
"देश के सिस्टम में भी अंग्रेजी का बोलबाला है और बिहार के बच्चों को बिहार विद्यालय परीक्षा समिति बेवकूफ बना रही है। अगर पूरे सिस्टम में भारतीय भाषाओं का वर्चस्व हो तो आप अंग्रेजी के बिना भी काम चला सकते हैं, लेकिन जब कुएं में ही भंग पड़ी हो तो भंग से परहेज़ करना मुश्किल है।" - इसी आलेख से

"यह सब जानकर आपको लग रहा होगा कि उन दिनों बहुत पिछड़ा समाज था। हाँ, उन दिनों सामान कम था, मगर संबंधों का अद्भुत आनंद था- माँ, पिता, भाई, बहन तो थे ही, काका, काकी, चचेरा भाई, बहन, भौजाइयों का हुजूम था।" इसी आलेख से

"“स्वराज” एक राजनैतिक अवस्था ही नहीं है, यह एक दार्शनिक चित्रण है जो हमारे चरित्र में प्रतिबिंबित होना चाहिए। स्वराज सिर्फ एक विचार ही नहीं, व्यवहार है।" - इसी आलेख से

"विरह और मिलन का क्रम ही तो जीवन है। कहाँ होता है विरह और मिलन? एक स्थल पर निर्धारित है मिलन भी और विरह भी। जीवन इसके संयोग से ही समृद्ध होता है।" इसी आलेख से

"जाति एक दड़वा बनाती है, जिसमें इंसान घुटता रहता है। जाति के हजारों दड़वे हैं और उन दड़वों में इंसान जितना भी स्नान कर ले, लेकिन देह पर फिर भी मैल जमी ही रहती है, मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस की तरह।" - इसी आलेख से

"एक तरह से देखा जाए तो जब सरकार पब्लिक द्वारा दिए गए टैक्स के पैसे का सदुपयोग करने में असफल हो जाती है, तब उसे सत्ता में बने रहने के लिए दंडनीति का प्रयोग करना पड़ता है। साम-दाम-दंड-भेद सब जायज लगने लगता है।" इसी आलेख से

"यह देश तय करे कि उसे प्रधानमंत्री की प्रशंसा चाहिए या देश की तबाही? हम आखिर कहाँ आ गये हैं? क्या सचमुच राजनैतिक नेता गैरतहीन हो गये हैं?" - इसी आलेख से

"राजभवन को लोकभवन बना दिया गया, मगर उसकी कार्यशैली में क्या अंतर आया? अंग्रेजों के ये लाट साहब आजादी के बाद भी लाट ही बने रहे।" - इसी आलेख से

"जब तक किसी की अशिक्षा और बीमारी से मुनाफा होता रहेगा, ना ही कोई शिक्षित होगा, ना ही स्वस्थ। आज एक समाज बीमार पड़ा है। इसकी समस्या सिर्फ सत्ता नहीं है, सिस्टम है।" - इसी आलेख से

"जो भी हो, गलगोटिया कोई एक दिन में पैदा नहीं होता। उसकी भी लंबी परंपरा है। झूठ का जो टोकरा प्रधानमंत्री ने जनता को थमाया है, उसमें गलगोटिया यूनिवर्सिटी का ही विकास हो सकता है।" - इसी आलेख से