Category जन पत्रकारिता

इन दिनों : चौदह वर्ष के बाद गौ माता की क़ुर्बानी और राजनीतिक मिथ्याचार

A brown cow grazing on a green pasture in Germany, surrounded by trees.
"चौदह वर्ष तक की गाय माता रहेगी और उसके बाद उसे माता के पद से उतार कर उसकी गर्दन रेत देने में कोई दिक़्क़त नहीं है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : ‘गैंग ऑफ वासेपुर’ ने डाला आरबीआई में डाका

अहमदाबाद में आरबीआई के पैसों की चोरी से जाहिर होता है कि राजकीय व्यवस्था अपने कर्तव्य-पालन में कितनी सुस्त, मगर विज्ञापन में कितनी चुस्त है।

इन दिनों : नारों का डंका, आग में जले लंका

Diverse group holding protest signs demanding change, highlighted by night lighting.
नारे हैं, नारों का क्या? नारों के झाँसे में देश देश संकट में फँसता गया, राष्ट्रीय संपत्तियाँ नीलाम होती गईं, मार्केट क्रैश कर गया, राष्ट्रीय संप्रभुता गिरवी पड़ती गई और अब तो पेमेंट तक का क्राइसिस खड़ा हो गया है।

काक्रोच जनता पार्टी: यह कोई मजाक नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी के आंदोलन का तरीका है

'कॉकरोच जनता पार्टी' एक व्यंग्यात्मक डिजिटल राजनीतिक आंदोलन है, जो सोशल मीडिया पर युवाओं के गुस्से और निराशा की अभिव्यक्ति के रूप में उभरा है।

उच्च शिक्षा में ग्रामीण क्षेत्रों का योगदान

"जब किसी गरीब किसान का बेटा या मजदूर की बेटी विश्वविद्यालय तक पहुँचती है, तब केवल एक छात्र शिक्षित नहीं होता—बल्कि एक पूरा परिवार, एक गाँव और एक पीढ़ी अपने भविष्य को बदलने की संभावना के करीब पहुँचती है।" - इसी आलेख से

शिक्षा का बाजारीकरण, सत्ता की विफलता और युवाओं के सपनों पर हमला

"NEET जैसी परीक्षाएँ अब “प्रतिभा की परीक्षा” कम और “व्यवस्था की सड़ांध” का प्रतीक अधिक बनती जा रही हैं।" - इसी आलेख से

हमारी शिक्षा-व्यवस्था कैसी हो?

"भारत की शिक्षा को केवल ‘स्मार्ट क्लास’ नहीं चाहिए, बल्कि मानवीयता, वैज्ञानिक दृष्टि, लोकतांत्रिक संस्कृति, सामाजिक न्याय और बौद्धिक स्वतंत्रता की आवश्यकता है।" - इसी आलेख से

NEET रद्द : पेपर लीक ने राज्य की उदासीनता को उजागर किया

"जब तक इस संकट को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर देखा जाएगा और उससे आगे गंभीर चिंतन नहीं किया जाएगा, तब तक पेपर लीक की घटनाएँ जारी रहेंगी।" - इसी आलेख से

इन दिनों : ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है!

A devastated city burns under a smoky sky.
" हो सकता है, यह सभ्यता टूट-बिखर जाये। नयी सभ्यता खड़ी हो और मनुष्य नये तरीक़े से जीने लगे तो फिर नये-नये शब्द भी जीवन में आ जायें। जीवन के बदलते तरीक़ों में हमने एक तरीक़ा सीखा है कि प्रकृति की कत्ल करते जायें। " - इसी आलेख से