भारतीय राजनीति के मौजूदा दौर में ‘काक्रोच जनता पार्टी’ को लेकर दो तरह की प्रतिक्रियाएँ दिखाई दे रही हैं। एक वर्ग इसे नई पीढ़ी की राजनीतिक बेचैनी की अभिव्यक्ति मान रहा है, जबकि दूसरा इसे महज सोशल मीडिया का शोर, व्यंग्य और मीम संस्कृति का क्षणिक उभार बताकर खारिज कर देना चाहता है। मेरी समझ से दोनों अतिशयोक्ति है। वास्तविकता यह है कि इस पूरे घटनाक्रम को केवल इंटरनेट मनोरंजन मानना गंभीर राजनीतिक भूल होगी। यह युवाओं द्वारा सिर्फ लाइक फोलो और सब्सक्राइब बढ़ाने भर का प्रयास नहीं है।
दरअसल इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि पर नजर डालें। आपको वह टिप्पणी याद आ जाएगी, जिसने युवाओं के भीतर गहरा आक्रोश पैदा किया। आपको याद होगी देश के मुख्य न्यायाधीश की वह टिप्पणी, जो व्यापक बहस का विषय बनी, जिसमें उन्होंने विरोध करने वाले युवाओं और एक्टिविस्टों को ‘काक्रोच’ जैसी उपमा से नवाजा। हालाँकि सत्ता प्रतिष्ठान और उसके समर्थकों ने इसे सामान्य टिप्पणी बताने की कोशिश की, लेकिन बड़ी संख्या में युवाओं ने इसे केवल एक शब्द नहीं, बल्कि व्यवस्था की मानसिकता के रूप में देखा। इसलिए इन युवाओं ने खुद विरोध करने का निश्चय किया और फिर तैयार हो गयी ‘काक्रोच जनता पार्टी’।
क्योंकि जब सत्ता और संस्थाएँ जनता के असंतोष को सुनने के बजाय उसे अपमानित करने लगें, तब व्यंग्य प्रतिरोध की भाषा बन जाता है और यही प्रतिरोध परिवर्तन की लहर भी बन सकता है। मैं ‘सकता है’ कह रहा हूँ, क्योंकि जरूरी नहीं कि हो ही जाए। पर संकेत कुछ ऐसा ही है, जैसा हमारे पड़ोसी देश में ऐसा हो भी चुका है।
शायद इसी कारण ‘काक्रोच’ शब्द, जिस के द्वारा अपमान करने की कोशिश की गई , वही धीरे-धीरे प्रतिरोध का प्रतीक बन गया। नई पीढ़ी ने मानो यह कह दिया: अगर सवाल पूछना आपको काक्रोच लगता है, तो हाँ, हम कंट्रोल ही सही पर हम तो पूछेंगे; हाँ, हम कंट्रोल ही सही पर हम तो हर हाल में लड़ेंगे। हम न तो डरेंगे न भागेंगे हम तो तुम्हारे सामने थे, हैं और रहेंगे। तब तक, जब तक तुम हमारी सुन न लेते हो। हाँ, हम तुम्हारे लिए काक्रोच हो सके हैं पर यह देश हमारा भी है और हम इस देश की जनता हैं। इसीलिए काक्रोच जनता पार्टी।
पिछले दिनों जिस तरह लगातार ‘काक्रोच जनता पार्टी’ से जुड़े अकाउंट्स को बंद करने की कोशिशें हुईं, और उसके बावजूद वे पहले से अधिक फॉलोअर्स और अधिक तीखे राजनीतिक व्यंग्य के साथ वापस आते गए, वह इस बात का संकेत है कि मामला केवल कुछ वायरल पोस्टों तक सीमित नहीं है। इसके भीतर उस युवा पीढ़ी का असंतोष जमा है, जो बेरोजगारी, महंगी शिक्षा, निजीकरण, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और राजनीतिक पाखंड के बीच खुद को लगातार हाशिये पर धकेला हुआ महसूस कर रही है।
भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान लंबे समय से युवाओं की वास्तविक समस्याओं को हल करने के बजाय उन्हें प्रतीकों, भावनात्मक नारों और नियंत्रित मीडिया विमर्शों में उलझाकर रखने की राजनीति करता रहा है। रोजगार का संकट गहराता गया, प्रतियोगी परीक्षाएँ अविश्वसनीय होती गईं, NEET जैसी परीक्षा के पेपर लीक होने लगे, सरकारी क्षेत्र सिकुड़ता गया और शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतें बाजार के हवाले होती चली गईं। लेकिन इन सवालों पर गंभीर बहस के बजाय जनता को लगातार धार्मिक और सांस्कृतिक ध्रुवीकरण की ओर मोड़ा गया। ऐसी परिस्थिति में अगर नई पीढ़ी व्यवस्था का मजाक उड़ाते हुए अपनी भाषा में प्रतिरोध दर्ज कर रही है, तो इसे केवल ‘अपरिपक्वता’ कह देना वास्तविक संकट से आँख चुराना होगा।
यह भी सच है कि सोशल मीडिया अपने-आप सामाजिक परिवर्तन का विकल्प नहीं हो सकता। इतिहास में किसी भी बड़े परिवर्तन की निर्णायक शक्ति संगठित जनसंघर्ष ही रहे हैं। सड़क, यूनियन, छात्र आंदोलन, किसान संघर्ष और राजनीतिक संगठन आज भी उतने ही आवश्यक हैं, जितने पहले थे। केवल डिजिटल सक्रियता सत्ता परिवर्तन नहीं कर सकती।
लेकिन यह भी उतना ही सच है कि हर दौर अपने प्रतिरोध की नई भाषा गढ़ता है। कभी अखबार, पैम्फलेट और नुक्कड़ नाटक के द्वारा ऐसा किया जाता था, जिसे सत्ता हमेशा खतरनाक देश विरोधी घोषित करता रहा है। आज डिजिटल व्यंग्य और मीम उसी भूमिका का एक नया रूप बनकर उभरे हैं। खासकर तब, जब मुख्यधारा का बड़ा मीडिया कॉरपोरेट और सत्ता के प्रभाव में चला गया हो।
‘काक्रोच जनता पार्टी’ का महत्व इसी बिंदु पर समझना होगा। यह अभी कोई संगठित वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति नहीं है, न ही इससे तत्काल किसी क्रांतिकारी परिवर्तन की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन यह उस राजनीतिक शून्य को उजागर कर रही है, जहाँ करोड़ों युवा खुद को प्रतिनिधित्वहीन महसूस कर रहे हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सत्ता की बेचैनी भी इस प्रवृत्ति के महत्व को साबित करती है। अगर यह सब केवल हास्य होता, तो दमन की इतनी बेचैनी दिखाई नहीं देती। सत्ता हमेशा विचार से पहले उसकी भाषा से डरती है। और नई पीढ़ी ने अपनी भाषा खोजनी शुरू कर दी है — व्यंग्य की भाषा, कटाक्ष की भाषा और डिजिटल प्रतिरोध की भाषा। हाँ, नाम ‘काक्रोच जनता पार्टी’ है, प्रतीक भी वही है कि कितना भी स्प्रे कर दो, हम हर हाल में रहना जानते हैं। उन्होंने अपना स्लोगन भी लिख लिया है – ‘Secular, Socialist, Democratic, Lazy.’ और उन्होंने अपनी परिभाषा भी दे दी है – ‘A political front of the youth, by the youth, for the youth.’
भारतीय लोकतंत्र के लिए यह एक गंभीर संकेत है, क्योंकि जब युवा पीढ़ी पारंपरिक राजनीतिक संस्थाओं और मीडिया पर भरोसा खोने लगती है, तब वह नए रास्ते तलाशती है। वे रास्ते कितने स्थायी होंगे, यह भविष्य तय करेगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि देश का राजनीतिक और सामाजिक संकट अब उस स्तर पर पहुँच चुका है जहाँ असंतोष मीम और व्यंग्य के रूप में भी विस्फोटक राजनीतिक अर्थ ग्रहण करने लगा है।
इसलिए ‘काक्रोच जनता पार्टी’ को केवल इंटरनेट ट्रेंड समझकर खारिज कर देना शायद आसान हो, लेकिन बुद्धिमानी नहीं। साथ ही यह भी कि वर्तमान सरकार, विपक्ष या तमाम तरह के सामाजिक-राजनीतिक संगठन इन युवाओं का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम नहीं हो रहे।

शिक्षक, भौतिक बिज्ञान
कोषाध्यक्ष, बिहार राज्य समिति, एटक







