भागलपुर के माणिक सरकार चौक पर हूँ। कभी महान कथाकार शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय इस चौक पर धमाचौकड़ी मचाये होंगे। इस चौक की बगल में ही गंगा किनारे उनका ननिहाल है, जहाँ उनका बचपन बीता था। गंगा की मुख्यधारा रूठ कर दूर चली गई है। सरकार ने ठान लिया है कि गंगा की धारा चाहे जैसे हो, वापस लायेंगे, इसलिए ड्रेजिंग की जा रही है। यानी बालू उड़ाही। प्रकृति के साथ आदमी खेले तो कोई बात नहीं, उसके साथ खिलवाड़ न करे। शरतचन्द्र गंगा से खेलते थे, सरकारें गंगा से खिलवाड़ करती हैं।
फरक्का बराज के कारण गंगा नदी बालू और मिट्टी से भर गई है। गंगा के दोहन से वह परेशान थी, अब उससे और भी रस निकाला जायेगा। गंगा किनारे 100 करोड़ की लागत से फोरलेन सड़क बनेगी । 17,000 करोड़ रुपये की लागत से तीन प्रमुख ‘गंगापथ’ परियोजनाएं शुरू की गई हैं – दीघा-बिहटा-कोईलवर, मुंगेर-सुल्तानगंज, और सुल्तानगंज-भागलपुर-सबौर। सरकार की इच्छा है कि इससे कनेक्टिविटी बढ़ेगी और पर्यटन और व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। ये परियोजनाएँ पटना के मरीन ड्राइव की तर्ज पर होंगी। लोकतंत्र की सरकार राजा की तरह होती है। वह जिसे जो बनाना चाहे, बना सकती है।
खैर। मैं बहक गया था। मैं तो माणिक सरकार चौक की बात कर रहा था। इस चौक पर एक सिनेमा हॉल था- दीप प्रभा। अब भी उसकी बिल्डिंग है। उसमें ताले जड़े हुए हैं। दीप का विस्तारित अर्थ है – दीपनारायण सिंह और प्रभा उनकी एकमात्र पुत्री थी। दीप नारायण सिंह न केवल स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि वे कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। पूर्वी बिहार का पहला कालेज टी एन बी कालेज उन्होंने ही बनवाया है। बिहार में साइंस की पढ़ाई यहीं से शुरू हुई है। यह कालेज 1883 में स्थापित हुआ है। किस्सा प्रचलित है कि दीप नारायण सिंह की पुत्री प्रभा ने उनकी मर्जी के खिलाफ शादी की थी, इसलिए दीप नारायण सिंह ने उसे संपत्ति से बेदखल कर दिया था।
दीप नारायण सिंह का आवास इसी चौक पर है। यह आवास पाँच एकड़ में है। उनको कोई और संतान नहीं थी, इसलिए अपनी पूरी संपत्ति को शिक्षा के विकास के लिए सौंप दिया था। पता नहीं कैसे, अब उनके आवास में जिला जज रहते हैं। उनके आवास के सामने उनके बैठने का स्थल था, जो अब बाल उद्यान बन गया है। मुझे लगता है कि जिला जज के लिए एक खूबसूरत आवास सरकार को बनाना चाहिए और दीप नारायण सिंह के आवास को शिक्षा कार्य में लगाना चाहिए। इस चौक के दायरे में ही दो स्कूल है। एक में शरतचन्द्र ने शिक्षा प्राप्त की थी। दूसरे स्कूल में लड़कियों को शिक्षा दी जाती है। इसी स्कूल में भारत की पहली महिला डॉक्टर कादंबनी ने शिक्षा प्राप्त की थी। स्कूल की बगल में लाजपत पार्क है। यह पार्क लाला लाजपतराय के नाम पर है, मगर उनकी कोई प्रतिमा नहीं है। एक कोने में सुभाष चन्द्र बोस की भव्य प्रतिमा लगी है। मैंने इसी पार्क में कई नेताओं के भाषण सुने हैं। अब इस पर वन विभाग का कब्जा है। इसके किनारे पर जैसे-तैसे दो-तीन मंदिर खड़े कर दिए गए हैं। ईश्वर को अतिक्रमण से कौन रोक सकता है – सबै भूमि गोपाल की। प्रशासन टुकुर-टुकुर देखता है। उसके पास कोई विकल्प नहीं है। अगर उसने ज्यादा सक्रियता दिखाई तो उत्तर प्रदेश के पूर्व आई जी अमिताभ ठाकुर की तरह जेल में चक्की पिसेगा। देह में खून रहने का मतलब यह नहीं होता कि लोग पत्थर पर सिर फोड़ कर बहा ले।
एक मुकम्मल इतिहास क़ब्र की ओर मुखातिब है और एक नया इतिहास आतुर है कि वह पुराने इतिहास पर दखल कब्जा कर लें। देखें, किसकी जीत होती है!

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर




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