Category जन पत्रकारिता

इन दिनों : लोकतंत्र और निरंकुश सत्ता

grayscale photo of people walking on street
"हर तानाशाह के कुछ चमकते नारे होते हैं, जिसमें जनता उलझ-पुलझ कर रहे जाती है। जनता नारों का गुलाम बन कर देश की गुलामी पर दस्तखत कब कर देती है, इसका पता नहीं चलता।" - इसी आलेख से

इन दिनों : राजनीति के दो छद्म चेहरे

"अरविंद केजरीवाल आज आज कैमरे के सामने रो रहे हैं। कैमरे के सामने रोने में नरेंद्र मोदी जी भी अव्वल हैं। दोनों ड्रामा किंग हैं।" - इसी आलेख से

संविधान से समाधान तक

"चाहे लिखित हो या नहीं, हर देश काल में हर समाज के पास एक संविधान रहा है। संविधान ऐसे नियम-क़ानूनों का दस्तावेज है, जो उस समाज की राजनीति की हदों को निर्धारित करती है।" इसी आलेख से

इन दिनों : वैश्विक कोतवाली के कोतवाल

"किसी की धरती को पिता और किसी की धरती को माँ कहने में कौन सी बुद्धिमानी है? विदेश नीति इससे कहाँ मजबूत हो जाती है?" - इसी आलेख से

इन दिनों : शर्म पर गर्व और गर्व पर शर्म का अमृत काल

"देश में सत्ता की ओर से फैलाई जा रही नफ़रत और हिंसा के शिकार कौन होगा, कहा नहीं जा सकता। इतना भर जरूर कहा जा सकता है कि आसार अच्छे नहीं हैं।" - इसी आलेख से

इन दिनों : गलगोटिया-चेतना के उत्तराधिकारी

"उम्मीद है कि सरकारी विश्वविद्यालयों को अपदस्थ कर जल्द ही गलगोटिया विश्वविद्यालय हमारे सिर पर नाचेगा और हमें अपार प्रसन्नता होगी कि अब हमारे बच्चे गलगोटिया-चेतना से लैस होंगे।" इसी आलेख से

इन दिनों : बच्चों की दुनिया में सेंध

"देश के सिस्टम में भी अंग्रेजी का बोलबाला है और बिहार के बच्चों को बिहार विद्यालय परीक्षा समिति बेवकूफ बना रही है। अगर पूरे सिस्टम में भारतीय भाषाओं का वर्चस्व हो तो आप अंग्रेजी के बिना भी काम चला सकते हैं, लेकिन जब कुएं में ही भंग पड़ी हो तो भंग से परहेज़ करना मुश्किल है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : लालटेन युग का सुख और रोबोटिक युग का दुःख

"यह सब जानकर आपको लग रहा होगा कि उन दिनों बहुत पिछड़ा समाज था। हाँ, उन दिनों सामान कम था, मगर संबंधों का अद्भुत आनंद था- माँ, पिता, भाई, बहन तो थे ही, काका, काकी, चचेरा भाई, बहन, भौजाइयों का हुजूम था।" इसी आलेख से

इहलोकतंत्र क्या है?

"“स्वराज” एक राजनैतिक अवस्था ही नहीं है, यह एक दार्शनिक चित्रण है जो हमारे चरित्र में प्रतिबिंबित होना चाहिए। स्वराज सिर्फ एक विचार ही नहीं, व्यवहार है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : बुढ़ापा और जवानी: सौंदर्य और उदासी

"विरह और मिलन का क्रम ही तो जीवन है। कहाँ होता है विरह और मिलन? एक स्थल पर निर्धारित है मिलन भी और विरह भी। जीवन इसके संयोग से ही समृद्ध होता है।" इसी आलेख से