गी की एक और वजह थी, वह थी कबीर की दरेरा देनेवाली वाणी जो वर्णाश्रम और पाखंड पर टूट पड़ती थी। आज तो डाल-डाल पर रामचंद्र शुक्ल बैठे हैं। उनके हाथ में एक नपना है, जिससे सभी को नापते रहते हैं और अपने विचार आरोपित करते रहते हैं।
भारत में इंसान मुश्किल से मिलेंगे। जन्म होता है इंसान के रूप में, लेकिन जन्म के साथ जाति और धर्म चिपक जाते हैं। केवल फ़ेसबुक पर चले जाइए। आपको हिंदू मिलेगा, मुस्लिम मिलेगा, ईसाई आदि भी मिल जायेंगे, चंद्रवंशी, सूर्यवंशी तो मिलेंगे ही, साथ ही राजपूत, ब्राह्मण, कुशवाहा, यादव, कुर्मी, तेली, चमार, पासी, धोबी, कलवार आदि आसानी से मिल जायेंगे। मुसलमानों में भी शेख , सैयद, पठान (अशराफ) से लेकर अंसारी (जुलाहा), कुरैशी (कसाई), मनिहार, मंसूरी, और धुनिया जैसे अनेक अजलाफ मिल जायेंगे। इनका जन्म इंसान रूपी महासागर में हुआ था, लेकिन अब जाति के नाले में डुबकी लगा रहे हैं। जाति और धर्म का चिपकन ऐसा है कि हर कदम पर इंसान छोटा होता जाता है। खाये पीये अघाये लोगों ने बौद्धिकता का ऐसा बेजा इस्तेमाल किया है कि उनके कुकृत्य ‘स्वर्णाक्षरों’ में लिखे जायेंगे।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







