वैश्विक असमानता का परिदृश्य
हाल ही में World Inequality Report 2026 की रिपोर्ट प्रकाशित हुई है, जो दुनिया में आय और संपत्ति की असमानता की चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार, विश्व की शीर्ष महज 10% आबादी विश्व के बाक़ी 90% हिस्सा से अधिक कमाती है और उस कमाई में भी लगातार वृद्धि होती जा रही है, जबकि नीचे के 50% लोगों की आय-हिस्सेदारी 10% से भी कम है। संपत्ति के मामले में यह असमानता तो और भी अधिक है — वैश्विक संपत्ति का लगभग तीन-चौथाई केवल शीर्ष10% के पास संकेंद्रित है, जबकि नीचे के आधे लोग केवल 2% संपत्ति के हिस्सेदार हैं।
अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों में औसत आँकड़े छुपा लिए जाते हैं, जबकि हकीकत में कई देशों और क्षेत्रों में लोगों की जीवन-शर्तें बेहद भिन्न हैं। उदाहरण के लिए, उत्तर अमेरिका में औसत दैनिक आय लगभग €125 है, जबकि सब-सहारा अफ्रीका में सिर्फ €10 है। यह वैश्विक असमानता की गहरी खाई को दर्शाता है।
भारत में भी यह क्षेत्रीय असमानता, आय-अंतर बहुत अधिक है। भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा जारी भारतीय राज्यों पर सांख्यिकी हैंड बुक 2024-25 के अनुसार गोवा में प्रति व्यक्ति आय जहाँ 5 लाख से अधिक है, वहीं बिहार में रू० 69,321 मात्र है। अर्थात् करीब 8 गुना का अंतर! आय का यह अंतर, जीवन के अन्य आयामों के साथ ही शिक्षा-असमानता पर भी प्रभाव डालता है।
असमानता और सार्वजनिक शिक्षा का संबंध
मुख्य बिंदु यह है कि सार्वजनिक शिक्षा में निवेश असमानता को कम करने वाला एक सबसे प्रभावी उपकरण है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और प्राथमिक सेवाओं में सार्वजनिक निवेश कानूनन और संरचनात्मक असमानताओं को चुनौती दे सकता है, क्योंकि ये निवेश बुनियादी अवसर प्रदान करते हैं और प्रतिभा तथा मेहनत को जीवन में आगे बढ़ने का मौका देते हैं, न कि सिर्फ जन्म-स्थान या सामाजिक पृष्ठभूमि को।
शिक्षा कई कारणों से असमानता को घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है –
1. प्रारंभिक जीवन में अवसर समानता
शिक्षा में सार्वजनिक निवेश बच्चों को प्रारंभिक स्तरीय अवसर देता है। विशेषकर यह ऐसे समुदायों के लिए और आवश्यक हो जाता है, जो पारंपरिक रूप से पिछड़े रहे हैं। इससे बच्चों को बेहतर शुरुआती क्षमता और सीखने के अवसर मिलते हैं, जो जीवन भर के परिणामों को बेहतर बना सकते हैं।
2. पिछड़ी पृष्ठभूमि के बावजूद जीवन-परिणाम में सुधार
जब हर बच्चे को उच्च-गुणवत्ता वाले सार्वजनिक स्कूलों, शिक्षकों, किताबों और सीखने के संसाधनों तक समान पहुँच प्राप्त होती है तो आर्थिक और सामाजिक असमानताएँ कम होती हैं। यह शैक्षिक अवसरों की समानता उपलब्ध कराती है, जिससे कमजोर आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि के बच्चे को भी संपन्न आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि वाले बच्चों के समान योग्यता हासिल कर पाने का अवसर प्राप्त होता है। यह विशेष रूप से उन ग्रामीण या गरीब इलाकों में बेहद महत्वपूर्ण है, जहाँ माता-पिता व्यक्तिगत रूप से अपने बच्चों की शिक्षा के लिए निवेश करने में असक्षम हैं।
3. मानव पूँजी में निवेश
शिक्षा में निवेश मानव पूँजी को मजबूत करता है। इसका मतलब है कि लोग बेहतर तकनीकी कौशल,रोजगार के अवसर, ऊँची आय और सामाजिक-आर्थिक स्थिरता की ओर बढ़ते हैं। यह परंपरागत रूप से गरीबी के चक्र को तोड़ने में मदद करता है। सार्वजनिक शिक्षा में निवेश की कमी एक ओर गरीबी के इस चक्र को बनाये रखती है, दूसरी ओर सामाजिक असमानता की खाई को भी बनाए रखने में मददगार होती है।
सार्वजनिक शिक्षा पर खर्च में अंतर
जहाँ उच्च-आय वाले देश शिक्षा पर भारी निवेश करते हैं, वहाँ सामाजिक-आर्थिक संतुलन बेहतर रहता है और जहाँ निवेश कम है, वहाँ असमानता अधिक बढ़ती है। लेकिन विभिन्न क्षेत्रों में सार्वजनिक शिक्षा पर खर्च बहुत अलग-अलग है। उदाहरण के लिए, सब-सहारा अफ्रीका में प्रति-व्यक्ति शिक्षा खर्च €220 है, जबकि उत्तर अमेरिका और ओशिआनिया में यह लगभग €9,025 है। यह लगभग 1:41 का अंतर है।
भारत के भी अलग-अलग राज्यों में शिक्षा पर किया जाने वाला खर्च बहुत अलग-अलग है। राष्ट्रीय सैंपल सर्वे (80वाँ राउंड) के कंप्रहन्सिव मॉड्यूलर सर्वे के अनुसार हरियाणा में माता-पिता अपने बच्चों की शिक्षा पर प्रति छात्र औसत 25,270 रुपए खर्च करते हैं, चंडीगढ़ में 49,711 रुपए, पंजाब में 22,629 रुपए, तमिलनाडु में 21,526 रुपए और दिल्ली में 19,951 रुपए। इसी सर्वे के अनुसार देश में मौजूदा सत्र में सार्वजनिक विद्यालयों में प्रति छात्र औसत 2,863 रुपए खर्च किए गए, जबकि निजी विद्यालयों में यह खर्च 25,002 रुपए प्रति छात्र है।
वहीं पर पिछड़े हुए राज्यों में यह निवेश उन्नत राज्यों की अपेक्षा बहुत कम है। बिहार में प्रति छात्र यह खर्च महज 5,656 रुपए, छत्तीसगढ़ में 5,844 रुपए, झारखंड में 7,133 रुपए और उड़ीसा में 7,479 रुपए है। अर्थात् बिहार में यह खर्च पूरे देश में सबसे कम है।
विभिन्न राज्यों में अभिभावकों के द्वारा प्रति छात्र पर होने वाले व्यय के अंतर को राज्यों की प्रति व्यक्ति आय से मिलान करके समझा जा सकता है। मानसून सत्र में वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने लोकसभा में किए गए प्रश्न के जवाब में बताया कि वर्ष 2024-25 में राष्ट्रीय स्तर पर औसत प्रति व्यक्ति नेट आय 1,14,710 रुपए थी। लेकिन विभिन्न राज्यों के बीच यह आय-असमानता बेहद निराशाजनक है। कर्नाटक में प्रति व्यक्ति आय जहाँ 2,04,605 रुपए है, तमिलनाडु में 1,96,309 रुपए है; वहीं बिहार में महज 32,227 रुपए (यह वर्ष 2023-24 के बारे में है। वर्ष 2024-25 का बिहार का डेटा उपलब्ध नहीं है।) है।
इसी का परिणाम है, जैसा कि केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने लोकसभा में वर्ष 2021 में सूचित किया था, कि शिक्षा अधिकार का अनुपालन (Compliance) पंजाब में 63.6%, दिल्ली में 57.7%,चंडीगढ़ में 41.8%, केरल में 40.9% हुआ है, जबकि झारखंड में 10.5%, बिहार में 11.1% और उड़ीसा में 19.2% ही हो सका है। विद्यालयों में किए जाने वाले निवेश पर राज्यों की संपन्नता या विपन्नता का प्रभाव पड़ता है और यह सीधे तौर पर राज्य की शिक्षा को प्रभावित करता है।
इसका मतलब है कि कम संसाधन वाले देशों, राज्यों, क्षेत्रों या समुदायों में शिक्षा ढाँचे में निवेश की कमी से न सिर्फ असमानता बढ़ती है, बल्कि लंबी अवधि में आर्थिक विकास बाधित होता है — क्योंकि शरीर और दिमाग को विकसित करने वाली प्राथमिक सेवाओं तक पहुँच सीमित हो जाती है। इससे द्योतित होता है कि उन्नत राज्यों के माता-पिता अपने बच्चों की शिक्षा में अधिक निवेश करते हैं। इसके साथ ही यह भी पता चलता है कि सार्वजनिक विद्यालयों और निजी विद्यालयों में प्रति छात्र खर्च में जमीन और आसमान का अंतर है। निवेश का यह अंतर, परिणाम के रूप में, सामाजिक-आर्थिक अंतर अर्थात असमानता को बनाये रखता है, पोषित करता है और संवर्धित करता है।
प्रमुख संदेश
यह समझने की आवश्यकता है कि असमानता सिर्फ आय और धन तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा के अवसरों तक असमान पहुँच भी इसका एक प्रमुख हिस्सा है। जब बच्चों को समान-गुणवत्ता वाली शिक्षा नहीं मिलती, तो सामाजिक विभाजन और बढ़ता है। शिक्षा में निवेश को केवल खर्च के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह सामाजिक न्याय का एक आधार भी है, जिससे समाज में असमानता को कम किया जा सकता है। इससे न सिर्फ व्यक्तिगत जीवन में सुधार आता है, बल्कि समुदाय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती है। इसलिए नागरिकों और नीति निर्माताओं को शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सार्वजनिक सेवाओं में निवेश को प्राथमिकता देनी चाहिए, क्योंकि यह असमानता को सीधे चुनौती देता है। यदि अवसर केवल पूँजी वाले वर्गों तक सीमित हैं, तो सामाजिक गतिशीलता रुक जाती है और इसका सीधा असर आर्थिक विकास, रोजगार और सामाजिक एकता पर पड़ता है।
भारत के परिप्रेक्ष्य में असमानता और शिक्षा
यद्यपि वैश्विक स्तर पर विभिन्न देशों के बीच आय और शिक्षा पर किए जानेवाले व्यय में काफ़ी असमानता है, लेकिन भारत जैसे देश में यह मुद्दा विशेष रूप से प्रासंगिक है। इसलिए कि भारत में शीर्ष 10% लोग राष्ट्रीय आय और संपत्ति का बड़ा हिस्सा नियंत्रित करते हैं, जबकि निचले वर्गों को कम हिस्सेदारी मिलती है। इससे सामाजिक-आर्थिक विभाजन बढ़ता है। यह केवल शिक्षा में किए जानेवाले निवेश को ही नहीं प्रभावित करता है, बल्कि प्रति-प्रभाव के रूप में, पहले से ही क़ायम, क्षेत्रीय और सामाजिक विभाजन को और भी गहरा करता है। यह डिजिटल उपकरणों, इंटरनेट और गुणवत्ता शिक्षा संसाधनों तक असमान पहुँच, ग्रामीण एवं शहरी, अमीर और गरीब के बीच अंतर को और बढ़ाती है। भारत में सरकारी और निजी स्कूलों के बीच गुणवत्ता का अंतर, शिक्षक-कमी, अन्य संसाधनों की कमी जैसी समस्याएँ और सीखने के परिणामों में अंतर शिक्षा-असमानता को बढ़ाता है। इसलिए समान अवसर और सार्वजनिक शिक्षा में निवेश भारत में असमानता को कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है।
निष्कर्ष
इस तरह असमानता केवल धन-आय के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा जैसी मूलभूत मानवीय आवश्यकताओं तक पहुँच असमानता का मूल कारण है। World Inequality Report 2026 की रोशनी में यह स्पष्ट है कि गुणवत्ता और समावेशी शिक्षा तक सार्वजनिक पहुँच ही सामाजिक-आर्थिक असमानता को कम करने का सबसे प्रभावी उपाय है।
स्रोत :
1. “GDP: What’s the link between inequality and public education?” published in Indian Express
2. World Inequality Report 2026
3. भारतीय राज्यों पर सांख्यिकी हैंडबुक 2024-25, भारतीय रिज़र्व बैंक
4. लोकसभा में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी का जवाब
5. दिनांक 2-8-2021 को लोकसभा में शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान का जवाब

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।






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