
"जंगल और वनों को हमने नहीं बनाये। कुदरत ने करोड़ों पेड़ों का संवर्धन किया। जीव जंतु, झरने, नदियाँ। खूबसूरती। मगर दो टके के राजनेता और पूँजीपतियों ने इस खूबसूरती को उजाड़ा।" - इसी आलेख से

महाभारत एक मुकम्मल कथा है। रिश्ते ऐसे-ऐसे कि सहज विश्वास नहीं होता। यहाँ मनुष्य का सरलीकरण नहीं है कि ईमानदार है तो हर समय ईमानदार ही रहेगा।

शासन की व्यवस्था के भीतर पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में अक्सर भाषा को अभिव्यक्ति का साधन बताया जाता है। लेकिन भाषा केवल साधन नहीं है, स्वभाव भी है - वर्गीय स्वभाव। प्रस्तुत लेख में भाषा के इसी वर्गीय चरित्र का विश्लेषण किया गया है।

"विदेशी कुत्ते विद्रोही नहीं होते। देशी कुत्ते झाँव-झाँव कर लेते हैं। विदेशी कुत्ते जितने मालिक के गुलाम होंगे, वे उतने ही सफल होंगे। उनकी सफलता गुलामी में है। बिना मेहनत के जो आदमी सफल होना चाहता है, उसमें विदेशी कुत्ते का गुण चाहिए।" - इसी आलेख से

"बिहार में शिक्षक को कक्षा से बाहर निकालने की एक स्थायी परंपरा बन चुकी है।......... हर बार तर्क एक ही दिया जाता है—“काम ज़रूरी है”। लेकिन सवाल यह है कि क्या बच्चों की पढ़ाई ज़रूरी नहीं?
क्या शिक्षा हमेशा स्थगित की जा सकने वाली गतिविधि है?" - इसी आलेख से

"मृत्यु सिर्फ देह की क्षय से नहीं होती। देह रहते हुए भी मृत्यु हो जाती है। आपके अंदर का इंसान जैसे-जैसे छीजता जाता है, वैसे-वैसे आपकी मृत्यु होती जाती है। वह समाज मृत ही समझिए, जहाँ इंसानियत का टोटा पड़ जाता है।" - इसी आलेख से

"हमारे देश में अनेक धर्म, अनेक जाति और अनेक संस्कृतियाँ हैं। जो बहुल संस्कृति से प्यार करेगा, वही सच्चा भारतीय होगा।" इसी आलेख से

"यह देश जिसे गर्व है कि पहले यहाँ सभ्यता उतरी। दुनिया का सबसे पुराना ग्रंथ वैदिक साहित्य जहाँ सृजित हुआ, वहाँ मल-मूत्र से भरा पानी हजारों लोगों को पिला दिया जाता है। पंद्रह सनातनी मर चुके हैं और सैकड़ों अस्पताल में छटपटा रहे हैं। क्या यह सभ्यता है?" - इसी आलेख से

"मुझे गर्व होता है कि मैं उस देश का वासी हूँ, जहाँ बुद्ध हुए हैं, लेकिन मुझे बुद्धिखोरों को लेकर शर्म आती है कि तात्कालिक लाभ के लिए इन्होंने अपने को गिरवी रख दिया है।" - इसी आलेख से

"इतिहास बताता है कि साम्राज्य अपने सबसे घमंडी दौर में ही गिरावट की ओर बढ़ते हैं। ट्रंप का खुला विस्तारवाद, उसकी बेशर्म भाषा और वेनेजुएला पर किया गया हमला उसी घमंड का प्रतीक है। सवाल यह नहीं कि अमेरिका क्या चाहता है; सवाल यह है कि दुनिया कब तक इस लूट और कब्ज़े को चुपचाप देखती रहेगी।" इसी आलेख से