इन दिनों : छाती पीटने और हाय-हाय करने के चैम्पियन

"प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जानते थे कि जिस तरह की शर्तें वे महिला आरक्षण बिल में जोड़ रहे हैं, उन्हें विपक्ष स्वीकार नहीं करेगा। इन शर्तों को लागू करने के लिए दो तिहाई बहुमत चाहिए, जो उनके पास है नहीं। फिर उन्होंने अचानक लोकसभा की बैठक क्यों बुलाई?" - इसी आलेख से

मुझे लगता है कि महिलाओं के लिए प्रधानमंत्री को कुर्सी का त्याग कर देना चाहिए। वे इतना हाय-हाय कर रहे हैं। बीजेपी मुख्यमंत्रियों की एक बैठक में नये-नवेले अध्यक्ष बुला रहे हैं, जिसमें कांग्रेस के ख़िलाफ़ निंदा प्रस्ताव पास किया जाएगा। बीजेपी के हर मोर्चे से ‘दुर-दुर, छींह-छींह’ की आवाज़ आ रही है । मैंने कहावत सुनी थी- चोरै करै झात। चोर ही हल्ला मचाना शुरू कर देता है। शातिर और फरेबियों के चक्कर में यह देश कहाँ पहुँचेगा, पता नहीं।

प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जानते थे कि जिस तरह की शर्तें वे महिला आरक्षण बिल में जोड़ रहे हैं, उन्हें विपक्ष स्वीकार नहीं करेगा। इन शर्तों को लागू करने के लिए दो तिहाई बहुमत चाहिए, जो उनके पास है नहीं। फिर उन्होंने अचानक लोकसभा की बैठक क्यों बुलाई? महिला बिल 2023 में लगभग सर्वसम्मति से पास हुआ। राष्ट्रपति ने स्वीकृति दी और केंद्र सरकार ने समय पर अधिसूचना भी जारी नहीं की। तीन साल बाद उन्हें याद आया कि महिला बिल की अधिसूचना तो जारी हुई नहीं तो तीन-चार दिन पहले उसने अधिसूचना निकाली।

झूठ बोलने और रोने-गाने में उनसे कोई पंगा नहीं ले सकता। उनकी नस-नस में यह शामिल है। लोकसभा और विधानसभाओं में जितनी सीटें हैं, उन पर महिला आरक्षण बिल लागू करने में क्या दिक़्क़त है? इस पर सभी सहमत हैं। प्रधानमंत्री कहते हैं कि महिला सब कुछ भूल सकती है, अपना अपमान नहीं भूलती। प्रधानमंत्री जी की पत्नी क्या महिला नहीं है? न आपने तलाक़ दिया, न आपने स्वीकार किया। क्या यह महिला का अपमान नहीं है?

आपके कार्यकाल में हाथरस से लेकर मणिपुर तक कितनी महिलाओं का असम्मान हुआ और आप चुप लगा गये। यहाँ तक कि जब यह बिल लोकसभा में पेश किया जा रहा था तो मणिपुर की महिलाएँ शांति स्थापना के लिए सड़कों पर खड़ी थीं। हर बिल में अपनी राजनीतिक चतुराई घुसेड़ देनी है। जहाँ राजनीतिक लाभ मिलने की उम्मीद हो, वहाँ अपनी सक्रियता और आँसू बहाना तो लगता है कि आपका परम धर्म बन गया है। आपके राज में सब कुछ बंधक है। सड़क पर विरोध करो तो देशद्रोह का तगमा और एफआईआर। विरोध किया तो ईडी-सीबीआई।

आपकी बड़ी समस्या है कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी को देश निकाला मिल जाए। चंटुओं को आपने लगा रखा है। वह जगह-जगह मुकदमे कर रहे हैं। अदालतें भी भूमि पर लोट रही है। जिस देश का प्रधानमंत्री सार्वजनिक मंचों से हिन्दू-मुस्लिम करने लगे, वह देश सुरक्षित कैसे रह सकता है? अच्छे शासन में अल्पसंख्यक निडर होकर रहते हैं। आप और आपकी सेना तो हर दिन डर पैदा कर रही है। मॉब लिचिंग को तो जैसे मान्यता ही मिल गई है। ग़रीबों पर चलाने के लिए बुलडोज़र है। उनकी चीखें आपको ज़रा भी परेशान नहीं करती। आपके मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा की भाषा सुन लीजिए। अपशब्द बकना तो उसके फ़ितरत में शामिल है। वह बिलो तो बेल्ट की भाषा ही बोलते हैं। संस्कृत के पैरोकार लोग क्या सही भाषा भी नहीं बोल सकते।

जब भी समस्या आती है तो सुलझाने के बजाय मंच पर आँसू बहाना और बेचारगी ज़ाहिर करना आपको शोभा नहीं देता। प्रधानमंत्री आपको रोने-कपसने के लिए नहीं बनाया गया है। महिला बिल में अपना तंग ज़ेहन का प्रदर्शन नहीं करते तो यह बिल लागू हो गया होता, लेकिन आपका उद्देश्य यह नहीं है। आपके लोग विभिन्न मंचों से कांग्रेस विरोध करने के लिए छाती पीट रहे हैं। आगे भी यह ड्रामा यह देश देखेगा। हॉलीवुड भी आपके सामने पानी भरता है।

जन पत्रकारिता को समर्थन देने के लिए उपर्युक्त QR Code को स्कैन करके 20, 50 या 100 रुपये की सहायता राशि प्रदान कर सकते हैं।
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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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